जिनका लक्ष्य आज या कल नहीं, एक हजार, चौदह सौ साल पहले तय हो गया! इरान हो या कश्मीर। एक ही लक्ष्य……

जिनका लक्ष्य आज या कल नहीं, एक हजार, चौदह सौ साल पहले तय हो गया! इरान हो या कश्मीर। एक ही लक्ष्य……

पूरी दुनिआ पर राज करना। पूरी दुनिआ को मुसलमान बनाना।

एक छोटे से क्षेत्र से निकल कर आज 56 मुलकों में राज कर रहे। लंदन जीत लिया, आधा यूरोप जीत लिया। आठ दस साल में पूरा इंग्लैंड और यूरोप पर कब्जा हो जाए तो बहुत बङी बात नहीं।

और दूसरी तरफ दिग्भ्रमित कौम! हम। हिन्दू।

लक्ष्य…? सिलेंडर ससता होना चाहिए।

ये भूल कर के आज से दस साल पहले हम ही लोगों ने स्वेच्छा से सिलेंडर की सबसिडी छोङ दी थी।

ये भूलकर के महंगे से महंगा हुआ सिलेंडर भी कांग्रेस के समय के सिलेंडर से आज भी ससता है।

ये भूलकर के जितनी कठिनाई सिलेंडर में आज आ रही है, उस से कहीं जयादा कठिनाई कांग्रेस सरकार में आम बात थी!

ये भी भूलकर के कांग्रेस की सरकार में साल में 6 सिलेंडर ही मिलते थे!

और ये भी भूलकर के जो पप्पू आज सिलेंडर को लेकर सब से जयादा स्यापा करता है वो कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में छ की जगह नौ सिलेंडर की मांग कर के हीरो बना था! साल में तीन सिलेंडर का झुनझुना देकर 2014 के चुनाव जीतने के सपने सोच रहा था। और अभी एक दी सिलेंडर लेट कया हुए आसमान सर पर उठाकर घूम रहा।

हम ही लोगों ने टमाटर प्याज के दाम पर सरकार गिराई है। हमने ही राम मंदिर का रास्ता प्रशस्त करने वाले कल्याण सिंह की सरकार नहीं बनने दी।

कया हम स्वार्थी हैं, लालची हैं, मूर्ख हैं?

ना….बलकि हम बुद्धिमान है। हम पढे लिखे हैं। हमें बोलना आता है। हम में अलग दिखने का शौक है।

हम सवाल पूछते हैं…

और पप्पू और इकोसिसटम इसी बात का फायदा उठाता है। हम उनके लिए useful idiots हैं।

वो हमें intelligent trap में फंसाता है।

जब राम मंदिर नहीं बनता तो हमें मंदिर वहीं बनाऐंगे पर तारीख नहीं बताऐंगे का नारा देता है….और हम लपक लेते हैं

जब मंदिर बनता है तो इकोसिसटम कहता है के मोदी योगी ने कया किया? मंदिर तो कोर्ट ने बनवाया है। और हम भी तोते की तरह रटने लग जाते हैं।

जब हमारी सेना पहले से तय टार्गेट को ध्वस्त करके आप्रेशन सिंदूर रोक देती है तो हमें कहते है कै पाकिस्तान को नेस्तनाबूत कयों नहीं किया ? कश्मीर कयों नहीं लिया ?

अभी ?

एक हाथ में सिलेंडर पकङा दिया और दूसरे हाथ में यू जी सी का मुद्दा…..अब केवल अपनी बनाई हुई सरकार से ही नहीं ……बलकि आपस में भी लट्ठम लट्ठ हो रहे!

ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं, बस इतना सोचना है के अगर अपनी बनाई सरकार से लङेंगे, सरकार को हटाने का अभियान चलाऐंगे, और आपस में एक दूसरे का सर फोङेंगे तो फायदा किस का होगा?

उनहीं का जो आज अपनी जीवन भर की कमाई इरान पर न्यौछावर कर रहे। उनहीं का फायदा होगा जिनहों ने राम मंदिर बनने नहीं दिया और जो पाकिस्तान को कबूतर भेजते थे और अभी भी भेज रहे।

अभी तो बहुत कुछ होना है। ये कोई सिनेमा नहीं चल रहा। युद्ध हो रहा। भीषण युद्ध हो रहा है। एक नहीं कई युद्ध हो रहे

इजराइल-अमेरिका-इरान ….साथ में 20-22 मिडल ईसट कंटरीज

रूस-युकरेन….आधा यूरोप

पाकिस्तान-अफगानिस्तान- बलोच

चीन इस युद्ध में कई मुहानों पर लङ रहा।

दूसरे विश्वयुद्ध से भी बङे सतर पर और भयँकर तबाही चल रही।

न्यूक्लियर बम्ब का खतरा मंडरा रहा दुनिआ पर।

भगवान की कृपा है के इतना कुछ होते हुए भी हम सीधे युद्ध में नहीं खिंचे। हमारे उपर कोई हमला नहीं हुआ। हमने होली भी मनाई, नवरात्र भी मना रहे हैं, और धुरंधर भी देख रहे हैं।

आगे आगे गैस, तेल, खाद, और पैट्रोलीयम से बनने वाले सारे पदायथों की कीमते बढने वाली हैं, और किल्लत आने वाली है। खाने पीने के सामान, दवा दारू तक में परेशानी आ सकती हो।

गैस तेल के दाम बढने से महंगाई अप्रत्याशित रूप से बढने वाली है।

उद्योग धंधे बंद हो सकते है, बेरोजगारी भी हो सकती है।

अगर पप्पू और इकोसिसटम के टरैप में फ॔स गए तो वही बात होगा के चिकन खुद चलकर KFC पहुंच जाए।

सावधान रहें, सुरक्षित रहें, और सब से बङी बात ….संगठित रहें।

योगी बाबा की बात ना भूले-

बंटेंगे तो…..

– नरेश गोयल जी जी के ब्लॉग से ✍🏻

रूस , अमेरिका ,भारत और चीन

रूस अमेरिका भारत चीन

विश्व राजनीति में हमेशा ही बड़े खेल होते हैं जिसमें दाँव पर हमेशा होती है वैश्विक अर्थव्यवस्था की चाबी!

-ईसापूर्व इस ग्रेट गेम के खिलाड़ी थे —

फारस और यूनान

दांव पर था — बेबीलोन

-ईसा की पहली सदी के बाद इस ग्रेट गेम के खिलाड़ी थे — फारस, रोम और भारत

दांव पर था सिल्क रोड पर नियंत्रण

–ईसा की सातवीं सदी में खिलाड़ी थे अरब चीन और भारत

दाँव पर था मध्य एशिया

–ईसा की ग्यारहवी सदी में खिलाड़ी थे ईसाई यूरोप और मुस्लिम उम्मा

दाँव पर था येरुशलम

— ईसा की चौदहवी सदी में खिलाड़ी थे पोप, बाइजेंटियन और ऑटोमन सुल्तान

दाँव पर था कांस्टेटिनोपल

-ईसा की सत्रहवीं सदी में खिलाड़ी थे -स्पेन, इंग्लैंड, फ्रांस और हॉलैंड

-दाँव पर था भारत

– ईसा की बीसवीं सदी के खिलाड़ी थे अमेरिका और सोवियत संघ

दाँव पर था अफगानिस्तान और पेट्रोल से भरा पश्चिमी एशिया

-ईसा की इक्कीसवीं सदी के खिलाड़ी हैं अमेरिका, रूस और चीन

दाँव पर लगे हैं क्रीमिया, वेस्ट बैंक और ताईवान।

रूस अपना युद्ध पहले ही जीत चुका है और अब वह यूक्रेन रूसी भाषी क्षेत्रों के रूप में जो कुछ प्राप्त कर रहा है वह बोनस है।

इजरायल गाजा को मिटा चुका है और अब उसकी योजना वेस्ट बैंक को अधिग्रहित कर येरुशलम को राजधानी बनाकर अपने टेम्पल माउंट का पुनः निर्माण व ग्रेटर इजरायल या दाऊद के साम्राज्य का निर्माण है और वर्तमान ईरान-इजरायल अमेरिका युद्ध इसकी भूमिका है।

ताइवान को चीन की मुख्य भूमि में मिलाना चीन का अंतिम उद्देश्य है। जिसके लिये वह अमेरिका को कमजोर करना चाहता है, और यह कार्य वह ईरान के माध्यम से कर रहा है। ठीक वैसे ही जैसे अमेरिका ने रूस को कमजोर करने के लिये यूक्रेन का उपयोग किया।

अब बचा चीन का दाँव ‘ताईवान’ जिसकी राह का रोड़ा है अमेरिका।

अमेरिका, जिसकी ताकत उसके शस्त्रों में नहीं बल्कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था और तकनीकी श्रेष्ठता में रही है, इसलिए ईरान – अमेरिका युद्ध को अब चीन और रूस शांत होने नहीं देंगे, क्योंकि इससे अमेरिका क्रमशः कमजोर होता जायेगा जिससे सबसे ज्यादा लाभ चीन को होगा, क्योंकि उसके पास 2028 -35 तक ताइवान को चीन में मिलाने की पूरी योजना है और मुख्य बाधक शक्ति है अमेरिका।

सोवियत संघ का विखंडन इसलिए नहीं हुआ था कि वह सैन्य दृष्टि से कमजोर था बल्कि इसलिए हुआ क्योंकि वह आर्थिक रूप से टूट गया था।

अब चतुष्कोणीय मुकाबले में जो फंस जायेगा वह आर्थिक रूप से बिखर जायेगा और दो खिलाड़ी उलझ चुके हैं।

भारत को चीन ने लगभग उलझा ही लिया था।

भारत की मिसाइल फायर पॉवर ने पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया था लेकिन यदि यह युद्ध जमीन पर भी शुरू हो जाता तो चीन अपने उद्देश्य में सफल हो जाता और अमेरिका ने इसीलिये पाकिस्तान पर दवाब डाला, जो पहले ही अपनी आणविक शस्त्रागार तक ब्रह्मोस की पहुँच से डर गया था, उसने अपने डीजीएमओ के द्वारा युद्ध विराम की गुहार लगवाई।

भारत स्वयं भी चीन के इस जाल को समझ चुका था इसलिए उसने स्वीकार कर लिया और बड़बोले ट्रम्प ने इसका क्रेडिट ले लिया।

पर सवाल यह है कि अमेरिकी सत्ता तंत्र #भारत के विरोध में क्यों आ गया है?

इसका उत्तर अभी अमेरिकी उपसचिव क्रिस्टोफर_लैंडो ने दिया है कि हम चीन के साथ संघर्ष में भारत को लेकर वह गलती नहीं करेंगे जो सोवियत संघ के साथ संघर्ष के चलते चीन के बारे में की थी।

दूसरे शब्दों में हम चीन के विरुद्ध भारत का उपयोग करेंगे लेकिन इतना शक्तिशाली नहीं बनने देंगे कि अमेरिका के लिये खतरा बन जाये।

कभी #कार्नवालिस ने यही खेल मराठों के साथ खेला था जब टीपू की धर्मांधता से नाराज मराठों की सहायता से टीपू को कुचल दिया, लेकिन मराठों को कोई लाभ नहीं लेने दिया।

अब कम से कम मोदी प्रशासन इतना बेवकूफ तो नहीं कि ‘ट्रम्प की आँखें’ न पढ़ पाये। तो अमेरिका प्रणीत नॉर्थ-ईस्ट की अराजकता और बांगलादेश की बारबार चुनौती को नजरअंदाज करते गये। साइलेंटली अमेरिका के ऑपरेशन हैड को ढाका में निबटा दिया। रहमान के माध्यम से अमेरिकी पपेट यूनुस को हटा दिया और हाल ही में एक अमेरिकी और सात यूँक्रेनियन अधिकारियों को धर लिया है।

मेरे हिसाब से सिक्किम के भारत विलय के बाद RA&W की यह सबसे बड़ी सफलता है।

अतीत_में 1971 में यही खेल पहले भी खेलना चाहा था अमेरिका ने…. उस समय सोवियत संघ ने अपने स्वार्थ में रोका था क्योंकि अगर अमेरिका बांग्लादेश में बैठ जाता तो दिएगो गरसिया व जापान के बीच लंबे गैप की फिलिंग हो जाती और अमेरिकी अड्डों की श्रखला बन जाती।

पर यहाँ कुछ ज़नाने लोग रोते हुए आ जाते हैं कि हाय रूस ने 1971 में साथ दिया था….. तो भाई अब तक वह उससे सैकड़ों गुणा वसूल चुका है और अभी भी वसूलता है। अभी पुतिन भारत से नाराज होकर गये हैं, क्योंकि भारत ने उनका सेमीस्टैल्थ SU57 उनके प्रपोजल पर लेने से मना कर दिया।

अब सवाल यह है कि भारत सरकार ट्रम्प की बदतमीजियों का उत्तर क्यों नहीं देती।

तो इन अकलबंद लल्लुओं और पप्पू के चेलों को यह समझना होगा कि भारत के निर्यात का 18 से 20%भाग अमेरिका को होता है और भारत में करोड़ों लोगों को दो वक्त की रोटी उस निर्यात से चलती है।

मोदी का क्या है, वह तो कल मुँह फाड़ दें कि ट्रम्प अपनी औकात में रह।

यह भी सत्य है कि ऐसा बोलने पर ट्रम्प की औकात नहीं कि भारत पर सैन्य कार्रवाई की सोच भी सके,, लेकिन भारतीय निर्यात को तबाह कर सकता है और उसके बाद भारत में जो आर्थिक अफरा तफरी फैलेगी उससे लड़ने की क्षमता हिंदुओं में नहीं है। यही मुस्लिम, कॉंग्रेसी, वामपंथी और अब कुछ जातिवादी सवर्ण चाहते हैं।

सोचकर देखिये कि अभी योगी बाबा होते तो अपने स्वभाव के अनुसार ट्रम्प को बोल देते कि भाग….. लेकिन उसके परिणाम क्या होते। और अगर योगी बाबा नहीं करते तो आप उन्हें भी कायर बोलकर गाली देते।

कड़वी सच्चाई यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अब 1963 की अर्थव्यवस्था नहीं है कि छत पर सब्जियां उगाकर अमेरिका को जवाब दें और प्रधानमंत्री के साथ स्वयं उपवास रखें, आज चंद गैस डीलरो, प्याज, टमाटर की कृत्रिम कमी के चलते जनता सीधे हाय तोबा मचाने लगती है। ऐसे धूर्त देशद्रोही विपक्ष और ऐसी मूर्ख जनता के दम पर युद्ध नहीं लड़े जाते जिन्हें यह तक नहीं पता कि अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में किसी का कोई सगा नहीं होता — न रूस और न अमेरिका।

हमारे पास न रूस की तरह अपार तेल है और न चीन की तरह अमेरिका को झुकाने के लिये रेयर अर्थ मिनरल…. इसलिए उनका निर्यात ब्लैकमेल सहना ही होगा, जब तक कि हम वायुरक्षा और रेयर अर्थ मिनरल्स के मामले में आत्मनिर्भर नहीं हो जाते।

अस्तु!

मजे की बात यह है कि जो अमेरिका भारत को कमजोर रखना चाहता था वह अब ईरान के साथ युद्ध में फंस गया है जिसकी भारत से ऐतिहासिक शत्रुता सायरस के युग से ही रही है।

तो यह समय चुपचाप रहकर शक्ति अर्जित करने का है, अपने मुख्य आंतरिक शत्रु को शक्तिहीन करने का है, जिसे बड़ी खामोशी से अंजाम दिया जा रहा है, पर अगर देखने योग्य आँखें नहीं हों तो किया ही क्या जा सकता है।

वैसे भी यह वही हिंदू कौम है जिसने सीता पर लांन्छन लगाया और कृष्ण को अकेला छोड़ दिया, मोदी तो एक साधारण मानव भर है।

अमेरिका और चीन ने अब सही जगह पर दाँव लगाया है।

✍️ देवेन्द्र सिकरवार जी के ब्लॉग से

पिछले 25-30 सालों में अमेरिका ने जितने भी युद्ध किये हैं…. या कह सकते हैं.. जितने युद्ध अमेरिका ने थोपे हैं…. उनमे हमेशा तीन दोस्त उसके साथ रहते थे.ब्रिटेन, फ़्रांस और कनाडा.

पिछले 25-30 सालों में अमेरिका ने जितने भी युद्ध किये हैं…. या कह सकते हैं.. जितने युद्ध अमेरिका ने थोपे हैं…. उनमे हमेशा तीन दोस्त उसके साथ रहते थे.

ब्रिटेन, फ़्रांस और कनाडा.

अमेरिका जहाँ भी सेना भेजता था…. साथ में इन तीनो देशों की सेनायें भी जाती थी…..और इन देशों के सैकड़ों सैनिकों की जानें भी गई हैं इन युद्ध में….. और तरह के नुकसान भी उठाने पड़े हैं इन्हे.

आप इराक, अफ़ग़ानिस्तान, लिबिया, सीरिया, कोसोवो, यूक्रेन में किये गए Operations के बारे में जब पढ़ेंगे… तो पाएंगे कि अमेरिका के एक इशारे पर यह तीनो देश अपनी सेनायें कहीं भी Deploy कर देते थे.

यूक्रेन में बेशक़ इन देशों ने अपनी सेनायें लड़ने के लिए नहीं भेजी… लेकिन इन देशों की सेनायें यूक्रेन की सेनाओं, उनके ड्रोन यूनिट्स को Training देती रही हैं….. यूक्रेन की सेनाओं को आधुनिक हथियार और फंडिंग भी इन तीनो देशों ने दी है.

ये देश UN जैसे संगठन को ठेंगे पर रखते थे… एक बार अमेरिका ने कुछ कह दिया.. यह उसे पत्थर की लकीर मान कर युद्ध में कूद जाते थे.

लेकिन इरान के युद्ध ने सारा गणित पलट दिया है.

अमेरिका ने जब इजराइल के साथ मिल कर इरान पर हमला किया था… तब शायद ट्रम्प ने सपने में भी नहीं सोचा था कि यह दिन देखने पड़ेंगे.

इन तीनो देशों ने इरान युद्ध में शामिल होने से साफ मना कर दिया

ट्रम्प इससे गुस्सा भी हैं… और ब्रिटेन और फ़्रांस के बारे में वह comment भी कर चुके हैं.

अब ट्रम्प एशियाई देशों को स्ट्रेट ऑफ़ होरमुज़ को खुलवाने के लिए नेवी भेजने को कह रहे हैं….. लेकिन मुझे लगता नहीं कोई भेजेगा.

बजाय वहाँ नेवी भेजने के… यह देश इरान से back channel talks करेंगे… और अपने देशों के Tankers और जहाजो का आवागमन सुगम करवाने पर ज्यादा ध्यान देंगे.

ट्रम्प को यह एक तरह का Reality Check भी है…. पिछले एक साल में उन्होंने अपने किसी भी दोस्त को जलील करने में कोई कसर नहीं छोडी है….. ब्रिटेन, फ़्रांस और कनाडा के नेताओं को बेइज्जत करना.. उन्हें उल्टा पुल्टा बोलना… और अपनी आपसी बातों को दुनिया के सामने लीक करने में ट्रम्प आगे रहे हैं.

और यही कारण है… कि आज उनके साथ कोई नहीं है…. और कोई आएगा भी नहीं.

और यकीन मानिये.. इरान अमेरिका के गले की हड्डी बन चुका है… ना निगलते बन रहा है.. ना उगलते.

इरान युद्ध बहुत भारी पड़ेगा अमेरिका को.

Source:- Global Geo Politics

खामीनेई की मौत के बाद मिडिल ईस्ट में नई जंग की आहट

मुझे ऐसा लगता है कि शायद इस बार अमेरिका और इजराइल ने Impact analysis सही से नहीं किया… या फिर कुछ महीने पहले किये एटैक्स को ध्यान मे रखते हुए miscalculate कर लिया है.

खामीनेई की मृत्यु के बाद इरान को इराक, लिबिया, या वेनेजुएला की तरह सरेंडर करने की आशा करने वालों को रियलिटी चेक करना चाहिए. इरान इतनी आसानी से शांत नहीं होने वाला है…..और इस बार तो पहले कुछ घंटो मे अमेरिका और इजराइल ने इरान के Threshold (दहलीज़) को तोड़ दिया है

इरान की मजहबी, राजनैतिक, और मिलिट्री लीडरशिप ख़त्म हो गई है… और नई लीडरशिप भी तैयार हो गई है….. और इस बार इरान की तरफ से Negotiations का स्कोप ही खत्म हो गया है.

अब आगे क्या होगा?

Regime Change इन हालातो मे होना मुश्किल है….. क्यूंकि कहीं ना कहीं खामीनेई की मौत ने वहां की आर्मी और मजहबी ताकतो को मजबूत का दिया है….. कुछ हजार लोग इरान मे इस घटना पर ख़ुशी मना रहे हैं…. लेकिन जब देश पर संकट आता है… तो अमूमन बड़ी जनसंख्या बाहरी शक्तियों के विरोध मे एकजुट हो जाती है.

इरान अब पूरी तरह से बेकाबू है…. और यही कारण है कि आस पास के सभी देशों पर हमला कर रहा है. इरान के पास Drone का बहुत बड़ा जखीरा है….. मिसाइल भी खूब हैं.

इसका यही अर्थ है, कि आने वाले दिनों मे भी आस पास के देशों मे हमले लगातार होते रहेंगे…. दुबई, अबू धाबी, मसकट, दोहा, शारजाह, सऊदी, ओमान, इराक आदि पर हमले जारी रहेंगे.

और इन हमलों से केवल जानमाल का नुकसान ही नहीं होगा…. इरान एक मनोवैज्ञानिक लड़ाई भी लड़ रहा है… इरान तो बर्बाद हो ही रहा है….. लेकिन वह आस पास के इलाकों को भी असुरक्षित कर देगा… जिसका प्रभाव वहां की economies, टूरिज्म और लोगों के मनोबल पर पड़ेगा.

इरान जिस हिसाब से चल रहा है… जल्दी ही वह जलडमरूमध्य ऑफ़ हॉर्मुज़ और Bab el-Mandeb को किसी ना किसी स्तर पर Chokeचोक कर देगा.

यहाँ से दुनिया का लगभग 40% तेल गैस का मूवमेंट होता है…. यह लड़ाई अगर कुछ हफ्ते भी चली तो पूरी दुनिया मे महंगाई बेतहाशा बढ़ने वाली है…. क्यूंकि पूरी सप्लाई चैन ही अन्स्टेबल हो जायेगी.

अब अमेरिका इजराइल को सोचना है… कि ऐसा क्या किया जाए कि इरान को निष्क्रिय किया जा सके. इरान को वेनेजुएला या इराक समझना बहुत बड़ी भूल होगी… और इसके बेहद गंभीर परिणाम पूरी दुनिया भुगतेगी.

अभी तो इन सभी देशों को जैसे तैसे इस लड़ाई को हफ्ते भर मे ख़त्म करने का प्रयास करना चाहिए…. उससे ज्यादा बढ़ने पर हाहाकार मचना तय है.

Source: Geo Politics

ईरान में सत्ता परिवर्तन की आहट: खामेनेई के बाद पश्चिमी दखल, खुफिया खेल और दुनिया की नई शक्ति-समीकरण की कहानी

अमेरिका-इजरायल के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत हो चुकी है। साथ में उनकी बेटी, दामाद, नाती की भी मौत हुई है। ईरान की सेना इसके बाद भी लड़ने का दम दिखा रही है, लेकिन अब बहुत लड़ाई बची नहीं है। यह तय मानिये कि ईरान में सत्ता बदल रही है और अमेरिका-इजरायल के हितों का ध्यान रखने वाली नयी सरकार बनने जा रही है। जैसा सीरिया में हुआ, जैसा वेनेजुएला में हुआ, वैसा ही ईरान में होना तय है।

अमेरिका-इजरायल ने 24 घंटे भी नहीं लगने दिये और ईरान की सत्ता का शीर्ष समाप्त कर दिया। मतलब अमेरिका-इजरायल की तैयारी जबरदस्त थी। बहुत होमवर्क किया गया होगा और उसे अच्छे से जमीन पर उतारा गया होगा। लोग बता रहे हैं कि मोसाद ने ईरान में चलने वाले एक ऐप को हैक कर लिया, जिस ऐप पर लोग धार्मिक कार्यों के लिए निर्भर करते थे। उसे हैक कर लोगों को भ्रमित करने वाले नोटिफिकेशन भेजे गये। इससे पहले एक रिपोर्ट आयी थी, उसमें बताया गया था कि ईरान ने अपनी सरकार-सेना में मोसाद की घुसपैठ पकड़ने के लिए एक एलीट यूनिट बनायी। बाद में मालूम हुआ कि उस एलीट यूनिट में भी 20 से ऊपर लोग मोसाद के लिए काम कर रहे थे। सोच सकते हैं मोसाद ने कहाँ तक घुसपैठ की होगी! ईरान की मौजूदा व्यवस्था में गहरी पैठ के बिना इतनी जल्दी खामेनेई का पतन संभव नहीं था। मोसाद ने दुनिया भर की खुफिया एजेंसियों के लिए एक नया चैप्टर जोड़ दिया है। अब बैठकर सब पढ़ें इसे।

दुनिया में दो तरह के लीडर होते हैं। एक लीडर, जो अपने लोगों के बेहतर भविष्य के लिए समझौते करते हुए चलता है। संतुलन बनाते हुए अपने देश और अपने लोगों को मजबूत बनाता है। सबसे बढ़िया उदाहरण- देंग श्याओपिंग। इस भाई ने कन्फ्यूसियस के सिद्धांतों का पालन किया। चुप मारकर चीन को आर्थिक ताकत बनाया। बहुत समझौते किये इसके लिए। उसी का परिणाम है आज जिनपिंग को ट्रंप के सामने निहुरना नहीं पड़ता है। दूसरा लीडर स्वाभिमान से संचालित होता है। वह मिट जायेगा, लेकिन स्वाभिमान नहीं बेचेगा। ऐसे लीडर्स का अंत सुखद नहीं होता, लेकिन अंत के बाद भी सम्मान मिलता है। खामेनेई इसके ताजा उदाहरण। खामेनेई की उम्र 86 साल थी। सोच सकते हैं 86 साल का एक बुजुर्ग, सामने तय मौत देखकर भी लड़ने के जज्बे के साथ खड़ा था। इसके लिए इतिहास इस बुजुर्ग को सदा सम्मान ही देगा।

एक और बड़ी सीख है कि कोई भी सत्ता हो, उसे इस हद तक निरंकुश नहीं होना चाहिए, कि अपने लोगों को ही बल से चलाना अपरिहार्य हो जाये। सत्ता के लिए शक्ति का उपयोग अनिवार्य है, लेकिन उसकी एक हद होनी चाहिए। वर्ना आप जिनके लिए लड़ने-मरने को तैयार होंगे, वही ऐन मौके पर दुश्मन से मिल जायेंगे।

इस घटनाक्रम ने दो स्पष्ट निष्कर्ष भी निकाले हैं। चीन की आर्थिक ताकत असंदिग्ध है, लेकिन उसके हथियारों की ताकत शुद्ध संदिग्ध है। पहले दुनिया ने ऑपरेशन सिंदूर में चीनी हथियारों का हश्र देखा। वेनेजुएला में अमेरिकी सेना आयी और राष्ट्रपति को उठाकर ले गयी। चीनी एयर डिफेंस धरा रह गया। और अब ईरान में। अमेरिका-इजरायल आया, सुप्रीम लीडर को सपरिवार साफ कर गया, और चीनी एयर डिफेंस देखता रह गया। जो देश चीनी हथियारों के दम पर शेर बन रहे हैं, अब सभी आराम से बैठकर सोच-विचार करेंगे। खुद चीन भी। दूसरा निष्कर्ष है:- फिलहाल चचा की चौधर बरकरार है और रहने वाली है। पुतिन भी ढीले पढ़ रहे हैं। उधर से खबर आ रही है कि रूस अब अमेरिका की वह शर्त मानने को तैयार हो गया है, जिसमें यूक्रेन को सुरक्षा की गारंटी देने की बात है। मतलब जो शांति समझौता होगा, उसमें यूक्रेन को अमेरिका से सुरक्षा की गारंटी मिलेगी। रूस इस शर्त को सिरे से खारिज करते आया है, लेकिन अब स्वीकार करने के लिए तैयार हो रहा है।

भारत के लिए भी इसमें लेसन हैं। कल दुनिया ने कई अरब देशों में ईरानी ड्रोन और मिसाइलों को गिरते देखा। बहुतों को हवा में ही मार गिराया गया, लेकिन कई सारे निशाने तक पहुँचे। जबकि उन सभी देशों के पास अमेरिकी एयर डिफेंस है। ऑपरेशन सिंदूर में भारत पर पाकिस्तान ने सैकड़ों ड्रोन-मिसाइल छोड़े। एक भी ड्रोन-मिसाइल निशाने पर नहीं लगा। यह हमारी सेना की तैयारी और उनके कौशल का प्रमाण है। हमारे पास कोई दैवीय तकनीक या हथियार नहीं है, लेकिन हमारे पास सेना बहुत अनुशासित और काबिल है। भारत के लिए एक और लेसन यह है कि पुरानी पीढ़ी के शानदार योगदानों को याद करें, उनका धन्यवाद कहें। इंदिरा गाँधी से अटल बिहारी वाजपेयी तक और भाभा से कलाम तक, हमारे बुजुर्गों ने हमें परमाणु शक्ति संपन्न नहीं बनाया होता, तो हमारी स्थिति भी ईरान-वेनेजुएला जैसी ही होती।

Source:Geo Politics

Apple ecosystem in India creates more than 250,000

new direct jobs

हमारे यहाँ कुछ ज्ञानी लोगों को यह समस्या होती है… कि सरकारें Corporates को सहायता क्यों करती हैं.. उन्हें टैक्स छूट या अन्य Relaxations क्यों मिलती हैं?

इसके बारे मे पहले भी कई बार लिख चुका हूँ…. लेकिन एक बार और बात करते हैं.. इस बार हम Apple की बात करते हैं.

Apple का नाम सुनते ही आपको Apple iphone याद आता है… लेकिन दरअसल Apple के कई products होते हैं… Phone, Tabs, Laptops, Peripherals, Airpods आदि.

चीन इस समय दुनिया मे Apple का सबसे बड़ा Manufacturing Base है. और हर साल Apple के products से चीन 300 बिलियन डॉलर का revenue generate करता है.

इसको अगर भारतीय रुपयों मे कन्वर्ट करें… तो यह होता है 9000 करोड़ * 300 = 27 लाख करोड़ रूपए.

मतलब हमारे Annual बजट का लगभग आधा.

भारत मे भी Apple का Ecosystem बन रहा है…. पिछले 5-6 साल मे Apple के Manufacturing Plants लगे हैं…. Apple के दर्जनों Suppliers और Vendors ने अपने Plants लगाए हैं.

टाटा, Hindalco, VVDN, Bharat Forge और Foxconn जैसे 46 वेंडर हैं Apple के…. इसके अलावा ढेरों अन्य भारतीय कम्पनिया हैं, जो फ़ोन और अन्य उत्पादों के अलग अलग components बनाती हैं.

और इन सबसे ढाई लाख Direct ( यह आंकड़ा कुछ source के हिसाब से साढ़े तीन लाख से ज्यादा है ) और इतनी ही Indirect Jobs generate हुई हैं.

जहाँ जहाँ Apple के प्लांट लगे हैं.. वहां के Real Estate मे अच्छी बढ़ोतरी हुई है…. वहां का लोकल Infra बेहतर हुआ है.

जो ढाई लाख Direct Jobs पैदा हुई हैं.. उसमे से 70% महिलाएं हैं.

और पिछले साल भारत ने 50 बिलियन डॉलर (लगभग 4,50,000 करोड़ रूपए) के iphone Export किये.

अब सवाल है कि सरकारों (केंद्र और राज्य) ने Apple और उसके Vendors को क्या क्या दिया.. जो यह Ecosystem तैयार हुआ है?

सरकारों ने यह फायदे दिए

1. PLI कैशबैक: 4-6% इनक्रिमेंटल सेल्स पर, Apple सप्लायर्स को ₹4400 करोड़+ मिले हैं।

2 कर्नाटक इंसेंटिव: Foxconn को ₹6970 करोड़ (जमीन 25%, मशीनरी 20% सब्सिडी, स्टांप ड्यूटी रिफंड)।

3. PLI नियम रिलैक्स: 6 में से 5 साल चुनने की छूट, प्रोडक्शन लक्ष्य हासिल करने पर भुगतान।

4. टैक्स/टैरिफ छूट: कंपोनेंट्स पर ड्यूटी कम, EMC क्लस्टर में सस्ती जमीन/इंफ्रा।

अब यहाँ आप देखिये….. साढ़े 4 लाख करोड़ का export हुआ…. कुछ लाख करोड़ का लोकल market मे भी सामान खपा होगा.

Direct Indirect Jobs को जोड़ दें… तो मान लीजिये 6-7 लाख लोगों को Jobs मिली….. ये लोग इनकम टैक्स भी भरेंगे सरकार को.

सरकार को Vendors से भी टैक्स मे पैसा मिलेगा.

कहने का अर्थ है… जो Apple Manufacturing Ecosystem देश मे था ही नहीं… वह कुछ Relaxation दे कर तैयार हो गया.

और सरकारों ने जितने पैसे का फायदा दिया.. उससे कई गुणा कुछ ही सालों मे कमा भी लेंगी.

अब जो लोग रोते रहते हैं… कि सरकारों को Corporates को फायदा नहीं देना चाहिए… वह लोग बताएं… कि कौन सा तरीका है इतनी jobs पैदा करने का? या इतना बड़ा Ecosystem तैयार करने का.

#विचारों_की_प्रयोगशाला

भारत ने दिखाया Semiconductor मैन्युफैक्चरिंग में बड़ा कमाल.

भारत ने दिखाया Semiconductor मैन्युफैक्चरिंग में बड़ा कमाल.

भारत में सेमिकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग अभी भी शैशव काल में है…. मतलब एकदम शुरूआती दौर में.

उस हिसाब से भी हम ठीक ठाक बढ़ रहे हैं… पिछले दिनों भारत में 28 Nano मीटर से लेकर 90 Nano मीटर (nm) की चिप्स बनी.

लोगों को लगा कि दुनिया तो 2 nm बना रही है.. और हम 28-90 वाली बना कर विश्वगुरु बन रहे हैं…. छाती पीट रहे हैं 🤣🤣

हालांकि यहाँ यह बताना जरूरी है कि जो सामान्य इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स , इक्विपमेंट्स और Cars आदि हैं.. उनमे इसी साइज की chips लगती हैं.

2nm Mobile और Computing आदि के लिए है.

लेकिन अब भारत ने 2nm का कारनामा भी कर दिया है.

अमेरिकी Semicon कंपनी Qualcomm… जिसका अमेरिका से बाहर सबसे बड़ा डिजाइनिंग सेण्टर बंगलौर में है….. जहाँ का सारा काम भारतीय टीम ही करती है…. वहां कल 2nm की Chip को Tapeout कर दिया गया है.

चिप टेपआउट Chip डिज़ाइन प्रक्रिया का अंतिम चरण होता है, जिसमें तैयार डिज़ाइन डेटाबेस को निर्माण के लिए सेमीकंडक्टर फाउंड्री को भेजा जाता है….. मतलब डिज़ाइन फाइनल हो चुका है… अब सिलिकॉन Wafers से chip बनाई जायेगी.

यह दर्शाता है कि सभी डिज़ाइन, वेरिफिकेशन और लेआउट जाँच (जैसे डिज़ाइन रूल चेक – DRC, LVS) पूरी हो चुकी हैं, और डेटा फोटोमास्क बनाने के लिए तैयार है. सरल अर्थ में कहें तो Chip अब Digital Form से Physical form में आने के लिए तैयार है.

भारतीय इंजीनियरों ने इस 2 nm chip मा प्री-टेपआउट वेरिफिकेशन सफलतापूर्वक कर लिया है. इस चरण में गहन सिमुलेशन और फिजिकल लेआउट निरीक्षण किए जाते हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि चिप सही तरीके से काम करेगी।

Tapeout शब्द की उत्पत्ति: यह Semicon और Electronics इंडस्ट्री में प्रचलित है…..जब लेआउट डेटा को फाउंड्री तक भेजने के लिए मैग्नेटिक टेप पर लिखा जाता था… उसे Tapeout कहते थे.

अब यह उपलब्धि कितनी बड़ी है… यह भी जान लीजिये.

Qualcomm India दुनिया की छठी कंपनी है.. जिसने 2 nm आर्किटेक्चर की Chip का डिज़ाइन और Tapeout चरण पार किया है.

इससे पहले TSMC, AMD, Apple, Mediatek और Samsung ने ही यह कारनामा किया है… वो भी पिछले ही साल.

इसी के साथ भारत ने 2nm के क्षेत्र में कदम रख दिया है. एक ऐसा क्षेत्र जहाँ कुछ महीने पहले तक भारत की कोई स्टैंडिंग ही नहीं थी.

Qualcomm की chip की designing पूरी तरह से भारत में हुई है… भारतीयो ने ही की. अब यह Design ताइवान या साउथ कोरिया भेजा जाएगा… क्यूंकि वहां Semicon फाउंड्रीज हैं.. जहाँ सिलिकॉन Wafers बनाये जाएंगे.

जल्दी ही भारत में भी कुछ सिलिकॉन फाउंड्रीज बन जाएंगी…. और 2030 तक सेमीकंडक्टर मैनुफैक्चरिंग की हर स्टेज भारत में ही कर ली जायेगी.

Source: 360° Degrees Blog

जातिवाद का भूत भगाने के लिए यह post जरूर पढ़ें…. जो कहते हैं कि जातिवाद हमारे धर्म में रचा बसा है… उनके लिए.

जातिवाद का भूत भगाने के लिए यह post जरूर पढ़ें…. जो कहते हैं कि जातिवाद हमारे धर्म में रचा बसा है… वह तो पक्का पढ़ें.

भगवान परशुराम जी ने अत्याचारी क्षत्रियों का संहार किया, फिर भी आज तक किसी राजपूत को परशुराम जी के प्रति क्रोध या घृणा भाव में नहीं देखा गया।

सप्तर्षियों में से एक, परमपिता ब्रह्माजी के मानस पुत्र ऋषि पुलस्त्य के पौत्र और विश्रवा के पुत्र, परम ज्ञानी महान ब्राह्मण रावण का वध श्रीराम ने किया। इसके बावजूद आज तक किसी ब्राह्मण को श्रीराम के प्रति तनिक भी क्रोध या घृणा भाव में नहीं देखा गया।

पौंड्रक के मित्र सुदक्षिण के बहकावे में आकर काशी के ब्राह्मण जब व्यभिचारी हो गए, तब पौंड्रक वध के पश्चात श्रीकृष्ण ने काशी को ब्राह्मण विहीन कर दिया। इसके बावजूद ब्राह्मण समाज में यादवश्रेष्ठ के प्रति कोई क्रोध या घृणा भाव दिखाई नहीं देता।

क्षत्रिय वर्ण द्वारा शासित कलिंग को तहस नहस कर उसके सैनिकों का संहार करने वाले शूद्र वर्ण के सम्राट अशोक को आज भी राजपूत समाज “जय सम्राट अशोक” कहकर सम्मान देता है।

चालुक्य वैष्णवों और पल्लव शैवों के बीच प्रतिशोधों का दौर जगजाहिर है। फिर भी आज न शैवों को वैष्णवों के प्रति और न वैष्णवों को शैवों के प्रति क्रोध, घृणा, द्वेष का भाव दिखाई देता है.

लेकिन जब एक शूद्र वर्ण के शंबुक द्वारा तामसिक तप किए जाने के कारण रामराज्य में असामयिक मृत्यु की घटनाएँ होने लगीं, तब उस स्थिति को रोकने के लिए श्रीराम को उसका वध करना पड़ा।

इसी कारण श्रीराम आज कुछ विशेष जाति आधारित विचारधाराओं के लिए संविधान के नाम पर खलनायक बना दिए गए हैं, जबकि उन्होंने यह समझने का प्रयास नहीं किया कि वनवासियों (भारद्वाज, अगस्त्य, मतंग, शबरी, कबंध, सुग्रीव आदि) तथा शूद्र वर्ण (वाल्मीकि, निषादराज गुह, केवट आदि) वालों के लिए श्रीराम कितने प्रिय एवं आदरणीय थे।”

(ज्ञातव्य रहे कि उत्तरकांड के अनुसार श्रीराम और शंबुक के बीच अत्यंत आदर भाव से संवाद हुआ था, और स्वयं शंबुक ने वैकुंठ गमन की इच्छा से श्रीराम से अपने वध का अनुरोध किया था।)

Source: 360° Degrees Blog

नजरिया बदलिए, नजारे बदल जाएंगे। 🙏

नजरिया बदलिए, नजारे बदल जाएंगे। 🙏

दोस्तों, मनोविज्ञान कहता है कि जब हम किसी व्यवस्था या व्यक्ति के प्रति मन में कड़वाहट पाल लेते हैं, तो हमें उसकी हर बात में खोट नजर आने लगती है। ‘Confirmation Bias’ का शिकार होकर हम वही देखते हैं जो हम देखना चाहते हैं, न कि वो जो सच है।

आज सोशल मीडिया पर एक सरकारी सर्कुलर (फोटो संलग्न) तैर रहा है, जिसमें ‘Physics Wallah’ के साथ मिलकर SC और OBC छात्रों को फ्री कोचिंग देने की बात कही गई है। इसे देखकर बहुत से मित्र भावुक हो रहे हैं और पूछ रहे हैं— “सामान्य वर्ग (General Category) ने क्या बिगाड़ा है? हमारे लिए कुछ क्यों नहीं?”

आइए, जरा ठंडे दिमाग से इसका ‘फैक्ट चेक’ करते हैं, हालांकि फिर सच बोलने के लिए मुझे IT सेल वाला बोल दिया जाएगा। 😂😂

यह सर्कुलर ‘सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय’ (Ministry of Social Justice and Empowerment) का है। संविधान के तहत इस मंत्रालय का गठन ही SC, OBC, दिव्यांगजन (PwD) और वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए हुआ है।

ध्यान दीजिए, इसमें ST (अनुसूचित जनजाति) का भी जिक्र नहीं है, क्योंकि उनके लिए अलग से ‘जनजातीय कार्य मंत्रालय’ है।

अब अगर हम यह सवाल करें कि “अल्पसंख्यक मंत्रालय के बजट से मंदिरों के पुजारियों को सैलरी क्यों नहीं मिलती?” तो यह तार्किक नहीं होगा, क्योंकि वह मंत्रालय विशेष रूप से अल्पसंख्यकों के लिए बना है। ठीक वैसे ही, यह मंत्रालय अपने आवंटित कोटे (Mandate) के अनुसार ही काम कर रहा है।

अगर किसी वर्ग के लिए आवंटित बजट को ‘फ्री रेवड़ी’ की तरह बांटने के बजाय उनकी शिक्षा और कोचिंग पर खर्च किया जा रहा है, तो एक सभ्य समाज के तौर पर हमें इसका स्वागत करना चाहिए। शिक्षित युवा ही राष्ट्र निर्माण करेंगे।

अब आते हैं सबसे बड़े सवाल पर, “सामान्य वर्ग के लिए क्या है?”

दोस्तों, एक चीज से नाराज होकर हर चीज को खारिज मत कीजिए। केंद्र सरकार (विशेषकर शिक्षा मंत्रालय) के पास ‘सामान्य वर्ग’ और EWS (आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग) के मेधावी छात्रों के लिए भी कई बेहतरीन स्कॉलरशिप स्कीम्स हैं। कमी सरकार की नियत में नहीं, हमारी जानकारी में है।

सामान्य वर्ग (General/EWS) के लिए कुछ प्रमुख केंद्रीय योजनाएं:

1. Central Sector Scheme of Scholarship (CSSS): यह विशेष रूप से कॉलेज और यूनिवर्सिटी के छात्रों के लिए है। इसमें जाति का कोई बंधन नहीं है, यह मेरिट (80th Percentile) और आय के आधार पर मिलती है।

2. प्रधान मंत्री रिसर्च फेलोशिप (PMRF): उच्च शिक्षा और रिसर्च के क्षेत्र में यह देश की सबसे प्रतिष्ठित फेलोशिप है, जो टैलेंट के आधार पर मिलती है, जाति के आधार पर नहीं।

3. National Means-cum-Merit Scholarship (NMMSS): आर्थिक रूप से कमजोर मेधावी छात्रों के लिए, जो सभी वर्गों के लिए खुली है।

4. AICTE प्रगति और सक्षम स्कॉलरशिप: तकनीकी शिक्षा ले रही बालिकाओं और दिव्यांगों के लिए, चाहे वे किसी भी वर्ग से हों।

5. CSIS (ब्याज सब्सिडी योजना): शिक्षा ऋण (Education Loan) पर ब्याज माफी की योजना, जो EWS श्रेणी के सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए उपलब्ध है।

इसलिए, अनुरोध है कि सोशल मीडिया पर तैरती आधी-अधूरी खबरों से अपना रक्तचाप न बढ़ाएं। तथ्यों को पढ़ें, समझें और अगर आलोचना करनी भी हो, तो सही तर्कों के साथ करें।

नफरत नहीं, जानकारी फैलाएं।

Source: 360° Degrees Blog

आज के बजट में रेयर-अर्थ मेटल (REM) की माइनिंग को लेकर एक बड़ी घोषणा की गई है। इसके तहत तमिलनाडु, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और केरल — इन चार राज्यों में माइनिंग कॉरिडोर बनाने का ऐलान हुआ है।

आज के बजट में रेयर-अर्थ मेटल (REM) की माइनिंग को लेकर एक बड़ी घोषणा की गई है। इसके तहत तमिलनाडु, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और केरल — इन चार राज्यों में माइनिंग कॉरिडोर बनाने का ऐलान हुआ है।

• इससे मोबाइल, इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर पैनल, मिसाइलों आदि के लिए जरूरी धातुएँ देश में ही उपलब्ध होंगी। रडार, ड्रोन, फाइटर जेट, परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए आवश्यक धातुओं में आत्मनिर्भरता हासिल की जा सकेगी। फिलहाल इन धातुओं के बाजार में चीन का दबदबा है। खनन, प्रोसेसिंग उद्योग (दोनों ही लेबर-इंटेंसिव हैं) और रिसर्च के चलते बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होंगे।

अब एक बात, जो बजट में सीधे-सीधे नहीं कही गई है…

• ये चारों राज्य समुद्री तटवर्ती (Maritime) राज्य हैं और मिलकर भारत के थोरियम भंडार का एक बड़ा हिस्सा रखते हैं। यह थोरियम मुख्य रूप से मोनाज़ाइट रेत वाले तटीय क्षेत्रों में पाया जाता है, जहाँ रेयर-अर्थ मेटल्स का खनन होता है।

• रेयर-अर्थ कॉरिडोर और थोरियम का भौगोलिक वितरण आपस में मेल खाता है।

थोरियम भारत की दीर्घकालिक परमाणु ऊर्जा रणनीति का केंद्र बिंदु है।

• थोरियम भंडार के मामले में

– तमिलनाडु अत्यंत समृद्ध (मनवलकुरीची, कुडनकुलम),

– केरल अत्यंत समृद्ध (चवारा–अलप्पुझा प्लेसर),

– आंध्र प्रदेश समृद्ध (भीमुनिपटनम–श्रीकाकुलम),

– ओडिशा मध्यम से समृद्ध (गोपालपुर–पुरी) श्रेणी में आता है।

• भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े थोरियम भंडारों में से एक है

(दुनिया के ज्ञात भंडारों का लगभग 30%)।

• थोरियम परमाणु ऊर्जा से जुड़ा होने के कारण रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील विषय है। इसलिए भले ही रेयर-अर्थ कॉरिडोर को ‘परमाणु ऊर्जा से असंबंधित’ REM धातुओं के लिए बताया जा रहा हो, थोरियम उसका सह-उत्पाद (co-product) बना ही रहेगा।

सरल शब्दों में: “कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना!”

अब वह बात, जिसे बजट में बताने की जरूरत ही नहीं थी, बल्कि हमें खुद समझनी चाहिए…

• राम सेतु के आसपास का रामेश्वरम, तूतिकोरिन (थूथुकुडी) और मन्नार की खाड़ी का पूरा तटीय क्षेत्र भारत के सबसे अधिक थोरियम-युक्त क्षेत्रों में से एक है।

• सोनिया गांधी के समय प्रस्तावित सेतुसमुद्रम परियोजना का उद्देश्य राम सेतु को तोड़कर वहाँ से समुद्री व्यापार शुरू करना था और तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश व ओडिशा में पोर्ट डेवलपमेंट के नाम पर रोजगार का लालच दिखाया गया था।

• राम सेतु से किसी भी तरह की भौतिक छेड़छाड़ से गाद के प्रवाह में बदलाव, रेडियोधर्मी थोरियम-युक्त रेत का फैलाव और परिणामस्वरूप भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक खनिज सुरक्षा को खतरा हो सकता था। उस समय भी इस क्षेत्र में थोरियम होने के प्रमाण मौजूद थे। अमेरिका को भी यह जानकारी थी। राम सेतु तोड़ने का ठेका एक अमेरिकी कंपनी को दिया गया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया।

• राम सेतु का थोरियम से अप्रत्यक्ष लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण संबंध है, क्योंकि यह ऐसे तटीय क्षेत्र में स्थित है जहाँ मोनाज़ाइट रेत बड़ी मात्रा में पाई जाती है। इसी मोनाज़ाइट में रेयर-अर्थ मेटल्स के साथ-साथ थोरियम भी होता है। राम सेतु के कारण ही यह रेत आज तक भारतीय तटों पर स्थिर बनी हुई है।

राम सेतु के क्षेत्र में पर्यावरणीय, सांस्कृतिक और परमाणु-रणनीतिक पहलू एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। आज का बजटीय निर्णय राम सेतु को सुरक्षित रखते हुए भारत को रेयर-अर्थ मेटल्स में आत्मनिर्भर बनाएगा और साथ ही वानर सेना द्वारा बनाए गए सेतु के कारण हजारों वर्षों से जमा हुआ थोरियम, भारत के आर्थिक (और सैन्य) महाशक्ति बनने का मार्ग भी प्रशस्त करेगा।

कहानी की सीख:

बजट केवल सरकार की आय-व्यय का दस्तावेज नहीं होता। बजट में निहित कई नीतियों का असली अर्थ “Reading Between The Lines” करने पर समझ में आता है।

Source:- 360° Degrees Blog

Union Budget 2026–27 में भारत में डेटा सेंटर लगाने वाली विदेशी क्लाउड/डेटा सर्विस कंपनियों के लिए 2047 तक का टैक्स हॉलीडे (क़रीब 20–22 साल की टैक्स छूट/राहत) प्रस्तावित किया गया है।

Union Budget 2026–27 में भारत में डेटा सेंटर लगाने वाली विदेशी क्लाउड/डेटा सर्विस कंपनियों के लिए 2047 तक का टैक्स हॉलीडे (क़रीब 20–22 साल की टैक्स छूट/राहत) प्रस्तावित किया गया है।

यह अपने आप में बहुत बड़ा कदम है… जो Technology और इंफ्रास्ट्रक्चर में क्रन्तिकारी बदलाव ला सकता है।

नये प्रावधान क्या है?

जो विदेशी कंपनियाँ भारत में डेटा सेंटर/क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर सेट‑अप कर के दुनिया भर के ग्राहकों को क्लाउड या डेटा सेवाएँ देंगी, उन्हें 2047 तक कॉर्पोरेट टैक्स में छूट दी जाएगी (ओवरसीज़ सर्विस रेवेन्यू पर)।

ये विदेशी कम्पनिया कौन सी हैं?

जैसे AWS (Amazon), माइक्रोसॉफ्ट (Azure), Google (GCP), Oracle, Alibaba, Digital Ocean आदि…. और इन जैसी कई बड़ी कम्पनिया हैं… जो Cloud Service Providers हैं… जिनके हजारों Hyperscale Datacenter पूरी दुनिया में हैं.

शर्त यह है कि ग्राहकों को सेवाएँ सीधे नहीं, बल्कि भारत में रजिस्टर्ड किसी इंडियन रिसेलर एंटिटी के ज़रिये दी जाएँगी; इंडियन रिसेलर पर सामान्य टैक्स लागू रहेगा।

मतलब इन कम्पनिओं को भारत में किसी कंपनी के साथ मिल कर Services देनी होंगी… तब उन्हें टैक्स लाभ मिलेगा.

अगर डेटा सेंटर ऑपरेटर और विदेशी क्लाउड कंपनी आपस में संबद्ध (related party) हैं, तो भारत में डेटा सेंटर चलाने वाली एंटिटी के लिए 15% कॉस्ट‑प्लस का सेफ़ हार्बर मार्जिन प्रस्तावित है, ताकि ट्रांसफर‑प्राइसिंग विवाद कम हों।

इससे फायदे क्या होंगे?

1. इस लंबे टैक्स हॉलीडे से बड़े ग्लोबल प्लेयर्स भारत में भारी पूँजी लगाकर डेटा सेंटर पार्क, हाइपर‑स्केल सुविधाएँ और क्लाउड रीजन विकसित करने के लिए प्रेरित होंगे.

2. डिजिटल इंफ्रा बूस्ट: 5G, AI, फिनटेक, ई‑गवर्नेंस, डिजिटल पब्लिक इंफ्रा (जैसे UPI, ONDC, DEPA आदि) के लिए लोकल डेटा सेंटर कैपेसिटी तेज़ी से बढ़ेगी, जिससे देश की डिजिटल क्षमता और रेज़िलिएंस मजबूत होगी।

3. रोज़गार, रियल एस्टेट और लोकल इंडस्ट्री को फायदा होगा…. क्यूंकि डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स को बनाने और Maintain करने में भूमि, कंस्ट्रक्शन, पावर, कूलिंग, नेटवर्क, सिक्योरिटी, फाइबर, मेंटेनेंस आदि में भारी निवेश होता है, जिससे लाखों डायरेक्ट और इंडायरेक्ट जॉब्स बनेंगी।

4. रियल एस्टेट (इंडस्ट्रियल/आईटी पार्क), पावर यूटिलिटीज, रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स, केबलिंग, हार्डवेयर सप्लाई, एमईपी कॉन्ट्रैक्टर्स, लोकल आईटी सर्विस कंपनियों को लंबी अवधि तक स्थिर काम और रेवेन्यू मिलेगा.

5. भारत में ज़्यादा और बड़े डेटा सेंटर होने से लो‑लेटेंसी, हाई‑परफॉर्मेंस क्लाउड रीजन उपलब्ध होंगे, जिससे AI, Big Data, गेमिंग, SaaS, फिनटेक जैसी सर्विसेज़ की क्वालिटी बेहतर होगी.

6. ग्लोबल और लोकल प्लेयर्स की प्रतिस्पर्धा से लंबे समय में क्लाउड सर्विस प्राइसिंग पर दबाव बनेगा, जिससे स्टार्टअप, एसएमई और डेवलपर कम कॉस्ट पर स्केलेबल क्लाउड इंफ्रा यूज़ कर पाएँगे।

7. नीतिगत व स्ट्रेटेजिक फायदा – 2047 तक का क्लियर, लॉन्ग‑टर्म टैक्स फ्रेमवर्क मिलने से कंपनियाँ 15–20 साल के लिए कैपिटल‑इंटेंसिव डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स (हाइपर‑स्केल, मल्टी‑रीजन क्लस्टर) का प्लान कॉन्फिडेंस के साथ कर सकती हैं.

किस तरह की IT या इंजीनियरिंग Jobs बढ़ेंगी?

आज भी अगर डाटासेंटर बनता है तो उसमे Mechanical Electrical, Electronics, और IT की jobs बढ़ती हैं.

लेकिन अगर हम Edge, Hyperscale या फिर Cloud Region बनाने की बात करें… तो उसमे Cloud Experts, ITSM, Sustainability Experts, Cyber Security experts, Automation Experts, AI experts, Ethical AI की jobs बड़े स्तर पर आएँगी

इसके अलावा Datacenters को चलाने के लिए Power भी चाहिए, एयर Conditioning भी चाहिए…. इस सेक्टर में ही बड़े स्तर पर नौकरियां पैदा होंगी.

भारत में अभी ही Datacenters के लिए बड़े स्तर पर investment हो रहा है….. इस नई नीति के बाद इसमें काफी तेजी आएगी.. यह तय है.

मेरा मानना है कि पहाड़ी राज्यों और North East वाले राज्यों को इस नीति का फायदा उठाना चाहिए…. वहां पानी भी बहुत है, एयर Conditioning की जरूरत भी optimum होगी.

Sources: Geo Politics

2016 में जब भारत सरकार और फ़्रांस की सरकार राफेल जेट और ऑफसेट आदि की बात कर रही थी.. उस समय फ़्रांस ने भारत को संवेदनशील GaN तकनीक transfer करने से मना कर दिया था.

2016 में जब भारत सरकार और फ़्रांस की सरकार राफेल जेट और ऑफसेट आदि की बात कर रही थी.. उस समय फ़्रांस ने भारत को संवेदनशील GaN तकनीक transfer करने से मना कर दिया था.

फ़्रांस सरकार ने कहा था कि हम आपको जेट्स दे देंगे… लेकिन यह तकनीक देना संभव नहीं होगा.

फ़्रांस भी अपनी जगह ठीक था.

कई सालों की मेहनत और अरबों रूपए के research के बाद फ़्रांस ने यह तकनीक हासिल की थी…. दुनिया में छह ही देश हैं (अमेरिका, रूस, फ़्रांस, चीन, साउथ कोरिया) जिनके पास यह तकनीक है…. ऐसे कैसे कोई दे देता?

फिर भारत ने ठाना कि अब हम खुद बनाएंगे.

और आज भारत यह तकनीक खुद बनाने वाला दुनिया का सातवा देश बन गया है. DRDO ने यह तकनीक बना ली है.

दिल्ली में सॉलिड स्टेट फिजिक्स लेबोरेटरी और हैदराबाद में गैलियम आर्सेनाइड एनेबलिंग टेक्नोलॉजी सेंटर में यह काम किया गया.

DRDO ने 4-इंच डायमीटर वाले सिलिकॉन कार्बाइड वेफर्स बनाने की capability हासिल कर ली है….साथ ही 150W तक के GaN हाई इलेक्ट्रॉन मोबिलिटी ट्रांजिस्टर भी तैयार कर लिए हैं.

अब सवाल है कि ये GaN टेक्नोलॉजी क्या है?

Gallium Nitride (GaN)एक बेहद उच्च कोटि का semiconductor material है जो Modern फाइटर जेट्स, जैसे कि रफाल के राडार और electronic warfare systems (Spectra) बनाने के काम आता है.

Spectra तो आपको याद होगा ही…. जो रफाल जेट्स को हमलों से सुरक्षित रखता है.. और Decoy Capabilities देता है….. पाकिस्तानी मिसाइल ने कुछ Decoy Components ही गिराए थे…. हमारे रफाल नहीं.

अगर भारत की बात की जाए… तो GaN चिप्स Su-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों के लिए विरूपक्ष एडवांस्ड रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, मिसाइलें, ड्रोन और कई तरह के advanced Naval platforms को शक्ति प्रदान करने के लिए आवश्यक हैं।

इसके अलावा यह Chip सैटेलाइट, 5G बेस स्टेशन और Green Energy ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भी उपयोगी है.

GaN क्यों जरूरी है?

1. यह पारंपरिक सिलिकॉन चिप की तुलना में 300 गुना तेजी से स्विचिंग करता है…जो Advanced Platforms के लिए बेहद जरूरी है.

2. यह 1000 डिग्री temperature पर भी आराम से काम करता है.

भारत के लिए बड़ी Opportunity है… क्यूंकि अभी GaN का Global Market 5 बिलियन डॉलर का है… जो अगले 10 सालों में 10 गुणा होने वाला है.

भारत इस market पर ठीक ठाक Hold बना सकता है… क्यूंकि भारत High Tech चीजों में Low Price और High Quality deliver करता है.

Source:Geo Politics

ताज़ा खबर है कि सुप्रीम कोर्ट ने UGC रेगुलेशन पर रोक लगा दी है… और Final निर्णय होने तक 2012 वाली रेगुलेशन ही लागू रहेगी. (जिज्ञासु लोग 2012 वाली रेगुलेशन भी पढ़ें, जो 14 सालों से लागू है और पता लगाएं कितने सवर्ण जेल भेजे गए)

ताज़ा खबर है कि सुप्रीम कोर्ट ने UGC रेगुलेशन पर रोक लगा दी है… और Final निर्णय होने तक 2012 वाली रेगुलेशन ही लागू रहेगी. (जिज्ञासु लोग 2012 वाली रेगुलेशन भी पढ़ें, जो 14 सालों से लागू है और पता लगाएं कितने सवर्ण जेल भेजे गए)

इससे मामला फिलहाल के लिए थम जाएगा.

लेकिन क्या यह Resolution है? कतई नहीं.

किसी भी मुद्दे पर हल्ला मचाने से पहले जरूरी है उसके बारे में तथ्य समझें जाएं.. जाने जाएं… क्यूंकि उसके बिना विरोध छिछला होता है.

यूं तो मैं यह Post तीन दिन पहले लिख चुका था… लेकिन नहीं post की.. क्यूंकि कोई सुनने को तैयार नहीं था….. लेकिन अब इस पर रोक लग गई है… तो post कर देता हूँ.

बात UGC की रेगुलेशन की करते हैं.

आधी जनता तो इसे कानून मान कर बावली हुई पड़ी है.. जबकि यह कानून नहीं है… कोई एक्ट नहीं है.. रेगुलेशन है…. जो UGC ने दिया है.

अब UGC ने क्यों रेगुलेशन दी?

रोहित वेमुला (जिसने आत्महत्या कर ली थी) उसकी माँ राधिका वेमुला और पायल तड़वी (जिनकी medical student बेटी ने आत्महत्या कर ली थी) ने 2019 में एक Public Interest Litigation file की…..और कहा कि इनके बच्चों के साथ भेदभाव हुआ… जिसके कारण उन्होंने आत्महत्या की… और अब कोर्ट इस मामले दखल दे… और UGC की 2012 की रेगुलेशन को कड़ाई से लागू करवाये और एक framework बनाये जिससे ऐसी घटनाये भविष्य में ना हों.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में UGC और केंद्र सरकार को नोटिस भेजे.

लगभग इसी समय पर IIT के दो छात्रों की आत्महत्या का case भी शुरू हुआ… उनका कारण भी Caste Descrimination बताया गया. इस case में एक National Task फोर्स का गठन हुआ.. और उसमे एक भूतपूर्व जज को यह जिम्मेदारी दी गई कि वह शिक्षण संस्थाओ में भेदभाव से होने वाली घटनाओ को रोकने के लिए framework बनाएं.

इन सभी cases की सुनवाई चलती रही… और अंततः जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने UGC को आदेश दिया कि वह Regulations बनाये… Equal Opportunity Cell बनाये…. सभी केंद्रीय और राज्य स्तर के यूनिवर्सिटी और कॉलेज से data ले.

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान के आर्टिकल 15 और 16 में निहित Clause आदि के base पर रेगुलेशन बनाई जाएं…….. यहाँ आपको यह दोनों आर्टिकल याद रखने है… आगे काम आएंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने UGC को IIT Students के case में बनाई Task Force के इनपुट्स लेने को भी कहा… ताकि एक व्यापक framework बनाया जा सके.

सितम्बर 2025 में दोनों cases ने पेटिशनर्स ने UGC को Recommendations दी… क्या add करना है… क्या हटाना है… सब बताया.

सुप्रीम कोर्ट ने UGC को Regulations submit करने को कहा…. और अंततः जनवरी 2026 में यह लागू हो गई.

यहाँ यह भी बताना जरूरी है कि दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता में एक संसदीय समिति भी बनाई गई थी… जिसका काम था UGC के काम को देखना और रेगुलेशन पर सभी के इनपुट्स लेना.

समिति ने पाया कि UGC ने 2023 से, जब उसने इन नए नियमों का ड्राफ्ट बनाना शुरू किया था, विनियमों को अंतिम रूप देने में देरी की है, और यह केवल सुप्रीम कोर्ट के दखल के कारण ही संभव हुआ कि उसने इन विनियमों को समय पर जारी किया। समिति ने पाया कि ये विनियम अभी ड्राफ्ट स्टेज में हैं और जनता की टिप्पणियों के लिए खुले हैं; यह सिफारिश करती है कि UGC इन्हें अंतिम रूप देने से पहले इन विनियमों पर समिति से सलाह ले… लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ… और जनवरी 2026 में UGC ने यह रेगुलेशन लागू कर दी.

यहाँ Lapse है…. इसके लिए UGC और सरकार को दोषी माना जाना चाहिए…. कि बिना Finalize किये रेगुलेशन लागू कैसे कर दिए…. जबकि यह अभी final भी नहीं हुआ था.

आज सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा कर ठीक किया…. अब इसमें बदलाव होंगे और उसके बाद इसे पुनः लागू किया जाएगा.

अब यहाँ कुछ और प्रश्न हैं… जो लोग पूछ रहे हैं.

1. कि शोषित में सवर्णों को क्यों शामिल नहीं किया गया है?

2. कि सवर्णों को शोषक क्यों मान लिया जाता है bydefault

इसका एक ही उत्तर है.

सुप्रीम कोर्ट ने किस आर्टिकल के अनुसार रेगुलेशन बनाने को कहा.

आर्टिकल 15 और 16.

आर्टिकल 15 16 को आप पढ़िए…. आपको सारा खेल समझ आएगा.

अनुच्छेद 15 और 16, अनुसूचित जातियों (SCs), अनुसूचित जनजातियों (STs) और अन्य पिछड़े वर्गों (OBCs) के व्यक्तियों के लिए विशेष प्रावधान करते हैं, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से भेदभाव और असमानता का सामना करना पड़ा है।

मतलब.. Bydefault इन समूहो को शोषित माना गया है… और अन्य को बिना नाम लिए ही शोषक बना दिया गया है.

जब तक यह मूल भूत Definition नहीं बदलेंगी… तब तक इन पर बने कानून या regulations कैसे भेदभाव रहित हो सकती हैं?

👉360° Degrees Blog

🇬🇧🇮🇱🇵🇸 कैसे ब्रिटेन ने इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष को जन्म दिया

आज यह ख़बरें आ रही हैं कि टोनी ब्लेयर को “गाज़ा इंटरनेशनल ट्रांज़िशनल अथॉरिटी” का वायसराय बनाया जा सकता है। लेकिन असली सवाल यह है कि गाज़ा का यह दुःस्वप्न और संपूर्ण इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष ब्रिटिश चालबाज़ियों और क्षेत्रीय राजनीति में दखल के बिना कभी अस्तित्व में आता ही नहीं।

🔴 1915 (प्रथम विश्व युद्ध के दौरान)

ब्रिटेन ने अरब नेताओं को उकसाया कि वे अपने उस्मानी (Ottoman) शासकों के ख़िलाफ़ विद्रोह करें। बदले में वादा किया गया कि युद्ध के बाद उन्हें एक स्वतंत्र अरब राज्य मिलेगा, जिसमें फ़िलिस्तीन भी शामिल होगा।

🔴 1916 (साइक्स-पिकोट समझौता)

ब्रिटेन और फ्रांस ने गुप्त रूप से एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें उस्मानी साम्राज्य को तोड़कर अपने-अपने प्रशासनिक हिस्सों में बाँट लिया गया। यानी अरबों से किया वादा टूट गया और उन्हें धोखा मिला।

🔴 1917 (बैलफ़ोर घोषणा-पत्र)

रॉथ्सचाइल्ड परिवार और ज़ायनिस्ट आंदोलन की लॉबिंग के दबाव में ब्रिटेन ने बैलफ़ोर डिक्लेरेशन जारी किया। इसमें कहा गया कि ब्रिटेन “फ़िलिस्तीन में यहूदी लोगों के लिए एक राष्ट्रीय घर की स्थापना” का समर्थन करेगा। उस समय फ़िलिस्तीन की कुल आबादी में यहूदी 10% से भी कम थे। अरबों को फिर धोखा मिला।

🔴 1920 से 1948 तक (ब्रिटिश मंडेट फॉर पलेस्टाइन)

ब्रिटेन की औपनिवेशिक सरकार ने फ़िलिस्तीन में ज़ायनिस्टों को राज्य जैसी संस्थाएँ खड़ी करने में मदद दी। उदाहरण के लिए, ज्यूइश एजेंसी सलाहकार निकाय बना और हगाना नामक यहूदी सैन्य संगठन विकसित हुआ। लेकिन अरबों के लिए ऐसी कोई संस्थाएँ नहीं बनाई गईं।

🔴 यहूदी आव्रजन और भूमि ख़रीद

ब्रिटेन ने यहूदियों के फ़िलिस्तीन में बड़े पैमाने पर आव्रजन और ज़मीन ख़रीद को बढ़ावा दिया। नतीजतन 1939 तक यहूदी जनसंख्या बढ़कर लगभग 30% हो गई। इस असमानता ने ज़मीन और संसाधनों पर हिंसक झड़पों को जन्म दिया। 1936 से 1939 के बीच अरबों ने ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ विद्रोह किया, जिसे ब्रिटेन ने बलपूर्वक कुचल दिया।

🔴 1939 के बाद

ब्रिटेन ने यहूदी आव्रजन पर रोक लगाने की कोशिश की। इससे ज़ायनिस्ट ब्रिटिश शासन के विरोधी हो गए और उन्होंने ब्रिटिश सैनिकों व राजनयिकों की हत्या शुरू कर दी।

🔴 मई 1948

ब्रिटेन ने फ़िलिस्तीन से हाथ खींच लिया और उसी के बाद इज़रायल के गठन की घोषणा कर दी गई।

🔴 औपनिवेशिक धरोहर

भारत-पाकिस्तान, नाइजीरिया, सूडान और अन्य जगहों की तरह ही, ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने फ़िलिस्तीन में भी एक ऐसा विवाद बोया, जो पीढ़ी दर पीढ़ी हिंसा और संघर्ष को जन्म देता रहा है और आज 21वीं सदी तक जारी है।

और अब यह उम्मीद लगाई जा रही है कि अगर गाज़ा का नियंत्रण टोनी ब्लेयर (जिन्हें कभी “अमेरिका का पालतू कुत्ता” कहा जाता था) के हाथों में दे दिया जाए, तो शायद हालात बदलेंगे? 🤡

THE GREAT NICOBAR PROJECT

सोनिया गांधी ने निकोबार पर एक बहुत बड़ा लेख लिखा है। जिसमें निकोबार द्वीप के लिए बटाला हाउस जैसे आंसू बहाएं गए हैं।

यह लेख केवल “पर्यावरणीय चिंता” का मामला भर नहीं है। वह बहुत कम लिखती हैं, और जब भी लिखती हैं तो उसके पीछे कोई गहरी रणनीतिक या राजनीतिक वजह होती है।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट कागज़ पर एक विकास योजना है—₹75,000 करोड़ का निवेश, जिसमें गालथेया बे में कंटेनर पोर्ट, ग्रीनफ़ील्ड एयरपोर्ट, पॉवर प्लांट्स, टाउनशिप, इंडस्ट्रियल ज़ोन और लग्ज़री टूरिज़्म शामिल है।

लेकिन असल मायनों में यह भारत की समुद्री रणनीति का आधार स्तंभ है। मालक्का जलडमरूमध्य से सटे अंडमान–निकोबार द्वीप भारत को वही बढ़त देते हैं जो चीन कभी भी भारत को नहीं देना चाहेगा।

चीन की ऊर्जा सुरक्षा का सबसे बड़ा हिस्सा यहीं पर अटका हुआ है। चीन का लगभग 80% तेल आयात मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। और यही वह जगह है जहां भारत की एंडमान और निकोबार कमांड एक निर्णायक भूमिका निभा सकती है। अगर कभी संघर्ष की स्थिति बनी तो भारतीय नौसेना इस मार्ग को अवरुद्ध कर सकती है और चीन की सप्लाई लाइन पर सीधा दबाव बना सकती है। यही कारण है कि चीन इस क्षेत्र को लेकर बेहद असुरक्षित महसूस करता है।

पहले इस क्षेत्र की गश्त इंडोनेशिया और मलेशिया की नौसेनाएँ करती थीं, लेकिन अब भारत ने अपनी नौसैनिक मौजूदगी को कई गुना बढ़ा दिया है। इतना ही नहीं, इंडोनेशिया ने स्वयं भारत से अनुरोध किया है कि आपसी सहयोग और इंटरऑपरेबिलिटी बढ़ाई जाए ताकि क्षेत्रीय सुरक्षा को मज़बूत किया जा सके।

मोदी सरकार ने बीते कुछ सालों में अंडमान में सैन्य ढांचे को बेहद तेजी से मज़बूत किया है।

अत्याधुनिक निगरानी प्रणालियाँ (Surveillance capabilities),

और सबसे अहम अंडरसी केबल प्रोजेक्ट, जिसने संचार व्यवस्था को सुरक्षित और मज़बूत किया है।

इसीलिए मोदी सरकार ने वहाँ ट्राई-सर्विस कमांड (Andaman & Nicobar Command) को मज़बूत करना शुरू किया है। INS Baaz और Kohassa जैसे एयरबेस को फाइटर जेट और निगरानी विमानों के लिए अपग्रेड किया जा रहा है, नेवी और मर्चेंट के लिए नए जेट्टी और लॉजिस्टिक हब बन रहे हैं। यह सब सिर्फ़ टूरिज़्म या व्यापार के लिए नहीं है, बल्कि हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) में भारत की सैन्य और सामरिक मौजूदगी को मज़बूत करने के लिए है।

अब देखिए विरोध करने वाले कौन हैं।चीन और पाकिस्तान क्योंकि यह प्रोजेक्ट भारत को स्ट्रेट ऑफ़ मालक्का पर पकड़ देता है, जहाँ से चीन का तेल और व्यापारिक जहाज़ गुजरते हैं।

सोनिया गांधी और पोषित एनजीओ भी विरोध में हैं और पर्यावरण, जनजातीय अधिकार और स्थानीय इकोलॉजी की चिंता दिखाकर घरेलू राजनीति में विरोध का चेहरा बनना चाहते हैं। ऐसा चेहरा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी आसानी से बिकती है। खुब फंडिंग भी होती है। NGOs और तथाकथित पर्यावरण कार्यकर्ता इनके ज़रिए विदेशी दबाव बनाते जैसा स्टरलाइट, पोस्को या नर्मदा विरोध में हुआ था।

वहीं भारतीय सेना और नौसेना के इस समुद्र में दबदबे के लिए ये प्रोजेक्ट एक सामरिक वरदान है।

वही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) जिसने पर्यावरण क्लीयरेंस दी है, यानी “इकोलॉजी” सिर्फ़ एक बहाना है।

नरेंद्र मोदी सरकार इस प्रोजेक्ट को अपनी हिंद-प्रशांत रणनीति और आर्थिक एजेंडे का अहम हिस्सा मानती है,हर हाल में इसे पूरा करना चाहती है।

सच यही है कि यह लड़ाई पेड़ों और कछुओं के नाम पर लड़ी जाएगी, लेकिन असल में यह भारत की सामरिक स्वतंत्रता बनाम चीन की समुद्री सुरक्षा की जंग है। आने वाले समय में आपको देश-विदेश में “पर्यावरण बचाओ” के नाम पर खूब विरोध और रिपोर्ट्स देखने को मिलेंगी, लेकिन असली टकराव हिंद-प्रशांत की भू-राजनीति से है।

🇺🇸 US की इंडिया 🇮🇳पर दोहरी चाल

आज जो घटनाक्रम हुआ है, वो साफ़ दिखाता है कि अमेरिका की सोच भारत को लेकर कितनी उलझी हुई है।

👉 ट्रंप ने फिर से रूस पर नए sanctions लगाने की बात कही है। सीधी बात है — इसका असर उन देशों पर भी पड़ सकता है जो रूस से तेल खरीद रहे हैं। और आप जानते हैं कि इस लिस्ट में भारत का नाम भी हमेशा ऊपर रखा जाता है।

👉 उनके ही ट्रेज़री सेक्रेटरी Scott Bessent ने खुले तौर पर कहा कि रूस की अर्थव्यवस्था गिराने के लिए उन देशों पर भी दबाव बढ़ाना होगा, जो रूस से तेल ले रहे हैं।

👉 मज़ेदार बात ये है कि बस कुछ दिन पहले ट्रंप और मोदी जी सोशल मीडिया पर एक-दूसरे के साथ “mutual appreciation” कर रहे थे। ट्रंप ने खुद कहा था कि इंडिया-US का रिश्ता “very special” है।

👉 एक्सपर्ट्स का कहना है कि ट्रंप को अब अहसास हो रहा है कि इंडिया पर 25% का टैरिफ थोपने की धमकी काम नहीं आई। इंडिया अपनी जगह पर मज़बूती से खड़ा रहा।

तो कुल मिलाकर, अमेरिका बार-बार अपने स्टैंड बदल रहा है। कभी दोस्ती का कार्ड, कभी दबाव की पॉलिसी। लेकिन इंडिया ने साफ़ कर दिया है कि राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं होगा।

यही है न्यू इंडिया की ताक़त।

🔥 CPEC पर पाकिस्तान को बड़ा झटका 🔥

🚨 CPEC पर बड़ा झटका 🚨

चीन ने पाकिस्तान की सबसे बड़ी रेल परियोजना से हाथ खींच लिया।

अब सिर्फ कराची–रोहरी (500 किमी) रेल अपग्रेड बचा है, वो भी ADB के 2 अरब डॉलर के कर्ज़ पर।

मतलब साफ है –

पाकिस्तान दिन-ब-दिन कर्ज़ के जाल में फँसता जा रहा है। चीन ने अब भरोसा कम कर दिया है। बेल्ट एंड रोड (BRI) प्रोजेक्ट की चमक फीकी पड़ रही है।

🇮🇳 भारत के लिए असर और बढ़ती ताक़त:

CPEC का रास्ता पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है, जिस पर भारत हमेशा आपत्ति करता रहा है। चीन का पीछे हटना भारत की कूटनीतिक स्थिति को और मज़बूत करता है। पाकिस्तान की निर्भरता अब चीन से हटकर ADB जैसे संस्थानों पर बढ़ रही है, जहाँ भारत की भूमिका अहम है।

🌍 बदलते समीकरण और मोदी जी की कूटनीति:

हाल ही में मोदी जी का जापान और चीन दौरा, और बीजिंग में पुतिन–मोदी द्विपक्षीय वार्ता ने साफ संदेश दिया कि भारत अब सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि खेल बदलने वाला खिलाड़ी है। भारत–रूस रिश्ते फिर से नई ऊँचाई पर हैं। ऊर्जा, रक्षा और कूटनीति में दोनों देशों की साझेदारी पाकिस्तान और चीन के लिए बड़ा संकेत है। अमेरिका, जापान, रूस और यूरोप के साथ भारत के रिश्ते मज़बूत होते जा रहे हैं, जबकि पाकिस्तान अकेला पड़ता दिख रहा है।

👉 साफ है कि दक्षिण एशिया की ताक़त का पलड़ा अब मज़बूती से भारत की तरफ़ झुक रहा है। मोदी जी की नीतियाँ भारत को “निर्णायक वैश्विक शक्ति” बना रही हैं।

🚨🇺🇸🇷🇺 अमेरिका दोहरा रहा है सोवियत संघ की आख़िरी घातक गलती

🚨🇺🇸🇷🇺 अमेरिका दोहरा रहा है सोवियत संघ की आख़िरी घातक गलती

बेतहाशा सरकारी खर्च फेडरल रिज़र्व पर हावी हो रहा है और डॉलर की स्थिरता को खतरे में डाल रहा है। अमेरिका उसी रास्ते पर बढ़ रहा है, जिसने सोवियत संघ की मुद्रा को ध्वस्त कर दिया था।

तंत्र: सिस्टम को तरलता से भर देना

🇺🇸: M2 मनी सप्लाई साल-दर-साल 4.8% बढ़ रही है, और अब रिकॉर्ड $22.1 ट्रिलियन सर्कुलेशन में हैं। यह वृद्धि घाटे को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर ट्रेज़री बॉन्ड जारी करने से आ रही है, सीधे फेड द्वारा नोट छापने से नहीं।

🇷🇺: सोवियत सरकार ने बजट घाटे को पूरा करने के लिए सीधे रूबल छापे, जो नाकाम आर्थिक कार्यक्रमों और सैन्य खर्च से बढ़े थे।

स्रोत अलग था (अमेरिका: बॉन्ड मार्केट, रूस: प्रिंटिंग प्रेस) लेकिन असर एक जैसा रहा— मुद्रा की आपूर्ति में कृत्रिम और बेतहाशा बढ़ोतरी, जिससे हर यूनिट की कीमत घट गई।

समस्या:

🇺🇸 अमेरिकी कर्ज़ विस्फोट: 2010 में $10 ट्रिलियन से सार्वजनिक ऋण आज बढ़कर $28 ट्रिलियन से ऊपर हो गया है। यानी सिर्फ़ 15 साल में लगभग तीन गुना।

🇷🇺 सोवियत कर्ज़ विस्फोट: अंतिम वर्षों में सोवियत संघ का बजट घाटा जीडीपी के 10% से ऊपर चला गया और विदेशी मुद्रा का कर्ज़ 1985 से 1991 के बीच दोगुना हो गया।

दोनों ही मामलों में सेंट्रल बैंक ने नियंत्रण खो दिया और वह स्वतंत्र प्रहरी बनने के बजाय असंयमित सरकारी खर्च का सहयोगी बन गया।

विलंब प्रभाव: तूफ़ान से पहले की शांति

🇺🇸: 2020 में M2 में तेज़ी आई, लेकिन महंगाई 2021 में तब उछली जब मुद्रा का प्रवाह (velocity) बढ़ा। यही स्थिति अब भी बन रही है— मनी सप्लाई बढ़ रही है लेकिन मांग पूरी तरह से अभी नहीं उभरी।

🇷🇺: वहां भी यही हुआ। नोट छापने से महंगाई में तुरंत उछाल नहीं दिखा। आधिकारिक आंकड़ों में मुद्रास्फीति कम दिखाई दी, जबकि असंतुलन अंदर ही अंदर सालों तक जमा होता गया।

महंगाई तुरंत नहीं आती। यह एक मौद्रिक प्रक्रिया है, जिसमें लंबा और अनिश्चित अंतराल होता है। दोनों उदाहरण दिखाते हैं कि मुद्रा की आपूर्ति बढ़ना एक जलती हुई फ्यूज़ है— बम फटने में समय लग सकता है।

अंत खेल: मुद्रा संकट और भरोसे का अंत

🇷🇺: नतीजा था हाइपरइन्फ्लेशन (1992 में 2,300% से ज़्यादा) और रूबल का लगभग पूरी तरह से मूल्य समाप्त हो जाना, जिससे बचतें मिट गईं और राज्य पर लोगों का भरोसा टूट गया।

🇺🇸: डॉलर विश्व की रिज़र्व करेंसी है, यह उसे एक बफ़र देता है। लेकिन वित्तीय अनुशासन खोने का अंत परिणाम वही है— महंगाई का संकट, क्रय शक्ति का क्षरण और सरकार की वित्तीय विश्वसनीयता पर से भरोसा उठना।

सबक:

सबक कठोर लेकिन साफ है— छापे गए नोटों से समृद्धि नहीं लाई जा सकती। अगर कोई सरकार लगातार अपनी क्षमता से ज़्यादा खर्च करती है और उसे अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करके पूरा करती है, तो वह आग से खेल रही है।

सोवियत संघ इसका ऐतिहासिक उदाहरण है। अमेरिका अपनी नई कहानी लिख रहा है।

Source: Geo Politics

🇺🇸😨 SCO शिखर सम्मेलन की सफलता के बाद अमेरिका में घबराहट

🇺🇸😨 SCO शिखर सम्मेलन की सफलता के बाद अमेरिका में घबराहट

प्रधानमंत्री मोदी और पुतिन की चीन यात्राओं के बाद अमेरिकी मीडिया की सुर्ख़ियाँ इस तरह आईं:

🤔 “रूस, भारत और चीन ट्रम्प के ख़िलाफ़ एकजुट”

मतलब साफ है कि शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की हालिया बैठक में भारत, रूस और चीन की नज़दीकियों ने अमेरिका को चिंता में डाल दिया है। अमेरिकी अख़बार और चैनल इस गठजोड़ को सीधे अपने खिलाफ़ मान रहे हैं, खासकर ट्रम्प प्रशासन की नीतियों पर असर के लिहाज़ से।

👉 सरल भाषा में कहें तो, SCO की सफलता और तीन बड़े देशों का मंच पर एकजुट होना अमेरिका को रणनीतिक और राजनीतिक रूप से चुनौती दे रहा है।

SCO शिखर सम्मेलन और हाल की घटनाएँ

SCO क्या है? SCO यानी शंघाई सहयोग संगठन एक अंतरराष्ट्रीय मंच है जिसमें मुख्य रूप से रूस, चीन, भारत, पाकिस्तान और मध्य एशियाई देश शामिल हैं। इसका मूल उद्देश्य क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और आतंकवाद व ड्रग्स जैसी समस्याओं का सामूहिक हल ढूंढना है। हाल ही में क्या हुआ? प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की चीन यात्रा SCO शिखर सम्मेलन से पहले हुई। इस बैठक में तीनों देशों ने कई बार क्षेत्रीय सहयोग और आर्थिक पहलुओं पर चर्चा की। खास बात यह है कि भारत और रूस ने चीन के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया, खासकर व्यापार, ऊर्जा और सुरक्षा क्षेत्र में। कौन से फैसले या संकेत मिले? साझा रणनीतिक दृष्टिकोण: रूस, भारत और चीन ने अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक मंचों पर एक दूसरे का समर्थन करने का संकेत दिया। आर्थिक पहल: तीनों देशों ने विकसित देशों की वित्तीय और व्यापार नीतियों से अलग, अपनी आर्थिक रणनीतियों को बढ़ावा देने पर जोर दिया। सुरक्षा सहयोग: आतंकवाद और सीमा सुरक्षा पर तीनों देशों ने सहयोग बढ़ाने का संकल्प जताया। अमेरिका क्यों परेशान है? अमेरिका लंबे समय से भारत, रूस और चीन की साझेदारी पर नजर रखता है। अगर ये तीनों देश सामरिक और आर्थिक मोर्चों पर एकजुट होते हैं, तो यह अमेरिका की वैश्विक नीतियों और दबाव रणनीतियों को चुनौती दे सकता है। खासकर ट्रम्प या उसके समर्थकों के दृष्टिकोण से, यह गठबंधन अमेरिकी प्रभाव और दबाव को कमजोर कर सकता है, इसलिए अमेरिकी मीडिया ने इसे “घबराहट” के रूप में पेश किया।

जापान भारत में बड़े निवेश कर रहा है

जापान भारत में बड़े निवेश कर रहा है —

जापान की कंपनियाँ भारत में हरित ऊर्जा, सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रिक वाहन (EV) कंपोनेंट जैसे क्षेत्रों में तकनीकी प्लांट स्थापित कर रही हैं। सुजुकी और डेंसो कॉर्पोरेशन जैसी कंपनियाँ पहले ही निवेश कर चुकी हैं और बायोगैस प्लांट से लेकर ईवी कंपोनेंट प्लांट तक विभिन्न परियोजनाओं पर काम कर रही हैं। इसके अलावा, मुराता जैसी कंपनियां भी भारत में विनिर्माण संयंत्र स्थापित कर रही हैं, जो देश के विभिन्न तकनीकी और औद्योगिक क्षेत्रों को बढ़ावा देंगे।

जापानी निवेश के प्रमुख क्षेत्र:
हरित ऊर्जा:
बायोगैस प्लांट और हरित हाइड्रोजन एवं अमोनिया परियोजनाओं में जापानी निवेश हो रहा है, जो भारत के हरित ऊर्जा लक्ष्यों का समर्थन करता है।

सेमीकंडक्टर:
जापान की कंपनियाँ भारत में सेमीकंडक्टर यूनिट स्थापित करने में रुचि रखती हैं और भारत सरकार भी इस क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहित कर रही है।

इलेक्ट्रिक वाहन (EV) कंपोनेंट:
डेंसो कॉर्पोरेशन जैसी कंपनियों ने नोएडा में ईवी कंपोनेंट प्लांट में निवेश किया है।

इलेक्ट्रॉनिक्स और विनिर्माण:
मुराता, जो एप्पल, सैमसंग जैसी कंपनियों के लिए घटक बनाती है, चेन्नई में अपना पहला भारतीय विनिर्माण संयंत्र स्थापित कर रही है।

उदाहरण:
सोजिट्ज़ कॉर्पोरेशन:
यह 395 मिलियन डॉलर की लागत से 30 बायोगैस प्लांट स्थापित कर रहा है, जो किसानों को फसल अवशेष और कृषि अपशिष्ट के बदले आय प्रदान करते हैं।
डेंसो कॉर्पोरेशन:
यूपी में ₹250 करोड़ का निवेश करके एक ईवी कंपोनेंट प्लांट स्थापित कर रहा है।
मुराता:
चेन्नई में अपना पहला भारतीय विनिर्माण संयंत्र लगा रही है।

Trump Tariff

ट्रंप के आदेशों पर अमरीकी व्हाइट हाउस ने हॉटलाइन के माध्यम से भारत स्थित PMO से 4 बार संपर्क किया। चारों बार व्हाइट हाउस ने प्रधानमंत्री मोदी से बात करने का आग्रह किया और सूचित किया प्रेसिडेंट ट्रंप पीएम मोदी से ट्रेड डील पर बात करना चाहते हैं। किंतु प्रधानमंत्री कार्यालय ने ट्रंप को वार्तालाप करने से इनकार कर दिया… इसके पीछे का कारण पीएम मोदी चाहते हैं के ट्रेड पर जो भी वार्ता हो वो निर्धारित चैनल के ही माध्यम से हो… और उस वार्ता चैनल में भारतीय पक्ष ने पहले से ही एक रेड लाइन खींच रखी है कि हम कुछ मुद्दों पर तैयार हैं पर कृषि एवं दुग्ध क्षेत्र पर तैयार नहीं है, जिससे भारत ने गेंद अमरीका के पाले में डाल दी है।

अमरीकी टैरिफ लगने की स्थिति में भारत ने इस चुनौती का कैसे सामना करना है, इसको लेकर तैयारी पहले से शुरू कर रखी थी। इस कड़ी में ब्रिटन के साथ रुकी हुई ट्रेड डील शीघ्र निपटाकर FTA साइन किया गया, इसी प्रकार आधा दर्जन अन्य देशों के साथ भी FTA पर वार्तालाप जोरों पर चल रही है। वित्तीय विशेषज्ञों एवं रणनीतिकारों अनुसार अगले 6 महीने में अमरीकी बाजार का विकल्प तैयार हो जायेगा। और अमरीकी बाजार का विकल्प तैयार होते ही 6 महीने बाद से अमरीका पर पारस्परिक टैरिफ लगाए जाने की शुरुआत हो जाएगी, ताकि अमरीकी आयात को बंद किया जा सके।

भारत ने कई टीमें गठित की हैं जो अफ्रीकी एवं यूरोपीय देशों में बाजार तैयार करेंगी। उसके अलावा भारतीय उत्पादों को भारत में खपाने के लिए रोडमैप तैयार हो रहा है। निर्माण उद्योगों के लिए ब्याज दरें कम की जायेंगी, निर्यात बढ़ाने के लिए प्रोडक्शन रेट बढ़ाने और प्रोडक्शन कॉस्ट कम करने की प्लानिंग पर काम हो रहा है। कपड़ा उत्पादों के लिए अभी से बाजार तलाश लिया गया है अफ्रीका, फ्रांस और जर्मनी में। वहीं यदि EU के साथ FTA साइन होता है तो जेम्स एंड ज्वैलरी उद्योग को बड़ा बाजार मिल सकता है।

यहां सबसे अधिक महत्वपूर्ण मैक्सिको और कनाडा से FTA है… यह दोनों अमरीका के पड़ोसी देश हैं, यदि भविष्य में इन देशों से भारत का FTA साइन होता है तो अमरीकी बाजारों में भारतीय उत्पाद इनमें से किसी एक देश के रास्ते जा सकता है। कुल मिलाकर अमरीकी बाजारों का विकल्प भी तैयार हो जाए और किसी तीसरे देश के माध्यम से अमरीका में भी भारतीय उत्पाद पहुंचने लग जाएं तो इस टैरिफ वॉर में अमरीकी की करारी हार होगी। निसंदेह इस कार्य को पूर्ण होने में 6 महीने से 1 साल का समय भी लग सकता है परंतु यह संभव हो जाएगा देर सवेर।

• दुनिया के कई थिंक टैंक का मानना है के यदि व्यापार मामले में भारत का अमरीका से कोई संबंध न हो, और इस मामले में भारत अमरीका पर निर्भर ना रहे तो अमरीका के लिए रणनीतिक चुनौतियां खड़ी हो जाएंगी। क्योंकि इस समय केवल एक ट्रेड ही है जिस कारण अमरीका भारत के संबंध बने हुए हैं एशिया, हिन्द प्रशांत क्षेत्र और रक्षा क्षेत्र में। यदि ट्रेड ही ना रहा तो भारत अलग रास्ता पकड़ लेगा… पेंटागन के साथ स्थापित नई दिल्ली के संबंध खत्म हो जाएंगे जिससे एशिया में अमरीका को सर्वाइव करने में बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। अमरीका की हिन्द-प्रशांत क्षेत्र को लेकर रणनीति पूरी तरह चौपट हो जाएगी। भारतीय नौसेना पहले से ही अब उस स्थिति में पहुंच चुकी है के वो अकेले ही चीन से हिन्द महासागर क्षेत्र में निपटने में सक्षम है बल्कि उसपर भारी पड़ती है हिन्द महासागर में। परंतु भारत के बिना अमरीका प्रशांत महासागर में चीन का सामना नहीं कर सकता। और यदि भारत QUAD से बाहर आ जाता है या QUAD में रहते हुए भी अमरीका से सहयोग करना बंद कर देता है तो हिन्द महासागर में अमरीकी नौसैनिक बेड़ों की आवाजाही बाधित करता सकता है भारत। डिएगो गार्सिया द्वीप जैसा रूट बाधित हुआ तो उसका खामियाजा मिडल ईस्ट में स्थित अमरीकी बेसों को भुगतना पड़ेगा।

इसराइल की आपत्तियों को दरकिनार कर फ्रांस के नेतृत्व में यूरोपीय देश इस समय ईरान से संबंध स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में अमरीका से दूर होने का रास्ता भारत पकड़ता है तो यूरोप और ईरान को नजदीक लाने में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस समय भारत का प्रयास जापान और दक्षिण कोरिया को भी ब्रिक्स में शामिल करने और रूस के साथ जापान के संबंधों में सुधार लाने का है। इससे अमरीका और चीन दोनों को काउंटर किया जा सकता।

अमरीकी टैरिफ आज चुनौती पेश कर सकते हैं लेकिन आगे चलकर इस समस्या से भी बाहर निकल आएगा भारत। परंतु अमरीका को चुनौतियां आने वाले समय में शुरू हो जाएंगी जो बहुत बड़ी होंगी और बेहद लंबी चलेंगी भविष्य में। ध्यान रहे अमरीकी सैंक्शन का प्रभाव भी तभी तक है जबतक द्विपक्षीय व्यापार चल रहा हो, यदि ट्रेड ही ना हो तो आर्थिक सैंक्शन का महत्व नहीं रह जाता। उस स्थिति में हिन्द महासागर की लहरों पर तो सैंक्शन लगाना संभव नहीं है।

✍️ आर्यन

क्या प्राइवेट कंपनियों को लाने के लिए सरकार को पैसा या टैक्स Exemption देने चाहिए???

सरकार क्यों किसी प्राइवेट कंपनी को सब्सिडी देती है, तमाम तरह की रियायत और टैक्स छूट देती है.

इससे हमें क्या फायदा?
Taxpayer का पैसा क्यों किसी प्राइवेट कंपनी को दिया जाता है?

सवाल वाजिब हैं… और इसके जवाब के लिए तीन अलग अलग राज्यों, अलग शहरों, अलग पार्टियों की सरकारों का उदाहरण लेते हैं…. तीन अलग अलग इंडस्ट्री भी हैं.

  1. सानंद (गुजरात) – Automobiles – आज से 20-22 साल पहले यह एक छोटा शहर या बसा कस्बा हुआ करता था….. छोटे मोटे काम धंधे होते थे.
    फिर पश्चिम बंगाल के सिंगूर मे ममता बनर्जी ने बवाल मचाया और टाटा को वहां से उखाड़ फेंका. गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने रतन टाटा जी से बात की और उन्हें सानंद आने के लिए मना लिया. 2008 मे यह सब बातचीत हुई और मात्र 14 महीने मे टाटा का प्लांट बन कर तैयार था सानंद मे

गुजरात सरकार ने टाटा ग्रुप को सस्ती ज़मीन, सस्ती बिजली, टैक्स सोपस और अन्य कई तरह की रियायतें दी.

टाटा के आने के बाद उनकी कई पार्टनर कम्पनिया भी सानंद मे आयी…. फिर देखा देखि फोर्ड, मारुती, MG मोटर्स, Hero Motocorp, Honda, अपोलो tyres, Setco, JBM, AMW जैसी ढेरों कम्पनिया और उनके Ancilleries पार्टनर्स सानंद पहुंच गए. और आज यह भारत के सबसे बड़े Automobile Hub मे से एक है.

आज यहाँ लाखों लोग रोजगार के लिए आते हैं.. अहमदाबाद और आस पास के इलाकों से…. यहाँ टाटा का जो नया प्लांट है, जो उन्होंने फोर्ड के प्लांट को takeover करके बनाया है… वहां टाटा की EV बनती हैं… वो दुनिया के किसी भी High Tech प्लांट को टक्कर दे सकता है. पिछले दिनों मै स्वयं गुजरात गया था… और ज़मीन पर यह सब देखा. सानंद पिछले 20 सालों मे बदल गया है.

वहीँ सिंगूर के क्या हाल हैं… वो आप देख लीजिये…. पहले सत्यानाश था, आज सवा सत्यानाश हालात हैं.

  1. देवनहल्ली (कर्नाटक ) – Mobile फ़ोन मैन्युफैक्चरिंग – यह भी एक क़स्बा ही था…. फिर यहाँ Foxconn आ गयी. Foxconn का प्लांट है 13 मिलियन स्क्वायर फ़ीट बड़ा…… मतलब 220 फुटबॉल के मैदान जितना. लाखों लोग यहाँ काम कर रहे है…… इसमें डायरेक्ट जॉब्स 50000 हैं और इसी अनुपात मे Indirect जॉब्स भी हैं.

Foxconn ने इस प्रोजेक्ट का नाम रखा हैं प्रोजेक्ट Elephant…..और इसी के पास एक और प्रोजेक्ट शुरू किया… प्रोजेक्ट Cheetah…. जहाँ Foxconn की EV बनेंगी.

इतने हजारों लोगो के लिए Foxconn रहने की जगह भी बनवा रहा हैं… काफी कुछ बन भी चुकी हैं. Foxconn जहाँ जाता हैं, साथ ही उसके पार्टनर्स भी जाते हैं.

आज देवनहल्ली मे जबरदस्त boom आया हुआ हैं….. रियल एस्टेट भी तेजी से बढ़ रहा हैं… और साथ ही लाखों लोगो को अलग अलग तरह के काम धंधे भी मिल रहे हैं.

कर्नाटक सरकार ने इसके बदले मे foxconn को कई तरह की रियायतें दी थी….. और उन रियायतों का कई सौ गुना पैसा वहां बन रहा हैं.

  1. नॉएडा -Greater नॉएडा (उत्तरप्रदेश ) – Smartphone Manufacturing/Electronics मैन्युफैक्चरिंग – आपको यह जान कर आश्चर्य हो सकता है, कि यह क्षेत्र चीन के बाहर सबसे बड़ा Mobile मैन्युफैक्चरिंग Hub है…….. Electronics के मामले मे भी पिछले कुछ सालों मे जबरदस्त Boost मिला है यहाँ.

शुरुआत करते हैं सैमसंग से… सैमसंग ने 2015-16 मे यहाँ एक प्लांट लगाने की बात की थी… लेकिन बात ज्यादा आगे बढ़ी नहीं… वैसे भी चुनाव आने होते हैं तब काम बंद सा हो जाता है.

सैमसंग की एक जरूरत थी…. Dedicated High Power लाइन…. जो पिछली सरकार नहीं दे पा रही थी. सैमसंग ने अपना प्रस्ताव वापस लेने का मन बना लिया था. योगी जी आये, और उन्होंने एक मंत्री को भेजा बात करने को…. और फिर कुछ ही दिनों मे एक Dedicated 50 MW की power लाइन बिछाई गयी… यह 22 किलोमीटर लम्बी लाइन कुछ ही दिनों मे बना कर दी गयी……. और उसके बाद नॉएडा मे बनी सैमसंग की दुनिया मे सबसे बड़ी Factory.

इसी के साथ नॉएडा मे Oppo, Vivo, Samsung, Lava, Dixon जैसी कंपनियों ने अपने प्लांट्स लगाए….. और यह कोई छोटे मोटे प्लांट नहीं हैं… यह किसी भी Giga Factory से कम नहीं हैं….. जल्दी ही Apple का प्लांट भी लगने वाला है यमुना Expressway पर. आज भारत मे बनने वाले लगभग 70% फोन यही बनते हैं.

उत्तरप्रदेश सरकार ने इन सभी कंपनियों को PLI स्कीम, टैक्स concessions, सस्ती ज़मीन, सस्ती बिजली और अन्य कई फायदे दिए.

बदले मे लाखो लोगो को नौकरी मिली… क्षेत्र की अर्थव्यवस्था अच्छी हुई…. पढ़ाई लिखाई करके मार्किट मे आने वाले लोगो को काम मिला….. Indirect जॉब करने वाले लोगो… जैसे ड्राइवर, सिक्योरिटी, maids, खाना पीना बनाने वाले जैसे लाखों लोगो को रोजगार मिला.

सार यही है कि सरकार को पहले थोड़ा पैसा इन्वेस्ट करना पड़ता है… और बदले मे उसका कई गुना मिल जाता है.

मान लीजिये उत्तरप्रदेश सरकार ने 10,000 करोड़ की रियायत दी….. बदले मे यहाँ 2 लाख जॉब्स बनी…… अब सोचिये उनसे टैक्स कितना मिल जाएगा सरकार को… GST कितना मिलेगा… यह लोग लोकल अर्थव्यवस्था मे पैसा खर्च करेंगे… उसका भी एक बड़ा अंश सरकार को आएगा.

जो 10,000 करोड़ खर्च हुए.. उसके बदले मे अगले कुछ सालों मे कई लाख करोड़ कमा लेगी सरकार…… वित्त चक्र ऐसे ही चलता है.

वामपंथी विचारों से प्रेरित सिंगूर मे आज भी लोग बिना नौकरी के हैं…. खाने पीने के वांदे पड़े हैं उनके.

पैसा ही पैसे को बनाता है… यह किसी भी अर्थ तंत्र का मूल मन्त्र है.

  • पोस्ट मे लिखी कोई भी बात Independent News Sources से चेक की जा सकती हैं……
  • यह पोस्ट है, विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर लिखी गई है।

🇺🇸♟ अमेरिका की “फूट डालो और राज करो” रणनीति: 🇮🇳भारत बनाम 🇨🇳चीन

अमेरिका के एक वैश्विक साम्राज्य में बदलने की प्रक्रिया एक ही रणनीति पर आधारित रही है — प्रतिद्वंद्वियों को आपस में भिड़ाकर उन्हें कमजोर करना। यही रणनीति आज अमेरिका की चीन और भारत को लेकर नीतियों के मूल में है।

आइए समझते हैं कैसे:👇

इतिहास में अमेरिका ने हमेशा देशों को आपस में लड़वाकर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की। 1970 के दशक में अमेरिका ने चीन से संबंध सुधार लिए, जबकि शीत युद्ध के दौरान भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया अपनाया। फिर 2008 में अमेरिका ने चीन का मुकाबला करने के लिए भारत की ओर झुकाव दिखाया। यही रणनीति पहले रूस और जर्मनी के साथ अपनाई गई थी।

🤔 लेकिन सोचिए अगर चीन और भारत साथ आ जाएं?

तो अमेरिका यह बर्दाश्त नहीं कर सकता। उसे दोनों को अलग रखना जरूरी है।

🇨🇳 शीत युद्ध के समय अमेरिका ने बार-बार अपने सहयोगी बदले — पहले रूस, फिर चीन के साथ। यही रणनीति अब भारत और चीन के संदर्भ में दोहराई जा रही है।

आज अमेरिका ने भारत की बढ़ती ताकत और आर्थिक प्रगति को समझते हुए उस पर ध्यान केंद्रित किया है।

🇮🇳🇷🇺 लेकिन भारत के रूस से संबंध इस रणनीति में बाधा हैं। यूक्रेन युद्ध के दौरान जब भारत ने रूस से दूरी बनाने से इनकार किया, तब अमेरिका ने दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया — पाकिस्तान और बांग्लादेश में तख्तापलट जैसी गतिविधियों के माध्यम से। इससे अमेरिका को भारत को कमजोर करने और चीन को टक्कर देने के लिए ज़्यादा विकल्प मिल गए।

इस बीच, भारत और चीन के बीच प्रतिद्वंद्विता बनी रही, जो अमेरिका के हित में है। यदि भारत-चीन-रूस एकजुट हो जाएं, तो अमेरिकी साम्राज्य की नींव हिल सकती है। इसलिए, अमेरिका भारत और चीन के बीच तनाव को बढ़ावा देता रहेगा — संभव है कि वह पाकिस्तान को फिर से अपने पाले में ले आए।

🍽 अंततः, अमेरिका की रणनीति स्पष्ट है: या तो आप मेज़ पर हैं, या फिर थाली में। बहुध्रुवीय विश्व (multipolar world) अमेरिका के हित में नहीं है, इसलिए वह एशिया पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए “फूट डालो और राज करो” की नीति को जारी रखेगा

भारत के खिलाफ खड़ा है…एक सुनियोजित वैश्विक गठजोड़…!!

भारत के खिलाफ खड़ा है…
एक सुनियोजित वैश्विक गठजोड़…!!

पिछले सौ वर्षों से अमेरिका एक महाशक्ति की तरह राज करता रहा है। उसने हर उस देश को मिटा दिया जिसने उसकी सत्ता को चुनौती देने की कोशिश की।

जो अमेरिका अब तक चीन के पीछे हाथ धोकर पड़ा था, वो भारत के तरफ क्यों तिरछी निगाहों से देख रहा है..?

क्या अमेरिका भारत को खतरा मान रहा है या दक्षिण एशिया में खत्म होती अपनी साख देखकर खीझ रहा है..?

या F-16 की शहादत को पचा नहीं पा रहा है..?
या माजरा कुछ और ही है..?
सब स्पष्ट हो जाएगा, पूरा लेख पढ़िए..👇

जापान ने सिर उठाया,
तो हिरोशिमा-नागासाकी राख हो गए।

यूएसएसआर ने टक्कर ली, तो 17 टुकड़ों में टूट गया।
इराक, ईरान, अफगानिस्तान जैसे देशों का क्या हाल हुआ, ये पूरी दुनिया ने देखा है।

अब जो देश तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, वो है भारत।
भारत आज आत्मनिर्भर बनना चाहता है, दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है और सबसे तेज़ विकास करती अर्थव्यवस्था भी।

भारत की यह प्रगति अमेरिका और पश्चिमी ताकतों को हजम नहीं हो रही। उन्हें डर है कि अगर भारत आत्मनिर्भर हो गया, तो उनकी अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी।

इसीलिए अब भारत को निशाना बनाया जा रहा है—सीधे नहीं, बल्कि अपने ही लोगों के ज़रिए।

जिस तरह चीन के उद्योगपति जैक-मा को अमेरिका ने उभरते ही खत्म करने की साजिश रची, उसी तरह अब अडानी और अंबानी जैसे भारतीय उद्योगपतियों को दबाने की कोशिश की जा रही है।

अडानी ने जब ग्रीन हाइड्रोजन जैसे ऊर्जा क्षेत्र में कदम रखा, और भारत को तेल-गैस के विकल्प देने की योजना बनाई, तभी हिंडनबर्ग रिपोर्ट सामने आ गई।

अब जबकि CNBC तक ने कहा है कि अडानी दुनिया के दूसरे ट्रिलियनेयर बन सकते हैं, हमले और तेज़ हो गए हैं।

भारत की ऊर्जा निर्भरता खत्म हो जाए, तो भारत मजबूत हो जाएगा। लेकिन अमेरिका ऐसा होने नहीं देना चाहता।

सोशल मीडिया, यूट्यूब, फेसबुक, ट्विटर, गूगल—
ये सब अमेरिका के हाथ में हैं।
वो जब चाहे, जिसे चाहे बदनाम कर सकते हैं। मीडिया को खरीदा जा सकता है, पेड ट्रेंड चलाए जा सकते हैं।

भारत के अंदर भी अमेरिका के एजेंट सक्रिय हैं—गद्दार, जयचंद, नकली बुद्धिजीवी।

इनकी बातें देखिए—
जब देश आगे बढ़ता है तो इन्हें दर्द होता है, जब कोई भारतीय उद्योगपति दुनिया में जगह बनाता है तो ये मज़ाक उड़ाते हैं। लांछन लगाते हैं।

उन्हें भारत की मजबूती नहीं चाहिए, उन्हें भारत में एक कमज़ोर, गठबंधन की सरकार चाहिए जो कभी भी गिर सके।

पिछले 10 वर्षों में भारत में एक स्थिर सरकार है, जो अपने उद्योगपतियों को आगे बढ़ा रही है। लेकिन यही बात विदेशी शक्तियों और भारत के विपक्ष को चुभ रही है।

आज अगर अडानी, अंबानी, टाटा, महिंद्रा जैसे नाम दुनिया में धमक पैदा कर रहे हैं, तो उनके खिलाफ मुहिम चलाना—क्या यह भारत के खिलाफ षड्यंत्र नहीं?

ये उद्योगपति भारत का चेहरा हैं। ये हमारे हीरो हैं जो “मेक इन इंडिया” को दुनिया में पहुंचा रहे हैं।

अगर इन्हें गिराया गया, तो…
असल में भारत को गिराया जाएगा।

इसलिए पहचानिए—कौन जयचंद है?
कौन आपके देश को बेचने पर तुला है?

और सबसे ज़रूरी बात—
सोचिए नहीं, अब एक्शन लीजिए।
अधिक से अधिक लोगों तक ये बात पहुंचाइए।
देश को बांटने वाले विदेशी इकोसिस्टम को जवाब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ज़रिए ही दिया जा सकता है।

क्योंकि देश हमारा है,
सरकार हमारी है,
और भविष्य भी हमारा है।

जय हिंद। वंदे मातरम्।🇮🇳

बटेंगे तो कटेंगे “कल्ट”

सीएम योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक स्टारडम पैन भारत बढ़ता जा रहा है, जल्द साउथ ब्लॉक घेरे में भी पहुंचेगा।

योगी बाबा के स्टारडम में पहला अस्त्र बुलडोजर है जो वर्ल्ड वाइड ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर हो चुका है। बेशक सुप्रीम कोर्ट ने अपनी चौधराहट दिखाई है, किंतु बाबा स्पष्ट है कि सूबे में कानून का राज पहली और एकमात्र शर्त है।

बुलडोजर के बाद, बटेंगे तो कटेंगे वक्तव्य या कहे नारा पैन भारत हो चुका है, पीएम ने इसमें अपनी लाइन भी जोड़ी है, एक है तो सेफ है। इसे योगी बाबा के नारे का रीमेक समझ लें।

नारे ने बीजेपी से दो क्लियर चेहरे सत्यापित कर दिए है, वर्तमान में पीएम चेहरा है और भविष्य योगी बाबा को माँग रहा है। भले अभी तक बाबा की टीम दिखाई नहीं दे रही है लेकिन बाबा स्वयं को पैन भारत प्रोजेक्ट करने लगे है और पीएम इस संकेत को समझ चुके है। इसलिए वे समर्थन दे चुके है। हालांकि अभी योगी बाबा यूपी में रहेंगे।

फिर भी एक देश एक चुनाव के फॉर्मेट में योगी बाबा आगे की कमान संभालेंगे।

आरएसएस अब कोई ऐसी गलती नहीं करना चाहेगी, जिससे 2004 वाली परिस्थियाँ खड़ी हो और वनवास पर निकलें। क्योंकि वर्तमान परिदृश्य में राजनीति बहुत बदल चुकी है और आगे भी बदलेगी। रिवेंज शब्द जुड़ चुका है।

240 आंकड़े ने कपकपी छुड़वा दी थी।
महाराष्ट्र के चुनाव में कुछ शर्तों वाली लिस्ट घूम रही है जिसमें महाविकास अघाड़ी का वोट बैंक आरएसएस पर बैन की डिमांड किए है। अगर उनकी सरकार बैठी तो कुछ तो ऐसा करेगी। जिससे वोट बैंक खुश हो।

आक्रमक नेतृत्व ही बीजेपी के फायदेमंद है।
योगी बाबा का फेवरेट जोन है तो उसी में खेल रहे है और निरंतर खेलेंगे। देवेंद्र फड़नवीस को सुने होंगे तो सुना होगा कि नबाव मलिक और अजीत के संदर्भ में कोई लाग लपेट नहीं दिखाते हुए, सीधे शब्दों में सही-ग़लत कह रहे है।

क्योंकि बीजेपी को 4 जून ने अच्छे से समझाया था कि बेटे वाक़ई विश्वास में दम होता और जनाधार बढ़ाता, तो केजरू उसे लात मारकर बाहर नहीं निकलता। इसलिए विश्वास के चक्कर को छोड़िए और अपने जोन में खेलिए। विश्वास पहले भी कविता पाठ करता था और आज भी कर रहा है। बीजेपी इसे जीतने का स्वप्न त्याग चुकी है, इसके पीछे रहती तो वोटर्स इन्हें त्याग देते। फिर विश्वास कविता सुनाता और ये सभी बैठकर सुनते।

बीजेपी की बायो में योगी बाबा ने नया जो जोड़ा है न, यही इसका अर्थ और परिभाषा है। इसी के इर्दगिर्द चलना ही लाभ देगा।

महाराष्ट्र चुनाव

महाराष्ट्राइलेक्शन

लोग बालासाहब को देवता समझते है पर वो भी एक आम आदमी थे।पुत्र प्रेम सबको होता है और इसमें कुछ बुरा भी नही।

उनके मन मे पहले से ही अपनी गद्दी अपने बेटे जयदेव को देने की चाहत थी।बिंदु माधव की मृत्य होगई और जयदेव ने राजनीति में आने से मना कर दिया।इस लिए उद्धव को राजनीति में ले आये।जो राजनीति के लिए बिल्कुल उत्साहित नही थे।
राज ठाकरे कभी उनके वारिस नही बनेंगे ये पहले से तय था ऐसा पुराने शिवसैनिक कहते है।राज को जल्दी पता चल गया इस लिए उन्होंने शिवसेना जल्दी छोड़ दी।

बात सिर्फ गद्दी की नही होती पार्टी के पास आये अकूत धन की भी होती है।पत्रकार अनिल थत्ते कहते है कि बालासाहब के पास 25000 करोड़ से ज्यादा की सम्पत्ति थी जब वो जीवित थे।अब ये शिवसेना की गिनो या बालासाहब की सब एक ही है।
उस वक्त के बड़े बिल्डरों का रेट तय था वो शरद पवार को साल का 5 करोड़ और बालासाहब को 1 करोड़ देते थे।जब 1994 में सत्ता आई तो बालासाहब का भी रेट बढ़ गया।

तब बालसाहब ने अपना रेट 5 करोड़ कर दिया पर अंडरवर्ल्ड को खत्म करने का वचन दिया।
जब अनिल थत्ते से पूछा कि तो ये इतनी संपत्ति ये लोग छुपाते कहा ?
तब अनिल बोले जी सब गोल्ड के बिस्किट में जमा होता था।
और उनके प्रोपर्टी की तलाशी लेने की किसी की हिम्मत नही।ऐसा ज्यादत्तर नेता करते थे।

जब धर्मवीर आनंद दिघे की मृत्यु हुई तब उध्दव ने आकर एकनाथ शिंदे से पहला सवाल यही पूछा कि आंनद दिघे की संपत्ति कहा है?

महाराष्ट्राइलेक्शन

आनंद दिघे कौन थे ये जानकारी में नही दूंगा वो इंटरनेट पर भरी पड़ी है।वो एकनाथ शिंदे के पोलिटिकल गुरु थे ।

में यहां बात करूँगा उनके और बालासाहब के संबंधों की।
आनंद दिघे को ठाणे का वाघ,शेर कहा जाता था।पर जब उन्हें ठाणे का ठाकरे कहा जाने लगा तब बाल साहब को तकलीफ होने लगी।ठाणे में दिघे साहब हर निर्णय अपनी मर्जी से लेते थे।उन्हें बाला साहब को मानना पड़ता था।क्योंकि ठाणे शिवसेना को बड़ा ही दिघे ने किया था।
बाला साहब ने दिघे को कवर करने के लिए शिवसेना में उनका प्रतिस्पर्धी तैयार किया गणेश नाइक।जी हां गणेश नाइक को आगे बढ़ाया वो बहोत बड़े कद्दावर नेता है आज bjp में ।पर वो दिघे के सामने कभी नही टिक पाये।
यहां तक कि बालासाहब ने दिघे को ठाणे से बाहर प्रचार करने पर भी लिमिटेशन लगा दी।यही लिमिटेशन राज ठाकरे पर मुंबई से बाहर जाने पर थी।ये सब शुरू हुआ उध्दव के पार्टी में आने के बाद।
मतलब कह सकते है कि उनके पर कतर दिये।दोनो एक दूसरे को बहोत प्रेम करते थे।पर दोनो के रिश्ते लवहेट के थे।
पत्रकार अनिल थत्ते को दिघे ने कहा था कि बालासाहेब मुझे बहोत मानते है पर मेरे से जलते भी बहोत है।उन्हें डर है कि कही लोग मुझे उनसे बड़ा न बना दे।

दिघे जो है वो शाक्तउपासक थे।वो रात तीन बजे तक काम करते फिर वो अपनी पूजा पाठ कर के सुबह 5 बजे सोते और सुबह 8 बजे उठकर फिर रात तीन बजे तक काम करते ।बहोत सादा जीवन जीते थे।बस उन्हें स्मोकिंग का एक शोख था।।पर सेहत का व्व ख्याल नही रखते थे।
जिस वजह से उन्हें हार्ट अटैक भी आय था।
पर जब उनका एक्सीडेंट हुआ और वो ठीक हो रहे थे तभी उन्हें मुम्बई से आदेश आया कि वो अपना इस्तीफ़ा दे दे।
शायद वो इस सूचना को झेल नही पाये।और उन्हें फिर अटैक आया और वो चल बसे।

वो राज ठाकरे के परम मित्र थे।।उस वक्त राज ठाकरे और उध्दव ठाकरे के बीच शिवसेना का वारिस बनने की होड़ चल रहि थी।दिघे राज को नेचरल वारिस मानते थे।लगभग सभी शिवसैनिक यही मानते थे।

इसी लीये जब उनकी मृत्यु हुई तब उध्दव ने आकर एकनाथ शिंदे से सबसे पहले यही सवाल किया कि इनकी संपत्ति कहा कहा है।
उसवक्त दिघे के पास पक्ष के लिए मिली हुई 500 करोड़ की संपत्ति थी सन 2000 में।आज के हिसाब से आप गिन लीजिये।मतलब बालासाहब के बराबर ही उन्हें डोनेशन मिलता था।और यही तकलीफ थी।और उध्दव को डर था कि ये संपत्ति राज के हाथ न लग जाये।

उनके जाने के थोड़े ही वर्षो में राज ठाकरे,नारायण राणे जैसे दिग्गज पार्टी से चलें गये। भावेश संसारकर।

भावेश संसारकर।

इमरजेंसी रपट

इमरजेंसी रपट

इमरजेंसी लागू हुए कई दिन बीत चुके है। अब आप खुदाई रिपोर्टर की एक विशेष रपट पढ़िए। इस रपट के मुख्य किरदार है धीरेंद्र ब्रह्मचारी।

धीरेंद्र ब्रह्मचारी उर्फ़ धीरेंद्र चौधरी कांग्रेसी नेता ललित नारायण मिश्र के दूर के रिश्तेदार बताये जाते है। वो जो भी रहे हो बिहार के इस योग गुरु ने चच्चा साहब पर ऐसा जादू चलाया कि चच्चा ने अपनी लड़की को योग सिखाने धीरेंद्र स्वामी को नियुक्त कर दिया। कैथरिन फ्रैंक और ख़ुशवंत सिंह ने इन योग सेशन के बारे में बड़ा चटपटा लिखा है- योगशास्त्र से कामशास्त्र तक का सफ़र आदि आदि। लेकिन ऐसी गॉसिप्स एक आम मुहल्ले की चुग़लखोर औरतों की बातो के बराबर है। लेकिन जो भी हो- धीरेंद्र ब्रह्मचारी और प्रियदर्शिनी का एक लंबा अटूट रिश्ता इमरजेंसी से पूर्व रहा था।

ब्रह्मचारी के अनेक आश्रम थे- दिल्ली और जम्मू में प्रमुख। सरकारी ज़मीन पर बने ये आश्रम, ख़ास तौर पर जम्मू वाला रक्षा मंत्रालय के आपत्ति करने के बाद भी बना था। पचास एकड़ का बना ये आश्रम आधुनिक सुविधाओं से लैस था और इस में एक प्राइवेट हवाई पट्टी भी थी। ब्रह्मचारी भारत के पहले ऐसे अनोखे आदमी थे जिन्होंने हाईस्कूल भी पास ना किया था किंतु पायलट या फ्लाइंग सर्टिफिकेट हासिल कर लिया था। उन दिनों फ्लाइंग सर्टिफिकेट हासिल करना एक फैशन रहा होगा- राजीव संजय और ब्रह्मचारी – तीनों के धोरे ये था।

the फ्लाइंग स्वामी के नाम से मशहूर धीरेंद्र ब्रह्मचारी अक्सर फ्लाइट में पाये जाते थे- अंतरराष्ट्रीय उड़ाने भरते हुए। सरकारी विमानों का भी खूब प्रयोग धीरेंद्र स्वामी ने किया। ये भी आधिकारिक रिकॉर्ड है कि धीरेंद्र स्वामी को रेलवे मंत्री केदार पांडेय ने प्रथम श्रेणी पास भी खूब दिये थे। इन स्वामी जी का इतना जलवा था कि लोग इनसे मिलने आते ताकि इंदिरा और संजय का अपॉइंटमेंट दिलवा सके। स्वामी ना हुए गोया प्राइवेट सेक्रेटरी हो गये।

जिस भी राज्य में धीरेंद्र स्वामी जाते वो राज्य के मेहमान होते। दिल्ली के उपराज्यपाल तक को इन से ऑर्डर लेते हुए देखा गया। धीरेंद्र स्वामी के नाम इमरजेंसी में यूँ तो अनेक कारनामे दर्ज है किंतु दो मुख्य है। पहला – स्वामी ने प्राइवेट हवाई जहाज़ अमेरिका से नगद डॉलर दे ख़रीदा और भारत बिना ड्यूटी दिये लाये- वो भी उस ज़माने में जब अमेरिकी जूते और घड़ियों पर अंधाधुंध ड्यूटी लगती थी। दूसरा – स्वामी ने दिल्ली और कई अनेक जगह आश्रम बनाने के लिए हड़पी और शोषित लोगों को आज तक न्याय ना मिला।

जब इमरजेंसी के बाद देसाई सरकार बनी तो स्वामी का ये सफ़ेद और नीला वाला जहाज़ ज़ब्त कर लिया गया। हालाँकि दो ढाई साल बाद इंदिरा सरकार की वापसी पर ये हवाई जहाज़ स्वामी को वापस दे दिया गया। शाह कमीशन ने स्वामी से बहुत जाँच पड़ताल की। उनके हवाई जहाज़ के लॉग देखे तो पाया- दो सौ से ऊपर उड़ानों में से सवा सौ उड़ान केवल संजय और राजीव के नाम थी। बीस उड़ान राय बरेली तक थी। चीफ कंट्रोलर ऑफ़ इंपोर्ट के आधिकारिक बयान के मुताबिक़ इस जहाज़ ने इंपोर्ट करने में भी अनेक अनियमितता बरती थी। कुछ और चार्जेस जैसे मर्सिडीज़ कार को लाना , ब्यूरोक्रेट लोगो का तबादला करवाना और पैसे का ग़बन भी स्वामी के नाम पर थे।ख़ैर- इन सब रिपोर्ट्स या चार्ज का हुआ कुछ नहीं।

संजय गांधी के अंतिम संस्कार में स्वामी जी राजीव को निर्देश देते साफ़ दिखे थे। अंतिम चरणों में इनकी इंदिरा से कुछ अनबन हुई। ये भी एक अजीब इत्तिफ़ाक़ है स्वामी की मृत्यु भी एक हवाई दुर्घटना में हुई। मथाई ने भी इन स्वामी के बारे में बड़ा अजीब लिखा और बोला है।

असली सरकारी योग गुरु तो धीरेंद्र ब्रह्मचारी थे- बाबा रामदेव तो ख़ामख़ा बदनाम है।

महाभारत में कृष्ण और भीष्म संवाद

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था और दुर्योधन एवं दुःशासन मारे जा चुके थे।

तथा, भीष्म पितामह बाणों की शैय्या पर उसी कुरुक्षेत्र के मैदान में सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे…!

तभी उनके कानों में शहद घोलती हुई एक सुपरिचित ध्वनि पड़ी… प्रणाम पितामह…!!

ये परिचित ध्वनि सुनते ही भीष्म पितामह के सूख चुके होठों पर एक फीकी सी मुस्कान आ गई…

और, उन्होंने धीरे आवाज से कहा: आओ देवकी नंदन कृष्ण…! स्वागत है तुम्हारा…!! मैं बहुत समय से तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था…

इस पर श्री कृष्ण बोले: क्या कहूँ पितामह…? अब मैं ये भी नहीं पूछ सकता कि आप कैसे हैं?

इस पर भीष्म पितामह थोड़ी देर चुप रहे…

और, कुछ क्षण बाद श्री कृष्ण से कहा: कुछ पूछूँ केशव? वास्तव में तुम काफी अच्छे समय पर आए हो… संभवतः ये शरीर छोड़ने से पहले मेरे बहुत सारे भ्रम समाप्त हो जाएंगे…

इस पर श्री कृष्ण ने कहा: कहिए न पितामह…!

इस पर भीष्म पितामह ने कहा: एक बात बताओ कृष्ण… तुम तो ईश्वर हो न?

इस पर श्री कृष्ण ने उन्हें बीच में ही टोक कर कहा: नहीं पितामह…! मैं ईश्वर नहीं बल्कि सिर्फ आपका पौत्र हूँ…

श्री कृष्ण की ये बातें सुनकर भीष्म पितामह अपने उस घोर पीड़ा में भी ठहाके लगाकर हँस पड़े… और कहा: मैं अपने जीवन का खुद मूल्यांकन नहीं कर पाया… मैं नहीं जानता कि मेरा ये जीवन अच्छा रहा या बुरा?

परंतु, अब मैं इस धरा को छोड़कर जा रहा हूँ… इसीलिए, मैं तुमसे कुछ पूछना चाह रहा था… अतः… अब तो मुझे छलना छोड़ दो…

इस पर श्री कृष्ण… भीष्म के निकट आकर उनका हाथ अपने हाथों में लेकर कहा… पूछें न पितामह… आप क्या पूछना चाहते हैं?

तब भीष्म ने कहा: एक बात बताओ कन्हैया… इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या?

इस पर श्री कृष्ण ने प्रतिप्रश्न किया: किसकी ओर से पितामह? पांडवों की ओर से… या, कौरवों की ओर से?

भीष्म ने कहा: कौरवों के कृत्य पर तो चर्चा का कोई अर्थ ही नहीं रहा कन्हैया… लेकिन, पांडवों की ओर से जो हुआ क्या वो सही था? आचार्य द्रोण का वध, दुर्योधन के जंघा के नीचे प्रहार, दुःशासन का छाती का चीरा जाना, जयद्रथ के साथ हुआ छल, निहत्थे कर्ण का वध आदि… उचित था क्या?

इस पर श्री कृष्ण ने कहा: इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह… इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने ऐसा किया है… उत्तर दे दुर्योधन का वध करने वाले भीम और उत्तर दे कर्ण एवं जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन…

इस पर भीष्म ने कहा: अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण? अरे, विश्व भले कहता रहे कि ये महाभारत भीम और अर्जुन ने जीता है… लेकिन, मैं जानता हूँ कन्हैया कि… ये तुम्हारी और सिर्फ तुम्हारी विजय है…

इसीलिए, इसका उत्तर तो मैं तुमसे ही पूछूंगा कन्हैया…

भीष्म पितामह के इतना कहते ही श्री कृष्ण थोड़ा गंभीर हो गए… और कहा: तो सुनिए पितामह… कुछ बुरा नहीं हुआ… न ही कुछ अनैतिक हुआ… वही हुआ जो होना चाहिए था…

इस पर भीष्म ने कहा: यह तुम कह रहे हो केशव? मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है? ये छल तो किसी भी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा? फिर, ये उचित कैसे हुआ?

तब श्री कृष्ण ने कहा: इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह… लेकिन, निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के अनुसार लिया जाता है… हर युग अपने तर्कों और आवश्यकता के अनुसार अपना नायक चुनता है…

भगवान राम में भाग्य में त्रेतायुग आया था जबकि मेरे भाग्य में द्वापर आया…

इसीलिए, हमदोनो का निर्णय एक सा नहीं हो सकता न पितामह…!

इस पर भीष्म ने कहा: मैं कुछ समझ नहीं पाया केशव?

तब श्री कृष्ण ने उन्हें समझाते हुए कहा: राम और कृष्ण की परिस्थितियों में अंतर है पितामह…

राम त्रेतायुग के नायक थे…

राम के युग में खलनायक भी रावण जैसा शिवभक्त होता था… तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के घर में भी विभीषण जैसे संत होते थे… तब बाली जैसे नकारात्मक लोगों की पत्नियां भी तारा जैसी विदुषी और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे… उस युग में तो खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था… इसीलिए, राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया…!

लेकिन, मेरे युग के भाग्य में कंस, दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण, जयद्रथ जैसे घोर पापी आये… इसीलिए, उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित था पितामह…!

क्योंकि, पाप का अंत आवश्यक है पितामह… चाहे वो जिस भी विधि से हो…

इस पर पितामह ने फिर प्रश्न किया: तो क्या… तुम्हारे इन निर्णयों से एक गलत परंपरा का आरंभ नहीं हो जायेगा केशव? क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुसरण नहीं करेगा? और, यदि करेगा तो क्या वो उचित होगा?

इस पर श्री कृष्ण कहते हैं: कलयुग में तो और भी ज्यादा नकारात्मकता आ रही है पितामह…! इसीलिए, कलयुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा…अब मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा… क्योंकि, जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ धर्म के समूल नाश करने हेतु आक्रमण कर रही हो तो उस समय नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह…

और, उस समय जरूरी हो जाती है विजय और केवल विजय…

इस पर पितामह ने पूछा: क्या वास्तव में धर्म का नाश हो सकता है केशव?

इस पर कृष्ण ने कहा: सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़कर बैठना मूर्खता होती है… क्योंकि, ईश्वर खुद से कुछ नहीं करते… बल्कि, वे सिर्फ राह दिखाते हैं… आप खुद मुझे भी ईश्वर ही कहते हैं न… तो, मैने ही इस युद्ध में कुछ किया क्या? सबकुछ तो पांडवों को ही करना पड़ा न?

श्रीकृष्ण के इस जबाब को सुनकर भीष्म संतुष्ट दिखने लगे… और, धीरे धीरे उनकी आंखें बंद होने लगी…

परन्तु कुरुक्षेत्र की उस अंधेरी और भयावह रात्रि में जीवन का मूलमंत्र मिल चुका था कि…

जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ धर्म के समूल नाश हेतु चारों तरफ से आक्रमण कर रही हो तो उस समय नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है…

कुरुक्षेत्र के मैदान में पितामह भीष्म और भगवान श्रीकृष्ण के बीच का ये संवाद ही हर उतावले एवं अत्यधिक सुचिता पसंद हिन्दुओं का जबाब है…

कि, जब सामने से चादर और फादर वाले वामपंथियों के सहयोग से इस देश की सभ्यता संस्कृति और हिन्दू सनातन धर्म को निगल जाने को आमादा हों तो… ऐसे में नैतिकता और सुचिता का पाठ आत्मघाती है…

क्योंकि, आपके पास विजय के अतिरिक्त दूसरा और कोई विकल्प ही नहीं है…

इसीलिए, चाहे वो मणिपुर हो, चाहे काली स्थान, चाहे वजीफा हो या मुफ्त राशन सब कुछ जायज है… या फिर, अन्य पार्टियों को तोड़कर खुद में मिलाना, किसी पसमांदा को पार्टी का उपाध्यक्ष ही बनाना क्यों न हो… कुछ भी अनुचित अथवा अनैतिक नहीं है…

क्योंकि, हमारा अंतिम लक्ष्य विजय होना चाहिए… चाहे वो जैसे भी हो…!

और, इसका कारण बिल्कुल स्पष्ट है कि… जब सामने से अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ धर्म के विनाश हेतु चारों तरफ से हर तरह का जुगत लगाकर हमला कर रही हो तो… ऐसी स्थिति में नैतिकता और सुचिता का पाठ मूर्खतापूर्ण एवं आत्मघाती होता है…

जय श्री कृष्ण…!!
जय महाकाल…!!!

नोट: श्री कृष्ण और भीष्म के संवाद का ये प्रसंग जबाब है उनलोगों को भी जिनका कहना होता है कि मंदिर तो बड़के कोठा के आदेश से बना है…

ये बिल्कुल वैसा ही है कि बेशक प्रत्यक्ष रूप में महाभारत तो जीता था भीम और अर्जुन ने ही…! लेकिन, भीष्म पितामह ये बात अच्छी तरह जानते थे कि महाभारत की जीत किसी भीम या अर्जुन की जीत नहीं बल्कि ये सिर्फ और सिर्फ श्री कृष्ण की विजय है… क्योंकि, श्री कृष्ण की अनुपस्थिति में पांडवों का जीत पाना असंभव था…

इतना बवाल 370 पर क्यों? विलय तो सहमति से हुआ था!

इतना बवाल 370 पर क्यों? विलय तो सहमति से हुआ था!

परसो (11 दिसम्बर 2023) से कश्मीर तथा भारत के मुसलमानों के बीच में सारे फर्क और दूरियां समाप्त हो गई हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इन दोनों को अलग रखने वाली धारा 370 को निरस्त करने से अब सारे भारतवासी और कश्मीरी जनता एक ही नागरिक समाज के सदस्य बन गए हैं। इसी महत्वपूर्ण पहलू को सौ साल पुराने और बहुत महत्वपूर्ण राष्ट्रवादी मुस्लिम संगठन जमायते उलेमाये हिंद ने उजागर किया था। उसने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा धारा 370 को खत्म करने का स्वागत किया। इसके तहत कश्मीरी मुसलमानों को भारत से अलग रखा जाता था। अब नहीं। सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही कि कश्मीर के चंद अवसरवादी, ढोंगी और सत्तालोलुप नेता अब कश्मीरियों को बरगला नहीं पाएंगे। जमायेते उलेमाये हिंद शुरू से ही ब्रिटिश और जिन्ना की साजिशभरी हरकतों का कड़ा विरोध करता रहा। वह तो मुस्लिम लीग की कड़ी विरोधी रही।

मगर इसी परिवेश में उन कश्मीरी राजनेताओं की भर्त्सना करनी होगी जो सात दशकों से कश्मीर में सत्ता सुख भोगते रहे, सरकार चलाते रहे, राजकोष को निजी तौर पर खर्च करते रहे। यही लोग बड़े तीव्र शैली से इस कानूनी फैसले का विरोध करते रहे हैं। गिने एक एक कर उन्हें सिलसिलेवार। सबसे अव्वल रहे थे शेख मोहम्मद अब्दुला। मोहम्मद अली जिन्ना भांप गए थे कि अब्दुल्ला खुद कश्मीर घाटी के शेख बनकर रहना चाहते हैं। दोनों मुसलमान नेताओं में दृष्टि के अंतर का आधार केवल सत्ता पाने पर ही था। जिन्ना को याद रहा कि जब वे श्रीनगर गए थे तो उनके गले में जूतों की माला पहनाने वालों में शेख अब्दुल्ला के समर्थक ही थे। तब तक शेख तो जवाहरलाल नेहरू की ओर से आश्वस्त थे कि समूची घाटी के अकेले सुल्तान वे ही रहेंगे। इस विश्वास की नेहरू ने पुष्टि भी कर दी थी धारा 370 को शामिल कर। वर्ना ब्रिटिश संसद के सत्ता का हस्तांतरण करनेवाले नियमों के अनुसार हैदराबाद, जूनागढ़, जोधपुर तथा अन्य देशी रियासतों की तरह कश्मीर रियासत भी महाराजा की अनुमति के मुताबिक ही पाकिस्तान अथवा भारत से संबद्ध होती। अंततः महाराजा ने भारत से विलय को स्वीकारा।

अब देखें कि कौन हैं वे कश्मीरी मुसलमान राजनेता जो 370 के फैसले का विरोध कर रहे हैं। क्यों कर रहे हैं ? सिर्फ इसलिए कि उनकी जागीरदारी समाप्त हो गई? एक एक कर गौर करें। शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को नेहरू ने निजी कारणों से घाटी का शेख बना दिया था। यदि बाराबंकी के देशभक्त सुन्नी रफी अहमद किदवाई 1953 में कश्मीर न जाते तो शेख अब्दुल्ला इस्लामी पाकिस्तान से सौदा कर कश्मीर को पाकिस्तान में विलय कर देता। रफी साहब ने गुलमर्ग में घुसकर शेख को कैद किया, जेल में डाला और बख्शी गुलाम मोहम्मद को सत्ता सौंपी।

यहां खासकर उन तीन राजनेताओं की चर्चा हो जो कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे, सत्ता सुख भोगा, खजाने को बेतहाशा लूटा, भारत सरकार में भी मंत्री रहकर सुख भोगते रहे और कल से सुप्रीम कोर्ट की लगातार आलोचना कर रहे हैं। सर्वप्रथम हैं मियां गुलाम नबी आजाद साहब। वे इंदिरा भक्त थे, सोनिया भक्त, फिर राहुल भक्त रहे। भारत के काबीना मंत्री रहे। कश्मीर के सीएम भी। क्या बोले वे? “न्यायालय का फैसला बाद दुर्भाग्यपूर्ण है, दुखद है। भारी दिल से मानना पड़ रहा है।”

मगर इतने वर्षों से नबी साहब दिल्ली और श्रीनगर में राजसी ठाट मनाते रहे जो? वे तो अन्य राज्यों से निर्वाचित होकर संसद में गए थे। कश्मीर से ही नहीं।

फारूक अब्दुल्ला भी नाराज हुए। कौन हैं वे? अटल बिहारी वाजपेई काबीना में मंत्री रहे। वे तो भारत के उपराष्ट्रपति पद के लिए अटलजी की पसंद थे। तब कृष्ण कांत को राष्ट्रपति बनाया जा रहा था। अचानक मुलायम सिंह यादव ने अटलजी को एपीजे अब्दुल कलाम का नाम सुझाया। वे रक्षा मंत्रालय में वैज्ञानिक थे। तमिलनाडु का यह गीतापाठी, ऋषिकेश में दीक्षा पाया, तमिलभाषी सुन्नी मुसलमान तो अटलजी को भा गये। राष्ट्रपति चुना गया। तो फारूख कट गए। दोनों पदों पर मुसलमान ही कैसे होते? वे 370 पर खामोश रहे।

उनके वली अहद उमर अब्दुल्ला को तो अटलजी ने विदेश राज्यमंत्री नियुक्त किया था। फिर कश्मीर के मुख्यमंत्री बनकर उम्र ने राज भोगा। तब 370 उन्हें बड़ा माफिक लग रहा था ? गौर करें मोहम्मद मुफ्ती पर। वे भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं। कोई एतराज नहीं था? उनके पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद तो भारत के गृहमंत्री थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह तब प्रधानमंत्री थे। उनकी बेटी रुबिया का अपहरण कराया गया। अंत में छोड़ा गया। आज किस मुंह से ये सारे राजनीति के पुराने खिलाड़ी चाल बदलते हैं? बिल्कुल लाजो हया नहीं?

हां पाकिस्तान द्वारा भारत के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की आलोचना समझ में आती है। वह तो मजहब के नाम पर कश्मीर चाहता था। हालांकि मजहब के नाम पर गठित पूर्वी पाकिस्तान फिर काटकर बांग्लादेश गणराज्य बना। पाकिस्तान ने बलूचिस्तान को कैसे अपना उपनिवेश बनाया? बलोच जनता स्वाधीनता सेनानी शहीद खान अब्दुल समद खान अचकजादी के नेतृत्व में भारत से विलय चाहती थी। बलोच गांधी कहलाने वाले समद खान को जिन्ना ने जेल में डाला। पाकिस्तानी वायु सेवा ने बलूच विद्रोहियों को कुचलकर जबरन बलूचिस्तान का विलय कराया। कोई जनमत नहीं हुआ। पाकिस्तान में तो 370 जैसे धारा बलूचिस्तान और कलाट आदि के लिए बनी ही नहीं। केवल इस्लाम के नाम पर ज़ोर जबरदस्ती हुई। जैसे आज अफगान सुन्नियों को पाकिस्तान खदेड़ रहा है।

जो भारतीय वकील लोग आज 370 के पक्ष में कोर्ट में खड़े हुए थे, वे सब भूल गए कि विश्व के किसी भी देश में उसके पड़ोसी का राज्य में संवैधानिक तरीके से विलय नहीं हुआ। न्यू मेक्सिको का अमेरिका में, कुवैत का इराक में, फाकलैंड का ब्रिटेन में? सब सेना के बल पर किए गए थे। कश्मीर बस सहमति से।

साभार: के. विक्रम राव

नेहरू की गलतियों के कारण PoK बना है…

नेहरू की गलतियों के कारण PoK बना है… यही अंतिम और पूर्ण सत्य है, जो गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है… अब कुछ कांग्रेसी इतिहासकार नेहरू की फटी अचकन की तुरपाई में लगे हुए हैं… लेकिन इससे सच तो बदल नहीं जाएगा… अब आपको भी ये सच पता होना चाहिए कि कैसे नेहरू ने भारत में कश्मीर का विलय करने में देरी की… कैसे महाराजा हरी सिंह से अपनी दुश्मनी निकालने के लिए नेहरू कश्मीर को लुटते हुए देखते रहे… कैसे कश्मीर के विलय के लिए शेख अब्दुल्ला को सत्ता दिलवाने की शर्त रखी और विलय में देरी की… नतीजा कश्मीर का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान का हो गया !!!

तो ऐसा है कि 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तानी फौज ने कबायलियों के भेष में कश्मीर पर आक्रमण कर दिया… कबाइली तेज़ी से आगे बढ़ रहे थे, ये देखते हुए महाराजा हरिसिंह ने 24 अक्टूबर 1947 को ही जम्मू-कश्मीर के उपप्रधानमंत्री रामलाल बत्रा को विलय पत्र लेकर दिल्ली भेज दिया था… आप सोच रहे होंगे कि जब 24 अक्टूबर को ही महाराजा हरि सिंह का विलय पत्र दिल्ली आ गया था तो इसे उसी समय स्वीकर क्यों नहीं कर लिया गया… आखिर तीन दिन की देरी क्यों की गई… और ये तीन दिन की देरी नहीं की जाती तो भारतीय सेना 24 अक्टूबर को ही कश्मीर पहुंच जाती और हज़ारों जाने बचाई जा सकती थीं… यहां तक कि पाकिस्तान के कब्जे में आ गये कई कश्मीरी इलाके भी आज भारत के पास होते… दरअसल नेहरू ने 24 अक्टूबर 1947 को इस विलय पत्र को इसलिए स्वीकार नहीं किया क्योंकि इसमें उनके परमप्रिय मित्र शेख अब्दुल्ला को सत्ता सौंपने का वादा नहीं था… 25 और 26 अक्टूबर को दिल्ली में लंबी-लंबी बैठके होती रहीं लेकिन नेहरू टस से मस नहीं हुए… आखिरकार 26 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिस मेहरचंद महाजन दिल्ली पहुंचे… और उनकी प्रधानमंत्री निवास पर नेहरू, सरदार पटेल और अन्य महत्वपूर्ण लोगों के साथ बैठक हुई… इस बैठक में क्या हुआ इसका जिक्र खुद महाजन ने अपनी आत्मकथा लुकिंग बैक में किया है… मेहरचंद महाजन बाद में जाकर भारत के तीसरे चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया भी बने इसीलिए उनकी लिखी बातों को हल्के में नहीं लिया जा सकता है… वो अपनी आत्मकथा लुकिंग बैक के पेज नंबर 151 पर लिखते हैं कि –

“बैठक में मैंने बताया कि कबायली श्रीनगर की तरफ बढ़ रहे हैं इसलिए कश्मीर को तत्काल सैनिक मदद दी जाये। मैंने भावुक होकर कहा कि – ‘श्रीनगर को विनाश से बचाया जाना चाहिए।’ इस पर प्रधानमंत्री नेहरू ने कहा कि – ‘कोई बात नहीं, अगर कबाइलियों ने श्रीनगर पर कब्ज़ा कर भी लिया तो भारत इतना ताकतवर है कि वो उसे वापस छुड़ा लेगा।’… नेहरू की ये बात सुनकर मैंने सोचा कि श्रीनगर को वापस तो छुड़वा लिया जाएगा लेकिन जो विनाश होगा उसकी भरपाई कौन करेगा? … लेकिन फिर भी मैं सैनिक साहयता की मांग पर अड़ा था और नेहरू अपनी बात पर अड़े हुए थे।”

दरअसल नेहरू का एक ही ऐजेंडा था पहले शेख को सत्ता दो, फिर सेना भेजेंगे, तब तक कश्मीर जाये भाड़ में… इस सनसनीखेज़ बैठक के बारे में जस्टिस मेहरचंद महाजन ने अपनी आत्मकथा लुकिंग बैक में जो आगे लिखा है वो और भी चौंकाने वाला है… उन्होने बताया है कि नेहरू को विलय पर मनाने के लिए उन्हे धमकी तक का सहारा लेना पड़ा… जस्टिस महाजन लिखते हैं –

“मैंने पंडित नेहरु से कहा कि- ‘हमारे विलय को प्रस्ताव को स्वीकार कर कश्मीर को सैनिक मदद दीजिए और जिस पापुलर पार्टी (*यानी शेख अबदुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस) को आप जो सत्ता देना चाहते हैं वो दे दीजिए। लेकिन कल तक श्रीनगर में भारतीय सेना पहुंच जाना चाहिए। नहीं तो मुझे श्रीनगर को विनाश से बचाने के लिए जिन्ना के पास जाकर समझौता करना होगा।’… ये सुनकर नेहरू परेशान हो गये और उन्होंने मुझसे गुस्से में कहा कि ‘Mahajan, go away (चले जाओ महाजन)’… मैं उठा और कमरे से बाहर निकलने ही वाला था कि सरदार पटेल ने मुझे रोकते हुए मेरे कान में कहा – ‘महाजन, आप पाकिस्तान नहीं जा रहे हैं।’ तभी, कागज का एक टुकड़ा नेहरु की ओर बढ़ा दिया गया… नेहरू ने उसे पढ़ा और ऊंची आवाज में कहा, “शेख साहब भी यही मानते हैं।” शेख अब्दुल्ला बैठक वाले कमरे से सटे एक दूसरे कमरे में थे और हमारी सारी बातें सुन रहे थे।… इस पर्ची को पढ़ते ही प्रधानमंत्री नेहरु का रुख बदल गया।”

दरअसल नेहरू के घर में छुपे बैठे शेख अब्दुल्ला ने जब अपने हाथ से सत्ता फिसलते देखी तो उन्होने एक पर्ची नेहरू तक पहुंचाई… और नेहरु को समझाया कि सेना भेज देने में ही भलाई है। आखिरकार 27 अक्टूबर की सुबह श्रीनगर के हवाई अड्डे पर भारतीय सेना के जांबाज़ सिपाही उतर गये… और इसी के साथ शुरु हो चुका था भारत और पाकिस्तान के बीच पहला युद्ध…

लेकिन इस लेनदेन और सौदेबाज़ी के बीच कश्मीर को और बाद में जाकर इस देश को कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी इसका अंदाज़ शायद आपको नहीं होगा… अगर भारत 24 तारीख को ही सेना भेज देता तो बारामुला, पूंछ, रजौरी, नौशेरा, अखनूर कोटली, छंब में हज़ारों लोगों की जान और हज़ारों महिलाओं की इज्जत बच जाती जिन्हें कबायलियों ने तार-तार कर दिया था… लेकिन फिर वो नेहरू ही क्या जो सही समय पर, सही फैसला ले लें…

एक गोत्र में विवाह न करने का कारण..??

एक गोत्र में विवाह न करने का कारण..??

पुत्री को अपने पिता का गोत्र क्यों नही प्राप्त होता आइये वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें..??हम आप सब जानते हैं कि स्त्री में गुणसूत्र xx और पुरुष में xy गुणसूत्र होते हैं।इनकी सन्तति में माना कि पुत्र हुआ (xy गुणसूत्र) अर्थात इस पुत्र में y गुणसूत्र पिता से ही आया यह तो निश्चित ही है क्योंकि माता में तो y गुणसूत्र होता ही नही है और यदि पुत्री हुई तो (xx गुणसूत्र) यानी यह गुणसूत्र पुत्री में माता व पिता दोनों से आते हैं ।

  1. xx गुणसूत्र :-
    xx गुणसूत्र अर्थात पुत्री , अस्तु xx गुणसूत्र के जोड़े में एक x गुणसूत्र पिता से तथा दूसरा x गुणसूत्र माता से आता है । तथा इन दोनों गुणसूत्रों का संयोग एक गांठ सी रचना बना लेता है जिसे Crossover कहा जाता है ।
  2. xy गुणसूत्र :-
    xy गुणसूत्र अर्थात पुत्र , यानी पुत्र में y गुणसूत्र केवल पिता से ही आना संभव है क्योंकि माता में y गुणसूत्र है ही नही । और दोनों गुणसूत्र असमान होने के कारन पूर्ण Crossover नही होता केवल ५ % तक ही होता है । और ९५ % y गुणसूत्र ज्यों का त्यों (intact) ही रहता है, तो महत्त्वपूर्ण y गुणसूत्र हुआ । क्योंकि y गुणसूत्र के विषय में हमें निश्चित है कि यह पुत्र में केवल पिता से ही आया है।बस इसी y गुणसूत्र का पता लगाना ही गोत्र प्रणाली का एकमात्र उदेश्य है जो हजारों / लाखों वर्ष पूर्व हमारे ऋषियों ने जान लिया था वैदिक गोत्र प्रणाली और y गुणसूत्र अब तक हम यह समझ चुके है कि वैदिक गोत्र प्रणाली y गुणसूत्र पर आधारित है अथवा y गुणसूत्र को ट्रेस करने का एक माध्यम है ।उदहारण के लिए यदि किसी व्यक्ति का गोत्र कश्यप है तो उस व्यक्ति में विद्यमान y गुणसूत्र कश्यप ऋषि से आया है या कश्यप ऋषि उस y गुणसूत्र के मूल हैं।चूँकि y गुणसूत्र स्त्रियों में नही होता यही कारण है कि विवाह के पश्चात स्त्रियों को उसके पति के गोत्र से जोड़ दिया जाता है।वैदिक / हिन्दू संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारण यह है कि एक ही गोत्र से होने के कारण वह पुरुष व स्त्री भाई बहन कहलाएंगे क्योंकि उनका प्रथम पूर्वज एक ही है ।परन्तु ये थोड़ी अजीब बात नही कि जिन स्त्री व पुरुष ने एक दुसरे को कभी देखा तक नही और दोनों अलग अलग देशों में परन्तु एक ही गोत्र में जन्मे , तो वे भाई बहन हो गये ? इसका मुख्य कारण एक ही गोत्र होने के कारण गुणसूत्रों में समानता का भी है । आज के आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार यदि सामान गुणसूत्रों वाले दो व्यक्तियों में विवाह हो तो उनकी सन्तति आनुवंशिक विकारों के साथ उत्पन्न होगी ।ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा , पसंद , व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता । ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है। विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है कि सगोत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष अर्थात मानसिक विकलांगता , अपंगता , गंभीर रोग आदि जन्मजात ही पाए जाते हैं । शास्त्रों के अनुसार इन्हीं कारणों से सगोत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाया था। इस गोत्र का संवहन यानी उत्तराधिकार पुत्री को एक पिता प्रेषित न कर सके , इसलिये विवाह से पहले कन्यादान कराया जाता है और गोत्र मुक्त कन्या का पाणिग्रहण कर भावी वर अपने कुल गोत्र में उस कन्या को स्थान देता है , यही कारण था कि उस समय विधवा विवाह भी स्वीकार्य नहीं था , क्योंकि , कुल गोत्र प्रदान करने वाला पति तो मृत्यु को प्राप्त कर चुका है।इसीलिये , कुंडली मिलान के समय वैधव्य पर खास ध्यान दिया जाता और मांगलिक कन्या होने पर ज्यादा सावधानी बरती जाती है ।आत्मज या आत्मजा का सन्धिविच्छेद तो कीजिये आत्म + ज अथवा आत्म + जा
    आत्म = मैं , ज या जा = जन्मा या जन्मी , यानी मैं ही जन्मा या जन्मी हूँ। यदि पुत्र है तो 95% पिता और 5% माता का सम्मिलन है । यदि पुत्री है तो 50% पिता और 50% माता का सम्मिलन है । फिर यदि पुत्री की पुत्री हुई तो वह डीएनए 50% का 50% रह जायेगा , फिर यदि उसके भी पुत्री हुई तो उस 25% का 50% डीएनए रह जायेगा , इस तरह से सातवीं पीढ़ी में पुत्री जन्म में यह प्रतिशत घटकर 1% रह जायेगा ।अर्थात , एक पति-पत्नी का ही डीएनए सातवीं पीढ़ी तक पुनः पुनः जन्म लेता रहता है , और यही है सात जन्मों का साथ। लेकिन , जब पुत्र होता है तो पुत्र का गुणसूत्र पिता के गुणसूत्रों का 95% गुणों को अनुवांशिकी में ग्रहण करता है और माता का 5% ( जो कि किन्हीं परिस्थितियों में एक % से कम भी हो सकता है ) डीएनए ग्रहण करता है , और यही क्रम अनवरत चलता रहता है, जिस कारण पति और पत्नी के गुणों युक्त डीएनए बारम्बार जन्म लेते रहते हैं, अर्थात यह जन्म जन्मांतर का साथ हो जाता है..

जय गोविंदा

🚨 Israel Palestine WarIsrael Women Soldiers 🇮🇱🇮🇱

🚨 Israel Palestine War
Israel Women Soldiers 🇮🇱🇮🇱

दुनिया के नक्शे में एक डॉट के बराबर दिखने वाला एक देश है।
तीन इज़राइल मिलकर राजस्थान के बराबर भी नही होते, फिर भी इज़राइल धार्मिक रूप से इतना कट्टर देश है कि वहां रविवार को नाक साफ करने पर न केवल जुर्माना लग जाता है बल्कि जेल भी हो सकती है, बावजूद इसके आज उसके पास रूस, अमेरिका और चीन के बाद दुनिया की चौथी सबसे बड़ी वायुसेना है…

इज़राइल दुनिया के उन 9 देशों में शामिल है जिनके पास खुद का सेटेलाइट सिस्टम है, जिसकी सहायता से वो ड्रोन चलाता है, अपनी सेटेलाइट टेक्नोलॉजी इज़राइल किसी देश के साथ साझा नही करता,

इज़राइल दुनिया का एकमात्र देश है जो एंटी_बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम से पूरी तरह लैस है। इज़राइल की ओर आने वाली हर मिसाइल न सिर्फ रास्ते मे मार गिराई जाती है बल्कि एक मिनट के भीतर मिसाइल दागने वाली जगह की पहचान कर इज़राइल जवाबी मिसाइल दाग कर सब कुछ तहस नहस कर देता है…

नागरिकता को लेकर इज़राइल की स्पष्ट नीति है कि दुनिया के किसी भी हिस्से में रहने वाले यहूदी को इज़राइल अपना नागरिक मानता है। हाँ, यहूदी होने के लिए माँ और पिता दोनों का यहूदी होना अनिवार्य है। हैरानी की बात तो यह है कि जिस कौम की धार्मिक किताब दुनिया भर की धार्मिक किताबों में सबसे ज्यादा खून खराबे का आदेश देती है, वो कौम नोबल पुरस्कारों में डंका पीट देती है..

आखिर ऐसा क्या है यहूदियों में जो न केवल आज दुनिया में अपनी सैन्य शक्ति से वो पूरी दुनिया मे अपनी ताकत का लोहा मनवाते है। इज़राइल की महिलाएं जिनके लिए आर्मी ट्रेनिग अनिवार्य है, उनकी सोच सिर्फ यहूदी बच्चे पैदा करना नही होती, वो फोकस करती है एक योद्धा, एक बिजनेसमैन, एक कामयाब और जहीन इंसान पैदा करने पर और ये सोच सिर्फ उसकी नही पूरे इज़राइल राष्ट्र की होती है…

एक कामयाब इंसान पैदा करने की शुरुवात वो उसी वक्त से कर देती है जब उन्हें गर्भ ठहरने का आभास होता है। प्रेग्नेंसी के दौरान यहूदी औरतें अपने लाइफ पार्टनर के साथ गणित के सवाल हल करती है। इसे मेंटल मैथ टेकनिक बोला जाता है, जिसमे सवालो को बोल बोल के हल किया जाता है।
गर्भावस्था के दौरान उनका ज्यादातर वक्त गीत संगीत के बीच एक रिलैक्स इनवायरमेंट में बीतता है…

दुनिया भर में सिगरेट के सभी बड़े ब्राण्ड भले ही इज़राइली कम्पनियो के हो लेकिन आप किसी गर्भवती महिला के घर के आसपास भी सिगरेट नही पी सकते।
उनका मानना है कि सिगरेट होने वाले बच्चे के DNA और जीन्स को खराब कर सकती है। बच्चों को जंक फूड देने की सख्ती से मनाही होती है। उन्हें कार्टून, फुटबाल के बजाय तीरंदाज़ी और शूटिंग जैसे खेल खिलाए और सिखाए जाते है।

उनका मानना है कि तीरंदाज़ी और शूटिंग जैसे खेल बच्चों में सही फैसले लेने की सलाहियत पैदा करते है। स्कूल में भर्ती करने से पहले ही माँ बाप बच्चों को प्रैक्टिकली कारोबारी मैथ सिखाते हैं…

बच्चों को धार्मिक या अन्य विषयों से इतर साइंस पढ़ने के लिए ज्यादा प्रेरित किया जाता है। पढ़ाई के आखिरी सालों में डिग्री कालेजो में कारोबार स्टडी के लिए उनके ग्रुप बना कर उन्हें टास्क दिए जाते है और सिर्फ उसी ग्रुप के बच्चे पास किए जाते है जो कम से कम 10000_डॉलर का मुनाफा कमाने में सफल हो जाए। इससे कम मुनाफे वालो को डिग्री नही दी जाती…

न्यूयार्क में इनका एक सोशल सेट-अप सेंटर है, जो यहूदियों को बिज़नेस के लिए बिना ब्याज के लोन प्रोवाइड कराते है, मेडिकल साइंस के स्टूडेंट को नौकरी करने के बजाय प्राइवेट प्रैक्टिस के लिए सेटअप उपलब्ध कराया जाता है, इसीलिए पूरी दुनिया मे यहूदी डॉक्टर्स आपको नौकरी में रेयर ही मिलेंगे.. इज़राइल के नागरिक नौकरी नही करते बल्कि दुनियां के लोगो को नौकरी देते है..

इज़राइल सिर्फ एक देश एक कौम नही, ये एक इंफ्रास्ट्रक्चर एक सोच है, जो नस्ल दर नस्ल आगे बढ़ाई जाती है। दुनियां को इनसे सीखने की जरूरत है..

सोचिए और सीखिए कैसे एक छोटी सी कम्युनिटी धार्मिक रूप से कट्टर होते हुए भी पूरी दुनिया पर छाई है.. खासकर हमारे जैसे देश को इस बारे में सोचने की बहुत जरूरत है हम कैसे उस रास्ते पर चल सकते है..

India stand with Israel

माता-पिता और भाई-बहन के सामने बालक का गला ‘अल्लाहु अकबर’ कह कर रेता गया। सोती हुई महिलाओं और बच्चों को लाइव स्ट्रीमिंग करते हुए गोलियाँ मारी गई। शवों को अर्धनग्न कर के परेड कराए गए। ये सब कार्य आतंकी मुसलमानों ने किया। 600 यहूदियों की नृशंस हत्या हुई।

इसके बाद फिलिस्तीन के साथ वही खड़ा है जिसे गले पर चाकु चलाते समय रिसता हुआ रक्त अच्छा लगता है। हमास को पीड़ित वही बता सकता है जो अपने मन में स्त्रियों और बच्चियों के, शवों के साथ ही सही, बलात्कार की इच्छा पाले हुए घूमता है।

वो जो बैलेंस बना कर चलते हैं, या न्यूट्रल होने के लिए हमास का पक्ष देखते हैं वो स्वयं आतंकी हैं। जो मानसिक रूप से विक्षिप्त और विकृत यौनिकता पाले घूमते हैं, उनके ही भीतर फिलिस्तीन की नृशंसता पर उनके ही पीड़ित होने का भाव उपजेगा।

मुस्लिम नाम वाले कई हैंडल यह बताते थक नहीं रहे कि ‘अरे! वो तो जन्मे ही युद्ध लड़ कर मरने के लिए हैं, उन्हें मौत का क्या भय।’ इसी के साथ वो यह भी मान लेते हैं कि बच्चों का गला रेतना, महिलाओं का बलात्कार और उन्हें बंधक बनाना, शवों के साथ बर्बरता उचित है क्योंकि ये काम करने वाले आतंकी उनके मजहब के हैं।

एक पत्रकार लिखती है कि जो मरी है वो तो बिकिनी पहन कर फोटो लगाया करती थी। वो स्वयं एक लड़की हो कर ऐसा केवल इस कारण लिख रही है क्योंकि वो भी मुस्लिम है, आतंकी भी।

एक लिखती है कि आँख के बदले आँख पूरे संसार को अंधा बना देगा। ये भी उसने तब लिखा जब पहली आँख किसी मुस्लिम आतंकी ने निकाली और वो स्वयं भी मुस्लिम है।

एक पूरा मजहब यह बताता फिरता है कि इस्लाम कैसे युद्ध करता है और कैसे वो आजादी के लिए लड़ रहे हैं। जेरूसलम ईसाईयों का भी पवित्र स्थल है, वो तो उसकी मुक्ति के लिए संघर्ष नहीं कर रहे! ये कीड़ा इन्हीं के भीतर क्यों है?

सत्य यही है कि शांति इनकी शब्दावली में किसी अन्य अर्थ के साथ है, या है ही नहीं। इनका दूसरा नाम ही अतिक्रमण है। इनकी विचाराधारा का समर्थन हिंसक, नरसंहार-प्रेमी और यौनविकृति का शिकार व्यक्ति ही कर सकता है।

पूरे विश्व को अपने अस्तित्व रक्षा हेतु ऐसे आतंकियों के सर्वनाश की योजना पर कार्य करना चाहिए।

वाया Ajeet Bharti जी के पेज से

IndiaWithIsrael #IStandWithIsrael

जवाहरलाल नेहरू अभिनेत्री नरगिस के मामा थे।

लीजिए पेश है अनंत ज्ञान के भंडार से एक और सच्चाई।

जवाहरलाल नेहरू अभिनेत्री नरगिस के मामा थे।

नरगिस की नानी दिलीपा मंगल पाण्डेय के ननिहाल के राजेन्द्र पाण्डेय की बेटी थीं।

उनकी शादी 1880 में बलिया में हुई थी लेकिन शादी के एक हफ़्ते के अंदर ही उनके पति गुज़र गए थे।

दिलीपा की उम्र उस वक़्त सिर्फ़ 13 साल थी। उस ज़माने में विधवाओं की ज़िंदगी बेहद तक़लीफ़ों भरी होती थी।

ज़िंदगी से निराश होकर दिलीपा एक रोज़ आत्महत्या के इरादे से गंगा की तरफ़ चल पड़ीं, लेकिन रात में रास्ता भटककर मियांजान नाम के एक सारंगीवादक के झोंपड़े में पहुँच गयीं जो तवायफ़ों के कोठों पर सारंगी बजाता था…

मियांजान के परिवार में उसकी बीवी और एक बेटी मलिका थे… वो मलिका को भी तवायफ़ बनाना चाहता था…

दिलीपा को मियांजान ने अपने घर में शरण दी…

और फिर मलिका के साथ साथ दिलीपा भी धीरे धीरे तवायफ़ों वाले तमाम तौर तरीक़े सीख गयीं…

और एक रोज़ चिलबिला की मशहूर तवायफ़ रोशनजान के कोठे पर बैठ गयीं…

रोशनजान के कोठे पर उस ज़माने के नामी वक़ील मोतीलाल नेहरू का आना जाना रहता था…

जिनकी पत्नी पहले बच्चे के जन्म के समय गुज़र गयी थी…

दिलीपा के सम्बन्ध मोतीलाल नेहरू से बन गए…

इस बात का पता चलते ही मोतीलाल के घरवालों ने उनकी दूसरी शादी लाहौर की स्वरूप रानी से करा दी जिनकी उम्र उस वक़्त 15 साल थी…

इसके बावजूद मोतीलाल ने दिलीपा के साथ सम्बन्ध बनाए रखे…

इधर दिलीपा का एक बेटा हुआ जिसका नाम मंज़ूर अली रखा गया…

उधर कुछ ही दिनों बाद 14 नवम्बर 1889 को स्वरूपरानी ने जवाहरलाल नेहरू को जन्म दिया…

साल 1900 में स्वरूप रानी ने विजयलक्ष्मी पंडित को जन्म दिया…

और 1901 में दिलीपा के “जद्दनबाई” पैदा हुईं…

“अभिनेत्री नरगिस” इन्हीं जद्दनबाई की बेटी थीं…

मंज़ूर अली आगे चलकर मंज़ूर अली सोख़्त के नाम से बहुत बड़े मज़दूर नेता बने…

और साल 1924 में उन्होंने यह कहकर देशभर में सनसनी फैला दी कि…

मैं मोतीलाल नेहरू का बेटा और जवाहरलाल नेहरू का बड़ा भाई हूँ…

उधर एक रोज़ लखनऊ नवाब के बुलावे पर जद्दनबाई मुजरा करने लखनऊ गयीं… तो दिलीपा भी उनके साथ थी…

जवाहरलाल नेहरू काँग्रेस के किसी काम से उन दिनों लखनऊ में थे…

उन्हें पता चला तो वो उन दोनों से मिलने चले आए…

दिलीपा जवाहरलाल नेहरू से लिपट गयीं.और रो रोकर मोतीलाल नेहरू का हालचाल पूछने लगीं…

मुजरा ख़त्म हुआ तो जद्दनबाई ने जवाहरलाल नेहरू को राखी बाँधी…

साल 1931 में मोतीलाल नेहरू ग़ुज़रे तो दिलीपा ने अपनी चूड़ियाँ तोड़ डालीं…

और उसके बाद से वो विधवा की तरह रहने लगीं…

गुजरात के वरिष्ठ लेखक रजनीकुमार पंड्या जी की क़िताबआप की परछाईयांसे साभार।

प्रकाश की गति की खोज

बचपन से ही हमें स्कूलों में पढ़ाया गया है कि प्रकाश की गति खोज…… डेनमार्क के खगोलविद ओले क्रिस्टेंसेन रोमर ने की थी.

साथ ही कहा जाता है कि… रोमर से पहले गैलीलियो और न्यूटन जैसे महान वैज्ञानिकों ने काफी प्रयास के बाद भी प्रकाश के वेग को नहीं जान पाए थे

हालांकि, गैलीलियो इतना तो समझ गए थे कि ब्रह्मांड में प्रकाश की गति सबसे तेज है लेकिन वे ये कभी नहीं जान पाए कि वास्तव में प्रकाश की गति है कितनी ???

अंततः…. रोमर ने पहली बार 1676 में प्रकाश का वेग निर्धारित किया था.

जबकि, वास्तविकता काफी चौंकाने वाली है.

क्योंकि, आधुनिक समय में महर्षि सायण, जो वेदों के महान भाष्यकार थे , ने 14वीं सदी में प्रकाश की गति की गणना कर डाली थी…
जिसका आधार ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 50 वें सूक्त का चौथा श्लोक था.

असल में ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 50 वें सूक्त का चौथा श्लोक कहता है….

तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य ।
विश्वमा भासि रोचनम् ॥
-ऋग्वेद 1. 50 .4

अर्थात… हे सूर्य…
तुम तीव्रगामी एवं सर्वसुन्दर तथा प्रकाश के दाता और जगत् को प्रकाशित करने वाले हो.

उपरोक्त श्लोक पर टिप्पणी करते हुए महर्षि सायण ने निम्न श्लोक प्रस्तुत किया था…

तथा च स्मर्यते योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते द्वे च योजने एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते॥
-सायण ऋग्वेद भाष्य 1. 50 .4

अर्थात, आधे निमेष में 2202 योजन का मार्गक्रमण करने वाले प्रकाश तुम्हें नमस्कार है.

इस उपरोक्त श्लोक से हमें प्रकाश के आधे निमिष में 2202 योजन चलने का पता चलता है.

अब हम समय की ईकाई निमिष तथा दूरी की ईकाई योजन को आधुनिक वर्तमान इकाईयों में परिवर्तित कर सकते है.

किन्तु, उससे पूर्व हम प्राचीन समय तथा दूरी की इन इकाईयों के मान को जान लेते हैं.

इस बारे में हमारी मनुस्मृति कहती है…

निमेषे दश चाष्टौ च काष्ठा त्रिंशत्तु ताः कलाः |
त्रिंशत्कला मुहूर्तः स्यात् अहोरात्रं तु तावतः || ……..मनुस्मृति 1-64

इस तरह मनुस्मृति 1-64 के अनुसार
पलक झपकने के समय को 1 निमिष कहा जाता है !
18 निमीष = 1 काष्ठ;
30 काष्ठ = 1 कला;
30 कला = 1 मुहूर्त;
30 मुहूर्त = 1 दिन व् रात (लगभग 24 घंटे )

अतः एक दिन (24 घंटे) में निमिष हुए :
24 घंटे = 30x30x30x18= 4,86,000 निमिष

जबकि, आधुनिक गिनती की इकाई के हिसाब से 24 घंटे में सेकेंड हुए …
24x60x60 = 86,400 सेकंड

इस तरह….

86,400 सेकंड =4,86,000 निमिष

अतः 1 सेकंड में निमिष हुए :

1 निमिष = 86400 /486000 = 0.17778 सेकंड

अंततः…. 1/2 निमिष = 0.17778/2 = 0.08889 सेकंड

इसी तरह अगर हम योजन की बात करें तो….
श्री मद्भागवतम 3.30.24, 5.1.33, 5.20.43 आदि के अनुसार

1 योजन = 8 मील लगभग

तो, 2202 योजन = 8 x 2202 = 17,616 मील

अब हम अपने ऋग्वेद में उल्लेखित प्रकाश की गति को यदि आधुनिक गणना पद्धति में बिठाते हैं तो… हम पाते हैं कि….

सूर्य प्रकाश 1/2 (आधे) निमिष में 2202 योजन चलता है…. अर्थात,
0.08889 सेकंड में 17, 616 मील चलता है.

अर्थात, 0.08889 सेकंड में प्रकाश की गति = 17,616 मील

तो, 1 सेकेंड में = 17,616 / 0.08889 = 1,98,177 मील (3,18,934.966 किलोमीटर) लगभग

तथा, हैरानी की बात है कि आज की आधुनिकतम विज्ञान भी प्रकाश गति को…. 1,86,000 मील (3,18,934.966 किलोमीटर) प्रति सेकंड ही बताती है.

कहने का मतलब है कि…. खगोल विज्ञान के जिस ज्ञान को आधुनिकतम विज्ञान ने 1676 में खोजा और बताया …
वो ज्ञान तो हमारे ऋग्वेद में हजारों लाखों साल पहले से ही उल्लेखित है.

इसका मतलब हुआ कि…. जिस समय ये पश्चिमी सभ्यता के लोग जंगलों में नंग धड़ंग रहते थे….
और, चूहे बिल्ली आदि मार कर खाया करते थे….

उस समय हमारे विद्वान ऋषि-मुनि खगोलशास्त्र और विज्ञान में अंतरिक्ष की गहराइयाँ एवं प्रकाश की गति नाप रहे थे…!

क्योंकि, हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ऋग्वेद को निर्विवाद रूप से मानव सभ्यता का सबसे प्राचीन ग्रंथ माना जाता है

तो, हमारी ऐसी अनमोल उपलब्धियों के कारण हमें अपने धर्मग्रंथों तथा अपने सनातन धर्म पर आखिर क्यों गर्व नहीं होना चाहिए ????

जय श्रीराम 🚩🙏💐❣️😊

सनातनधर्महीसर्वश्रेष्ठहै

जय_सनातन

क्यों कब और कैसे डूबी द्वारिका नगरी?

श्री महाराज जी के श्रीमुख से

क्यों कब और कैसे डूबी द्वारिका नगरी?

श्री कृष्ण की नगरी द्वारिका महाभारत युद्ध के 36 वर्ष पश्चात समुद्र में डूब जाती है। द्वारिका के समुद्र में डूबने से पूर्व श्री कृष्ण सहित सारे यदुवंशी भी मारे जाते है। समस्त यदुवंशियों के मारे जाने और द्वारिका के समुद्र में विलीन होने के पीछे मुख्य रूप से दो घटनाएं जिम्मेदार है। एक माता गांधारी द्वारा श्री कृष्ण को दिया गया श्राप और दूसरा ऋषियों द्वारा श्री कृष्ण पुत्र सांब को दिया गया श्राप।

महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब युधिष्ठर का राजतिलक हो रहा था तब कौरवों की माता गांधारी ने महाभारत युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए श्राप दिया की जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है ठीक उसी प्रकार यदुवंश का भी नाश होगा।

महाभारत युद्ध के बाद जब छत्तीसवां वर्ष आरंभ हुआ तो तरह-तरह के अपशकुन होने लगे। एक दिन महर्षि विश्वामित्र, कण्व, देवर्षि नारद आदि द्वारका गए। वहां यादव कुल के कुछ नवयुवकों ने उनके साथ परिहास (मजाक) करने का सोचा। वे श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को स्त्री वेष में ऋषियों के पास ले गए और कहा कि ये स्त्री गर्भवती है। इसके गर्भ से क्या उत्पन्न होगा?

ऋषियों ने जब देखा कि ये युवक हमारा अपमान कर रहे हैं तो क्रोधित होकर उन्होंने श्राप दिया कि- श्रीकृष्ण का यह पुत्र वृष्णि और अंधकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए एक लोहे का मूसल उत्पन्न करेगा, जिसके द्वारा तुम जैसे क्रूर और क्रोधी लोग अपने समस्त कुल का संहार करोगे।

उस मूसल के प्रभाव से केवल श्रीकृष्ण व बलराम ही बच पाएंगे। श्रीकृष्ण को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कहा कि ये बात अवश्य सत्य होगी।
मुनियों के श्राप के प्रभाव से दूसरे दिन ही सांब ने मूसल उत्पन्न किया।

जब यह बात राजा उग्रसेन को पता चली तो उन्होंने उस मूसल को चुरा कर समुद्र में डलवा दिया। इसके बाद राजा उग्रसेन व श्रीकृष्ण ने नगर में घोषणा करवा दी कि आज से कोई भी वृष्णि व अंधकवंशी अपने घर में मदिरा तैयार नहीं करेगा। जो भी व्यक्ति छिपकर मदिरा तैयार करेगा, उसे मृत्युदंड दिया जाएगा। घोषणा सुनकर द्वारकावासियों ने मदिरा नहीं बनाने का निश्चय किया।

जब श्रीकृष्ण ने नगर में होते इन अपशकुनों को देखा तो उन्होंने सोचा कि कौरवों की माता गांधारी का श्राप सत्य होने का समय आ गया है। इन अपशकुनों को देखकर तथा पक्ष के तेरहवें दिन अमावस्या का संयोग जानकर श्रीकृष्ण काल की अवस्था पर विचार करने लगे। उन्होंने देखा कि इस समय वैसा ही योग बन रहा है जैसा महाभारत के युद्ध के समय बना था।

गांधारी के श्राप को सत्य करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण ने यदुवंशियों को तीर्थयात्रा करने की आज्ञा दी। श्रीकृष्ण की आज्ञा से सभी राजवंशी समुद्र के तट पर प्रभास तीर्थ आकर निवास करने लगे।

प्रभास तीर्थ में रहते हुए एक दिन जब अंधक व वृष्णि वंशी आपस में बात कर रहे थे। तभी सात्यकि ने आवेश में आकर कृतवर्मा का उपहास और अनादर कर दिया। कृतवर्मा ने भी कुछ ऐसे शब्द कहे कि सात्यकि को क्रोध आ गया और उसने कृतवर्मा का वध कर दिया।

यह देख अंधकवंशियों ने सात्यकि को घेर लिया और हमला कर दिया। सात्यकि को अकेला देख श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न उसे बचाने दौड़े। सात्यकि और प्रद्युम्न अकेले ही अंधकवंशियों से भिड़ गए। परंतु संख्या में अधिक होने के कारण वे अंधकवंशियों को पराजित नहीं कर पाए और अंत में उनके हाथों मारे गए।

अपने पुत्र और सात्यकि की मृत्यु से क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने एक मुट्ठी एरका घास उखाड़ ली। हाथ में आते ही वह घास वज्र के समान भयंकर लोहे का मूसल बन गई। उस मूसल से श्रीकृष्ण सभी का वध करने लगे। जो कोई भी वह घास उखाड़ता वह भयंकर मूसल में बदल जाती (ऐसा ऋषियों के श्राप के कारण हुआ था)। उन मूसलों के एक ही प्रहार से प्राण निकल जाते थे। उस समय काल के प्रभाव से अंधक, भोज, शिनि और वृष्णि वंश के वीर मूसलों से एक-दूसरे का वध करने लगे। यदुवंशी भी आपस में लड़ते हुए मरने लगे।

श्रीकृष्ण के देखते ही देखते सांब, चारुदेष्ण, अनिरुद्ध और गद की मृत्यु हो गई। फिर तो श्रीकृष्ण और भी क्रोधित हो गए और उन्होंने शेष बचे सभी वीरों का संहार कर डाला। अंत में केवल दारुक (श्रीकृष्ण के सारथी) ही शेष बचे थे। श्रीकृष्ण ने दारुक से कहा कि तुम तुरंत हस्तिनापुर जाओ और अर्जुन को पूरी घटना बता कर द्वारका ले आओ। दारुक ने ऐसा ही किया। इसके बाद श्रीकृष्ण बलराम को उसी स्थान पर रहने का कहकर द्वारका लौट आए।

द्वारका आकर श्रीकृष्ण ने पूरी घटना अपने पिता वसुदेवजी को बता दी। यदुवंशियों के संहार की बात जान कर उन्हें भी बहुत दुख हुआ। श्रीकृष्ण ने वसुदेवजी से कहा कि आप अर्जुन के आने तक स्त्रियों की रक्षा करें। इस समय बलरामजी वन में मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं,

मैं उनसे मिलने जा रहा हूं। जब श्रीकृष्ण ने नगर में स्त्रियों का विलाप सुना तो उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि शीघ्र ही अर्जुन द्वारका आने वाले हैं। वे ही तुम्हारी रक्षा करेंगे। ये कहकर श्रीकृष्ण बलराम से मिलने चल पड़े।

वन में जाकर श्रीकृष्ण ने देखा कि बलरामजी समाधि में लीन हैं। देखते ही देखते उनके मुख से सफेद रंग का बहुत बड़ा सांप निकला और समुद्र की ओर चला गया। उस सांप के हजारों मस्तक थे। समुद्र ने स्वयं प्रकट होकर भगवान शेषनाग का स्वागत किया। बलरामजी द्वारा देह त्यागने के बाद श्रीकृष्ण उस सूने वन में विचार करते हुए घूमने लगे। घूमते-घूमते वे एक स्थान पर बैठ गए और गांधारी द्वारा दिए गए श्राप के बारे में विचार करने लगे। देह त्यागने की इच्छा से श्रीकृष्ण ने अपनी इंद्रियों का संयमित किया और महायोग (समाधि) की अवस्था में पृथ्वी पर लेट गए।

जिस समय भगवान श्रीकृष्ण समाधि में लीन थे, उसी समय जरा नाम का एक शिकारी हिरणों का शिकार करने के उद्देश्य से वहां आ गया। उसने हिरण समझ कर दूर से ही श्रीकृष्ण पर बाण चला दिया। बाण चलाने के बाद जब वह अपना शिकार पकडऩे के लिए आगे बढ़ा तो योग में स्थित भगवान श्रीकृष्ण को देख कर उसे अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ। तब श्रीकृष्ण को उसे आश्वासन दिया और अपने परमधाम चले गए। अंतरिक्ष में पहुंचने पर इंद्र, अश्विनीकुमार, रुद्र, आदित्य, वसु, मुनि आदि सभी ने भगवान का स्वागत किया।

इधर दारुक ने हस्तिनापुर जाकर यदुवंशियों के संहार की पूरी घटना पांडवों को बता दी। यह सुनकर पांडवों को बहुत शोक हुआ। अर्जुन तुरंत ही अपने मामा वसुदेव से मिलने के लिए द्वारका चल दिए। अर्जुन जब द्वारका पहुंचे तो वहां का दृश्य देखकर उन्हें बहुत शोक हुआ। श्रीकृष्ण की रानियां उन्हें देखकर रोने लगी। उन्हें रोता देखकर अर्जुन भी रोने लगे और श्रीकृष्ण को याद करने लगे। इसके बाद अर्जुन वसुदेवजी से मिले। अर्जुन को देखकर वसुदेवजी बिलख-बिलख रोने लगे। वसुदेवजी ने अर्जुन को श्रीकृष्ण का संदेश सुनाते हुए कहा कि द्वारका शीघ्र ही समुद्र में डूबने वाली है अत: तुम सभी नगरवासियों को अपने साथ ले जाओ।

वसुदेवजी की बात सुनकर अर्जुन ने दारुक से सभी मंत्रियों को बुलाने के लिए कहा। मंत्रियों के आते ही अर्जुन ने कहा कि मैं सभी नगरवासियों को यहां से इंद्रप्रस्थ ले जाऊंगा, क्योंकि शीघ्र ही इस नगर को समुद्र डूबा देगा। अर्जुन ने मंत्रियों से कहा कि आज से सातवे दिन सभी लोग इंद्रप्रस्थ के लिए प्रस्थान करेंगे इसलिए आप शीघ्र ही इसके लिए तैयारियां शुरू कर दें। सभी मंत्री तुरंत अर्जुन की आज्ञा के पालन में जुट गए। अर्जुन ने वह रात श्रीकृष्ण के महल में ही बिताई।

अगली सुबह श्रीकृष्ण के पिता वसुदेवजी ने प्राण त्याग दिए। अर्जुन ने विधि-विधान से उनका अंतिम संस्कार किया। वसुदेवजी की पत्नी देवकी, भद्रा, रोहिणी व मदिरा भी चिता पर बैठकर सती हो गईं। इसके बाद अर्जुन ने प्रभास तीर्थ में मारे गए समस्त यदुवंशियों का भी अंतिम संस्कार किया। सातवे दिन अर्जुन श्रीकृष्ण के परिजनों तथा सभी नगरवासियों को साथ लेकर इंद्रप्रस्थ की ओर चल दिए। उन सभी के जाते ही द्वारका नगरी समुद्र में डूब गई। ये दृश्य देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ।

जय श्री कृष्णा , जय द्वारकाधीश की
जय श्री हरि गोविंदा जय जगन्नाथ

परम वीर शक्तिशाली कौन है ???

परम वीर शक्तिशाली कौन है ???

विज्ञान कहता हैं कि एक नवयुवक स्वस्थ पुरुष यदि सम्भोग करता हैं तो, उस समय जितने परिमाण में वीर्य निर्गत होता है उसमें चालीस से नब्बे करोड़ शुक्राणु होतें हैं। यदि इन्हें स्थान मिलता, तो लगभग इतने ही संख्या में बच्चे जन्म ले लेते !
वीर्य निकलते ही ये अस्सी नब्बे करोड़ शुक्राणु पागलों की तरह गर्भाशय की ओर दौड़ पड़ते है…भागते भागते लगभग तीन सौ से पाँच सौ शुक्राणु पहुँच पाता हैं उस स्थान तक। बाकी सभी भागने के कारण थक जाते है बीमार पड़ जाते है और मर जातें हैं।
और यह जो जितने डिम्बाणु तक पहुंच पाया, उनमे सें केवल मात्र एक महाशक्तिशाली पराक्रमी वीर शुक्राणु ही डिम्बाणु को फर्टिलाइज करता है यानी कि अपना आसन ग्रहण करता हैं।
और यही परम वीर शक्तिशाली शुक्राणु ही आप हो, मैं हूँ , हम सब हैं !!
कभी सोचा है इस महान घमासान के विषय में ? इस महान युद्ध के विषय में ?
आप उस समय भाग रहे थे…तब जब आपकी आँखें नहीं थी । हाथ पैर सर दिमाग कुछ भी नही था…फिर भी आप विजय हुए थे !!
आप तब दौड़े थे जब आप के पास कोई सर्टिफिकेट नही था। किसी नामी दामी कॉलेज का नाम नही था।आप का कोई पहचान ही नही था,फिर भी आप जीत गए थे !!!
आप तब दौड़े थे,जब आप न हिन्दू थे न मुसलमान न भक्त न भगवान
फिर भी आप जीत गए !!
बिना किसी से मदद लिए बिना किसी के सहारे खुद अपने बलबूते पर विजय को प्राप्त हुए थे !
उस समय आप भागे थे दौड़े थे जब आप का एक निर्दिष्ट गन्तव्य स्थल था…उसी की ओर लक्ष्य था…आप का संकल्प बस उस तक पहुंचना था…थके बिना एकाग्र चित्त से आप भागे दौड़े और उद्देश्य पूरा किये,अस्सी नब्बे करोड़ शुक्राणुओं को आप ने हरा दिए थे ! हैं न ?
और आज देखो ?
थोड़ा बहुत भी तकलीफ या परेशानी आई, और आप घबरा जाते हैं…निराश हो जातें है…हाल छोड़ बैठ जातें हैं…
क्यो आप अपना उस आत्मविश्वास को गँवा बैठते हैं ??
अभी तो सब हैं आपवार भाई बहन सब हैं ! मेहनत करने के लिए हाथ पैर हैं ,
प्लानिंग के लिए दिमाग हैं बुद्धि हैं शिक्षा हैं…सहायता के लिए लोग हैं ! फिर भी आप निराश हो जीवन को नरक बना बैठे हैं !!
जब आप जीवन की प्रथम दिन प्रथम युद्ध नही हारे तो आज भी हार मत मानिये !
आप पहले भी जीतें थे…आज भी और कल भी जीतेंगे..

जयश्रीकृष्ण ☘️🌹🙏

साधो रे! ये मुर्दों का गाँव…

RSS वालों को शूट करने की बात हो
हम तुम्हें मंदिर में टाँग देंगे, जीवित जलाने के नारे हों
राम-लक्ष्मण-सीता के कार्टून में नग्न सीता हो
मुहर्रम पर कई शहरों में पत्थरबाजी हो
दिल्ली में भगवा झंडे देख कर मुसलमानों का हमला हो
स्टालिन द्वारा चंद्रचूड़ पर पोस्ट करने वाले की गिरफ़्तारी हो
बिहार में हो रही अनगिनत हत्याएँ हों
ताजिए के जुलूस में बच्ची का रेप हो

हम क्या बोलें? कितना बोलें? क्यों बोलें? बोल-बोल कर सारे शब्द समाप्त हो चुके हैं! क्या बोलें कि भाजपा चुप क्यों है? क्या बोलें कि इस पर लिबरलों ने फेवीकॉल पी लिया है? क्या बोलें कि अमित शाह जवाब दो? क्या बोलें कि इंडिया गठबंधन यही है तुम्हारे मुहब्बत की दुकान?

आक्रमण इतने अधिक और इतने सटीक होते जा रहे हैं कि हमारी संवेदना सूखती जा रही है। एक दल इस विश्वास में जी रहा है कि उसे हिन्दू वोट नहीं देंगे तो किसे देंगे, इसने सारे हिन्दुओं को अकेला छोड़ रखा है। लोगों में दूसरे विकल्प का भय दिखा कर अपने मूल मतदाताओं को मरने को छोड़ने वाले दल संभवतः नगण्य होंगे विश्व में।

हम संघियों को गोली मारने की बात पर क्यों उद्वेलित होएँ? संघ ने कभी कहा है कि आप उनके लिए बोलें? आप उनको कहने जाएँगे कि इसकी आलोचना तो कीजिए, तो कहा जाएगा कि यह संघ का काम नहीं है। आप इस पोस्टर के चक्कर में, आक्रोशित हो कर कुछ लिख देंगे और अगले दिन आपको ११ अगस्त तक न्यायिक हिरासत में रखा जाएगा।

हम और आप डिस्पोजेबल ग्लास हैं जो हवा के झोंके से उड़ कर किसी सड़क पर पहुँचेंगे और सामने से आती कार हमें कुचल कर निकल जाएगी। जिसने प्रयोग किया वह खुमारी में होगा और आप रीसायकल हो कर पुनर्जन्म के लिए देह खोज रहे होंगे।

आप जो बोलते हैं (यह तो मैं स्वयं से ही कह रहा हूँ) वह तोल कर बोलिए। यह पार्टी विचारधारा को त्याग चुकी है और यह आपके बच्चों, बच्चियों की बलि लेती रहेगी ताकि रैलियों में उसकी संख्या बताई जा सके।

स्वर तीव्र करना कार्यकर्ताओं का कार्य है, यदि आप वह नहीं हैं, तो ऐसे लिखिए जैसे कोई अवलोकन हो। प्रतिक्रिया, आक्रोश या वैचारिक विश्लेषण मत दीजिए। आपका कौन-सा शब्द पकड़ कर कौन सा नेता, किस राजनैतिक कारण से आपका सर माँगने लगेगा, आप समझ नहीं पाएँगे।

मनीष कश्यप NSA लगवा कर जेल में सड़ रहा है। उसका एक बना-बनाया चैनल था, कुछ लोगों को रोजगार मिला करता था। वह सब चला गया। सरकारें सर्वसमर्थ होती हैं, उसे कोई न्यायपालिका नहीं रोक सकती।

आप नग्न सीता माता को देख कर कुछ लिख देंगे, पर उन्हें चिंता नहीं होगी जिन्होंने राम के नाम पर सत्ता पाई है। एक कार्टून बनाने पर शार्ली एब्दो के बारह कार्टूनिस्ट मारे गए थे। बाद में सैमुअल पैटी मारा गया। हडीथ की बात कहने के बाद छः हिन्दू मार दिए गए। मारने वाले सदैव ही बच जाते हैं और हम एक घिसा-पिटा संवाद बोल देते हैं कि सरकार तुम्हारी है, पर सिस्टम हमारा है।

आप उसी नग्न सीता माता के कार्टून पर मुसलमानों के एक प्रतीक, एक व्यक्ति का नाम ले लीजिए, आप केवल जेल में नहीं होंगे बल्कि आपके पूरी कॉलोनी की कारें डीजे हल्ली के स्टाइल में जला दी जाएँगी और आपका घर कई वर्षों तक उस राज्य में नहीं होगा जहाँ आपका जीवन बीता है।

यह मेरा दुख नहीं है, मेरी पीड़ा नहीं है, कोई फ़्रस्ट्रेशन नहीं है। यह हमारी सामूहिक सच्चाई है। आपको हवा दे कर ये निकल लेंगे। उज्जैन के महाकाल कॉरीडोर ने उमेश कोल्हे को मरने से नहीं रोका, काशी कॉरीडोर ने कन्हैया लाल की हत्या नहीं रोकी, राम मंदिर ने सीता माता के नग्न कार्टून को नहीं रोका।

हम हिन्दू हैं, हम बहुसंख्यक हैं, हमारी सरकार है और हम न रामनवमी मना सकते हैं, न होली पर डीजे बजा सकते हैं, न दुर्गा विसर्जन कर सकते हैं, न शिवरात्रि मना सकते हैं, न काँवर यात्रा पर जा सकते हैं क्योंकि हर जगह मुसलमानों के पत्थर हैं जो किसी भी बात पर बरस जाते हैं।

हमारी बहनों के वीडियो हॉस्टलों में मुस्लिम लड़कियाँ बना रही हैं, उस पर कोई मानवता लज्जित नहीं होती, न कोई लोकतंत्र मरता है! अरे मरने का बाद भी चैन से सोने नहीं देते जब किसी श्रीकांत पासवान के शव को मुस्लिम आरोपित पीटता है, उस पर पेशाब करता है… कोई दलित चिंतक नहीं उठता, चर्चा तक नहीं होती!

हम लोड लिए फिर रहे हैं जैसे कि हम न लिखें तो मोदी को कोई वोट ही नहीं देगा! हम न बोलें तो भाजपा को डेढ़ सौ सीटें नहीं आएँगी। भाई! सत्ता का चरित्र है सत्ता में बने रहने की सतत चेष्टा। उसका इंधन मत बनिए। ऐसे नेताओं और पार्टियों के लिए मेरे-आपके जैसे हजार लोग बलि चढ़ जाएँगे और इनका प्रवक्ता सह कहता रहेगा कि वो तो हमारे ही समर्थन में लिखता था, लेकिन गाँधी पर अनुचित कहा तो देखिए हम उसे चौराहे पर टाँग देंगे!

सत्ता वह रंडी है जो नाम देख कर करवट और कमरे बदल लेती है। वह वैसा छलावा है जिसे आप प्रकट मान कर दौड़ते हैं और शीशे से टकरा कर रक्तरंजित होते हैं। सत्ता की प्रकृति है प्रयोग के बाद त्यागना। वीर बलिदानी कह कर स्मारक बनाने के लिए वह आपको अपने चुनावी रथ के पहियों के नीचे मरने को ढकेलती रहेगी।

मुझे समझ में नहीं आता कि वही शब्द, वही वाक्य, वही मुहावरे, वही अनुच्छेद, वही वीडियो कब तक बनाते रहेंगे यह पूछने के लिए हमारे देवी-देवताओं का अपमान इतना सहज क्यों है? हमारी बेटियों का बलात्कार और हत्या इतना सामान्य कैसे हो गया? सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि हम बहुसंख्यक हो कर भी इतने भयाक्रांत हैं क्यों हैं, जबकि सरकार हिन्दुत्ववादी है।

जय श्री राम! अपना जीवन बचाइए, आवेशित हो कर कुछ मत लिखिए। कल को जेल जाएँगे, कोई पूछने तक नहीं आएगा।

औडि़हार

पूर्वांचल में भेड़िया को हुणार कहा जाता है। हुणार शब्द की व्युत्पति हूण शब्द से हुआ है। हूण एक बर्बर जाति थी, जो कि बहुत लड़ाकू थे। वे जिस देश पर आक्रमण करते थे, उस देश का समूल विनाश करके छोड़ते थे। वे उस देश के बच्चों तक को भी जीवित नहीं छोड़ते थे। उन्हें भी मार देते थे। भेड़िया भी बच्चों को उठाकर ले जाते थे। इसलिए पूर्वांचल में भेड़िए हुणार कहे जाने लगे। माताएं रोते हुए बच्चों को चुप कराने के लिए कहा करतीं थीं, चुप हो जाओ, बरना हुणार आ जाएगा।

गाजीपुर जनपद में गाजीपुर बनारस हाइवे के समीप औड़िहार नगर स्थित है। यहीं स्कंद गुप्त ने हूणों का सामना किया था। जब वह हूणों से समर ले रहा था तब उसके पिता कुमार गुप्त मृत्यु शय्या पर थे। दुःखी मनःस्थिति में होते हुए भी स्कंदगुप्त ने हूणों से डटकर लोहा लिया था। वह युद्ध भूमि में जमीन पर सोता था। सेना राजा को अपने बीच पाकर एक नयी ऊर्जा से लवरेज थी। दो लाख की हूण सेना को गाजर मूली की तरह काटकर फेंक दिया था स्क॔दगुप्त की सेना ने। उसके पास चतुरंगिणी सेना थी।

हूण हार गये थे। इस जगह का नाम ”हूणहार” रखा गया, जो कालांतर में औड़िहार बना । हूण सेना के बचे खुचे लोगों में से कुछेक स्वदेश लौट गये थे अपनी पराजय की कहानी बताने के लिए। मरे हुए लोगों की कहानी सुनाने के लिए उनकी विधवाओं को। कुछेक यहीं बस गये थे। आज भी राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर हूण रहते हैं। ये अपना गोत्र हूण रखते हैं। ये हूण यहाँ की संस्कृति में रच बस गये हैं।

जीत के बाद स्कंदगुप्त ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी। उसने औड़िहार (हूणहार) के नजदीक स्थित सैदपुर भीतरी गाँव के पास एक विजय स्तम्भ बनवाया। उसने इस स्तम्भ पर अपनी विजय गाथा लिखवाई थी। सैदपुर भीतरी गाँव को अपने आराध्य देव को अर्पण किया था।

(मान्यताओं पर आधारित)

Dark Zone अंधकार क्षेत्र

अंधकार क्षेत्र

पाकिस्तान का शहर है एबटाबाद, राजधानी इस्लामाबाद से 56 किमी दूर, खूबसूरत और शांत इतना कि पाकिस्तानी सेना के ऑफिसर्स, सिविल सर्विसेस के ऑफिसर्स अपनी सेवानिवृत्ति के बाद इस्लामाबाद की जगह एबटाबाद में अपना आशियाना बनाते हैं, एबटाबाद में पाकिस्तानी सेना का ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकेडमी भी है। एबटाबाद को पाकिस्तान का देहरादून कह सकते हैं। ये वही शहर है जहाँ इस्लामी जिहाद का सबसे बड़ा आतंकी ओसामा बिन लादेन मारा गया था। ओसामा सऊदी अरब के एक बड़े रईस खानदान में पैदा हुआ था, ऊंची शिक्षा हासिल की और फिर आतंकी बन गया। बिन लादेन अपने आखिरी दिनों में पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के सहयोग से एबटाबाद में रहता था। तो फिर ऐसा कैसे हुआ कि आतंकी बिन लादेन को अमेरिकी एजेंसी सीआईए ने ढूंढ लिया और उसकी हत्या कर दी गई।

9/11 के हमले के बाद जब अमेरिकी एजेंसीज ने ओसामा को ढूंढना शुरू किया तो उसने लगातार अपने ठिकाने बदलने शुरू किए। बार बार बदलते ठिकाने अमेरिकी सेना से तो उसे बचाते रहे पर आगे के हमलों के लिए उसे तैयारी का वक्त नहीं मिलता था। उसी क्रम में ओसामा आईएसआई के संपर्क में आया और पाकिस्तानी एजेंसीज के सहयोग से अपना स्थायी ठिकाना एबटाबाद को बनाया। उसने एबटाबाद में अपने एक पाकिस्तानी सहयोगी के नाम से मकान बनवाया, दो मंज़िली इमारत जिसके दोनों तल पर 4-4 कमरे थे, तीसरी मंज़िल का निर्माण अवैध रूप से किया गया। संचार के साधन के नाम पर न कोई फोन कनैक्शन, न इंटरनेट और नहीं मोबाइल फोन। दुनिया की खबरों के लिए बस एक टीवी। जिस पर चौबीसों घंटे न्यूज़ चला करते थे। रोज़ सुबह 10 से 15 लीटर दूध, हफ्ते में गोश्त के लिए एक बकरा और स्थानीय बाज़ार से खाने पीने की वस्तुएं, जिसे उसके स्थानीय अनुयाई लाया करते थे। ओसामा का मकान एबटाबाद के सबसे पिछड़े इलाके में था, स्थानीय लोग भी इस बड़े घर के बारे में बात करने में कतराते, उन्हें लगता किसी बड़े अफसर का घर होगा और पूछने पर कुछ भी विशेष नहीं बता पाते, हाँ कुछ बच्चे जरूर ये बताते कि मकान में कुछ महिलाएं रहती हैं। निश्चित रूप से वहाँ रहने में ओसामा को पाकिस्तानी सेना और आईएसआई का खास सहयोग मिला था। ओसामा कम्युनिकेशन के लिए संदेशवाहक का सहारा लेता था जो आमतौर पर व्यक्तिगत रूप से संदेश को पहुंचाते, ओसामा के सहयोगियों के पास सुजुकी की ओमनी/ईको वैन थी और मोबाइल से बात चीत के दौरान वैन को शहर के इस कोने से उस कोने तक चलाया जाता था ताकि सेलफोन के एग्जेक्क्ट लोकेशन का पता नहीं लगाया जा सके।

ओसामा पाकिस्तान के लिए एक सोने की चिड़िया की तरह था, ओसामा की अथाह संपत्ति पाकिस्तानी सेना और आईएसआई एजेंट्स को लगातार मालामाल कर रही थी। किन्तु एबटाबाद में कुछ बरस रहने के बाद, ओसामा ने अपने सहयोगी आतंकी दलों को आत्मसमर्पण का फरमान सुना दिया, अफगानिस्तान, पाक अफगान सीमा की पहाड़ियों में उसके सहयोगियों द्वारा अमेरिकी सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया गया। ओसामा एक नई शुरुआत कर रहा था। नए सहयोगी, नए लड़ाके और नए मिशन।

ओसामा बड़े हमले की फिराक में था, उसके अगले शिकार होने वाले थे अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और अमेरिकी सेना के चीफ। ओसामा के सहयोगियों के आत्मसमर्पण के बाद उसकी आमदनी में भारी कमी आ गई थी। साथ ही बड़े हमले की तैयारी में बड़ी रकम खर्च होने वाली थी। ओसामा ने आईएसआई और पाकिस्तानी सेना को दी जाने वाली रकम कम कर दी, एक समय तो ऐसा भी आया जब ओसामा ने सेना और आईएसआई से अनुरोध किया कि कुछ समय के लिए वो पैसे लेने बंद कर दे। ओसामा ने कहा अल कायदा के विशेष मिशन को पूरा होते ही वो पाकिस्तानी सेना और आईएसआई की हर ख़्वाहिश पूरी कर देगा। पर पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के मुँह में खून लग चुका था, पाकिस्तानी सरकार, सेना और आईएसआई के ऑफिसर्स ने भ्रष्टाचार की हदों को फिर से पार कर लिया और अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए को बिन लादेन के बारे में इनपुट देने शुरू कर दिये और फिर सीआईए से अकूत धन लेना शुरू कर दिया।

बिन लादेन आईएसआई पर बहुत भरोसा करता था, हालाँकि सुरक्षा के उपायों में कभी कोई ढील नहीं दी गई थी। अभी भी संदेशवाहक से संदेश भेजे जाते थे। ओसामा के मकान तक किसी की भी पहुँच नहीं थी। दूध वाला भी दूध दरवाजे पर रख कर चला जाता जिसे बाद में घर मे रहने वाले महिलाओं द्वारा अंदर ले जाया जाता था। खान पान, रहन सहन इत्यादि में कोई परिवर्तन नहीं किया गया था। ऐसा कुछ भी नहीं किया जा रहा था जिससे ओसामा के बारे में किसी को कुछ पता चल सके। ओसामा ने पैसे देने बंद कर दिए। जैसे ही ओसामा से पैसे मिलने बंद हुए आईएसआई ने सीआईए को ओसामा के सबसे खास अबू अहमद अल कुवैती के बारे बता दिया।

आईएसआई को काफी दिनों तक दोनों तरफ से पैसे मिलने की उम्मीद थी और इसी लालच में आईएसआई द्वारा सीआईए को लगभग तीन सालों तक अधूरी जानकारी दी गई। पर ओसामा की आमदनी के स्रोत सीमित हो चले थे। अमेरिकी राष्ट्रपति की हत्या की साजिश में अल कायदा के काफी पैसे खर्च हो रहे थे, इसलिए ओसामा पाकिस्तानी एजेंसियों को पैसे देने से मना करता रहा। धीरे धीरे आईएसआई को यकीन हो गया की ओसामा से अब कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। फिर आईएसआई ने ओसामा के खास सहयोगी अल कुवैती द्वारा अल कायदा को किए गए कॉल को इंटरसेप्ट कर सीआईए को दे दिये। अब सीआईए पूरी तरह आश्वस्त हो चला था की ओसामा बिन लादेन सचमुच में एबटाबाद में रह रहा है। लेकिन जब तक सीआईए ओसामा के ठिकाने के बारे में पुख्ता जानकारी हासिल नहीं कर लेती तब तक अमेरिका का कोई भी कदम खतरे से खाली नहीं था।

सीआईए ने सैटेलाइट से निगरानी शुरू की, ड्रोन भेजे, तस्वीरे ली, जियो ट्रैकिंग का सहारा लिया और उस मकान तक पहुंचने के बाद सघन जांच शुरू की। एबटाबाद का वो मकान एक डार्क ज़ोन था। उस इलाके में वो एकलौता ऐसा घर था जहाँ पर कोई इलेक्ट्रोनिक सिग्नल नहीं आ जा रहे थे सिवाय टेलीविज़न के। सीआईए ने वहाँ के स्थानीय लोगों को निगरानी के लिए खरीदना शुरू किया। तकरीबन 3-4 महीने तक की रेकी की बाद अमेरिकी सेना का विशेष दल यह सुनिश्चित कर पाया कि उस मकान में कुछ तो था, कुछ ऐसा जिससे पूरे विश्व को खतरा था। अंत में अमेरिकी सेना ने पाकिस्तानी सेना और आईएसआई को एक बड़ी कीमत चुकाई। कीमत बिलियन डॉलर्स में थी। पाकिस्तानी सेना और आईएसआई कुछ दिनों के लिए स्लीप मोड में चली गई। अमेरिकी सील कमांडोज़ की टूकड़ी को ऑपरेशन का जिम्मा दिया गया और फिर जो हुआ उसका गवाह पूरा विश्व बना।

समान नागरिक सहिता

🛑यूनिफॉर्म सिविल कोड🛑

यूनिफॉर्म सिविल कोड का संबंध सिविल मामलों में कानून की एकरूपता से है। देश के हर व्यक्ति के लिए सिविल मामलों में एक समान कानून यूनिफॉर्म सिविल कोड की मूल भावना है। इसमें धर्म, संप्रदाय, जेंडर के आधार पर भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं होती है। इस कोड के तहत देश के सभी नागरिकों पर विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, पैतृक संपत्तियों में हिस्सा, गोद लेने जैसे मसलों के लिए एक ही कानून होते हैं। समान नागरिक संहिता होने पर धर्म के आधार पर कोई छूट नहीं मिलती।

भारत में फिलहाल धर्म के आधार पर इन मसलों पर अलग अलग कानून हैं। हिंदुओं, मुस्लिमों और ईसाइयों के लिए भारत में संपत्ति, विवाह और तलाक के कानून अलग अलग हैं। अलग अलग धर्मों के लोग अपने पर्सनल लॉ का पालन करते हैं। मुस्लिम, ईसाई और पारसियों का अपना अपना पर्सनल लॉ है। हिंदू सिविल लॉ के तहत हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं।

👉यूनिफॉर्म सिविल कोड पर क्या कहता है संविधान…

संविधान के भाग चार में यूनिफॉर्म सिविल कोड का जिक्र किया गया है। संविधान के भाग 4 में अनु्छेद 36 से लेकर 51 तक राज्य के नीति निर्देशक तत्व (Directive Principal of State Policy) को शामिल किया गया है। इसी हिस्से के अनुच्छेद 44 में नागरिकों के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड का प्रावधान है। इसमें कहा गया है “राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।”

अब सवाल उठता है कि जब संविधान में इसका जिक्र है ही, तो आजादी के बाद इस पर कोई कानून क्यों नहीं बना। दरअसल संविधान के भाग 3 में देश के हर नागरिक के लिए मूल अधिकार की व्यवस्था की गई है, जिसे लागू करना सरकार के लिए बाध्यकारी हैं।

वहीं संविधान के भाग 4 में जिन नीति निर्देशक तत्वों का जिक्र किया गया है, उसे लागू करना सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं है। दरअसल इस हिस्से में शामिल प्रावधान लोकतंत्र के आदर्श हैं, जिसे हासिल करने की दिशा में हर सरकार को बढ़ना चाहिए। बाध्यकारी नहीं होने की वजह से ही देश में अब तक यूनिफॉर्म सिविल कोड नहीं बन पाया है।

👉संविधान सभा में भी हुई थी चर्चा…

संविधान सभा में इस पर व्यापक बहस हुई थी। कुछ सदस्य इसे मूल अधिकार में रखने के पक्ष में भी थे। संविधान सभा में 23 नवंबर, 1948 को इस पर विस्तार से बहस हुई। मोहम्मद इस्माइल, नज़ीरुद्दीन अहमद, महबूब अली बेग साहिब बहादुर, हुसैन इमाम ने समान नागरिक संहिता से जुड़े अनुच्छेद में संशोधन का प्रस्ताव पेश किया।

इन लोगों का कहना था कि सिविल मामलों में हर शख्स को अपने धर्म के मुताबिक आचरण करने की छूट होनी चाहिए। किसी भी वर्ग या समुदाय के लोगों को अपना निजी कानून छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। केएम मुंशी और अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर ने समान संहिता के पक्ष में दलील दी थी।

संविधान निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले डॉ. बीआर आंबेडकर भी समान नागरिक संहिता के समर्थन में थे। आंबेडकर का तर्क था कि देश में महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने के लिहाज से धार्मिक आधार पर बने नियमों में सुधार बेहद जरूरी है। आजाद भारत में महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता के लिए आंबेडकर ने समान नागरिक संहिता को बेहद जरूरी बताया था। बाद में इसे नीति निर्देशक तत्त्व के अन्दर शामिल कर उस वक्त राज्य को हर कीमत पर लागू करने की संवैधानिक बाध्यता से बचा लिया गया।

👉हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख के लिए बने कानून…

मुस्लिम नेताओं के भारी विरोध के कारण देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू समान नागरिक संहिता पर आगे नहीं बढ़े। हालांकि 1954-55 में भारी विरोध के बावजूद हिंदू कोड बिल लेकर आए। हिंदू विवाह कानून 1955, हिंदू उत्तराधिकार कानून 1956, हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण पोषण कानून 1956 और हिंदू अवयस्कता और संरक्षकता कानून 1956 लागू हुए। इससे हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख समुदायों के लिए शादी, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने जैसे नियम संसद में बने कानून से तय होने लगे। लेकिन मुस्लिम, ईसाई और पारसियों को अपने अपने धार्मिक कानून के हिसाब से शादी, तलाक, उत्तराधिकार जैसे मुद्दे को तय करने की छूट बरकरार रही।

👉यूनिफॉर्म सिविल कोड के पक्ष में तर्क…

इस कोड के पक्षधर लोगों का कहना है कि संविधान की प्रस्तावना में शामिल समानता और बंधुत्व का आदर्श तभी पाया जा सकता है, जब देश में हर नागरिक के लिए एक समान नागरिक संहिता हो। 42वें संविधान संशोधन के जरिए भारतीय संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़ा गया। इसके तहत सरकार किसी भी धर्म का समर्थन नहीं करेगी।

कोड के पक्ष में दलील दी जाती है कि धार्मिक आधार पर पर्सनल लॉ होने की वजह से संविधान के पंथनिरपेक्ष की भावना का उल्लंघन होता है। संहिता के हिमायती यह मानते हैं कि हर नागरिक को अनुच्छेद 14 के तहत कानून के समक्ष समानता का अधिकार, अनुच्छेद 15 में धर्म, जाति, लिंग के आधार पर भेदभाव की मनाही और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और निजता के संरक्षण का अधिकार मिला हुआ है।

उनकी दलील है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड के अभाव में महिलाओं के मूल अधिकार का हनन हो रहा है। शादी, तलाक, उत्तराधिकार जैसे मुद्दों पर एक समान कानून नहीं होने से महिलाओं के प्रति भेदभाव हो रहा है। इन लोगों का तर्क है कि लैंगिक समानता और सामाजिक समानता के लिए समान नागरिक संहिता होनी ही चाहिए।

पक्ष में तर्क देने वाले लोगों का कहना है कि मुस्लिम समाज में महिलाएं धर्म के आधार पर चल रहे पर्सनल लॉ की वजह से हिंसा और भेदभाव का शिकार हो रही है। इन महिलाओं को बहुविवाह और हलाला जैसी प्रथाओं का दंश झेलना पड़ रहा है।

👉यूनिफॉर्म सिविल कोड के विरोध में तर्क…

अल्पसंख्यक समुदाय के लोग यूनिफॉर्म सिविल कोड का खुलकर विरोध करते आए हैं। आजादी के बाद से ही मुस्लिम समाज इसे उनके निजी जीवन में दखल का मुद्दा मानता रहा है। विरोध में तर्क देने वाले लोगों का कहना है कि संविधान के मौलिक अधिकार के तहत अनुच्छेद 25 से 28 के बीच हर शख्स को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार मिला हुआ है। इसलिए हर धर्म के लोगों पर एक समान पर्सनल लॉ थोपना संविधान के साथ खिलवाड़ करना है।

मुस्लिम इसे उनके धार्मिक मामलों में दखल मानते हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) हमेशा से यूनिफॉर्म सिविल कोड को असंवैधानिक और अल्पसंख्यक विरोधी बताता रहा है। ये बोर्ड दलील देता है कि संविधान हर नागरिक को अपने धर्म के मुताबिक जीने की अनुमति देता है। इसी अधिकार की वजह से अल्पसंख्यकों और आदिवासी वर्गों को अपने रीति रिवाज, आस्था और परंपरा के मुताबिक अलग पर्सनल लॉ के पालन करने की छूट है।

बोर्ड का तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद 371 (A-J) में देश के आदिवासियों को अपनी संस्कृति के संरक्षण का अधिकार हासिल है। अगर हर किसी के लिए समान कानून लागू किया जाएगा तो देश के अल्पसंख्यक समुदाय और आदिवासियों की संस्कृति पर असर पड़ेगा।

👉आम सहमति बनाने की है जरूरत..

समान नागरिक संहिता के रास्ते में वोट बैंक की राजनीति एक बड़ी बाधा रही है। भारत में इस पर आम सहमति बनाने की जरूरत है। मुस्लिम वोट बैंक के नुकसान के डर से शुरू से कांग्रेस कभी खुलकर इसके पक्ष में नहीं बोलती है। कांग्रेस का कहना है कि सिर्फ राजनीतिक फायदे और ध्रुर्वीकरण के लिए बीजेपी इसे मुद्दा बनाती रही है। कांग्रेस आरोप लगाती रही है कि जब जब चुनाव का वक्त आता है, बीजेपी इस मुद्दे को हवा देती है।

कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि राजनीतिक हथकंडा बनाने की बजाय केंद्र सरकार को इस पर गंभीरता से सहमति बनाने की कोशिश करनी चाहिए। देश में इसे लागू करने के लिए संविधान में संशोधन की जरूरत होगी। बीजेपी को संसद से इसे कानून बनाने के रास्ते में आने वाली अड़चनों का अहसास है। वो चाहती है कि धीरे धीरे इस मसले पर लोग आगे आएं और इस पर बहस करें। उसके बाद ही संसद में पूरे देश के लिए एक समान नागरिक संहिता बनाने की पहल की जाए।

जिस तरह से बीते कुछ महीनों में बीजेपी विधानसभा चुनावों में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठा रही है, उससे देश के एक बड़े वर्ग को लगता है कि 2024 के लोक सभा चुनाव से पहले भारत में समान नागरिक संहिता लागू होने का रास्ता खुल सकता है।

साभार: सी एम जैन

अब तो ये स्पष्ट है… राजीव गान्धी भ्रष्ट है

वो भी क्या ज़माना था।

क्या जलवा था…

क्या जलाल था…

ऐसा नही है कि कांग्रेस की जो दुर्दशा आज है वो पहले भी थी। 1984 में एक वो भी जमाना था जब लोकसभा में इनकी 404 सीटें हुआ करती थीं। वो दीगर बात है कि राजीव गांधी ने वो चुनाव इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर पे सवार हो के लड़ा था और समूचे विपक्ष का सफाया कर 404 सीट जीत ली थी। ऐसी प्रचंड लहर थी कि एक अकेले चरण सिंह के अलावा विपक्ष का कोई नेता नही जीता था।

ऐसे प्रचंड बहुमत पे सवार हो राजीव गांधी भारत के प्रधान मंत्री बने थे। पर इतने अनाड़ी निकले की सिर्फ 3 साल के भीतर सारा कुनबा बिखर गया और सारी लहर भित्तर घुस गई। खुद उनके ही वित्त मंत्री राजा मांडा वी पी सिंह ने उनके भ्रष्टाचार के खिलाफ विद्रोह कर दिया। बोफोर्स घोटाला अपने चरम पे था… वी पी सिंह देश भर घूम घूम के रैली कर रहे थे।

गली गली में नारा लगता था

अब तो ये स्पष्ट है… राजीव गान्ही भ्रष्ट है…

देश मे ऐसा माहौल था कि राजीव गांधी को सरकार में एक एक दिन काटना मुश्किल हो रहा था।

1989 के चुनाव सिर पे थे। ऐसे में कांग्रेस ने एक चाल चली।

वी पी सिंह अपने सार्वजनिक जीवन मे बेहद ईमानदार आदमी थे ये सारी दुनिया आज तक मानती है। सारी जिंदगी राजनीति में रहे, सर्वोच्च पदों पे रहे, पर कभी कोई दाग नही लगा।

ऐसे में राजीव गांधी की सरकार ने वी पी सिंह के लड़के अजेय सिंह पे भ्रष्टाचार का एक फ़र्ज़ी केस खड़ा किया। PVNR बोले तो पी वी नरसिम्हा राव उस समय विदेश मंत्री थे। उन्होंने अपने गुर्गे तांत्रिक चंद्रा स्वामी की मदद से।

कैरेबियन द्वीप सेंट किट्स, जो कि एक टैक्स हैवन है, वहां अजेय सिंह के नाम से एक फ़र्ज़ी खाता खुलवाया और उसका लाभार्थी, वी पी सिंह को बनाया गया।

उस खाते के कागजात ले लिए गए। फिर उनकी एक फ़र्ज़ी बैंक स्टेटमेंट बना के उसमे 21 मिलियन US डॉलर की राशि जमा दिखाई गई। फिर उन फ़र्ज़ी कागज़ात को विदेश मंत्रालय और PMO के बड़े अधिकारियों ने न्यूयॉर्क और त्रिनिदाद टोबैगो स्थित दूतावास में पदस्थ राजदूतों और अन्य अधिकारियों पे जबरदस्ती अनर्गल दबाव बना के प्रमाणित करवाया गया।

जब सारी तैयारी पूरी हो गयी और 1989 लोकसभा चुनाव में सिर्फ 3 महीने बाकी थे तो खबर अंतराष्ट्रीय मीडिया में लीक कर दी गयी। सबसे पहले समाचार कुवैत टाइम्स और टर्की के अखबार गोल्ज़ एडम ने छापा, जिसे तुरंत हिंदुस्तान टाइम्स और टेलीग्राफ ने लपक लिया।

कांग्रेसीयो ने बाकायदा मामला संसद में उठाया। खूब बहस हुई।

तय हुआ कि मामले के दस्तावेज संसद के पटल पे रखे जाएं। जब किसी मामले के कागज़ात संसद की पटल पे रख दिये जाते हैं तो दावे को मजबूती मिलती है। आम चुनाव में सिर्फ 5 हफ्ते बचे थे।

कांग्रेस लीडरशिप ने तय किया कि कागज़ संसद पटल पे रखे जाएं। परंतु प्रवर्तन निदेशालय और वित्त सचिव ने इसका विरोध किया क्योंकि वो जानते थे कि पूरा मामला फ़र्ज़ी है, सारे कागज़ फ़र्ज़ी हैं और पूरा मामला सिर्फ और सिर्फ वी पी सिंह को बदनाम करने के लिए खड़ा किया गया है।

इस के बावजूद राजीव गांधी सरकार नही मानी और अंततः वो फ़र्ज़ी कागज़ात ही संसद के पटल पे रख दिये गए। इस तरह मिस्टर क्लीन राजीव गांधी की सरकार ने संसद और देश को गुमराह किया। पूरे देश मे इसकी खूब चर्चा रही। गोदी मीडिया ने खूब कीचड़ उछाला पर वी पी सिंह की छवि इतनी उजली थी कि एक भी आरोप नही चिपका…

चुनाव हुए और मिस्टर क्लीन की पार्टी धराशायी हो गयी।

जो 1984 में 404 सीट पे थे वो 1989 में 197 सीट पे आ गए।

वो दिन और आज का दिन, कांग्रेस निरंतर ढलान पे है और 404 से वर्तमान में 44 पे आ चुकी है।

1984 से ले के आज 2017 तक, 404 से 44 तक के इस सफर में कांग्रेस ने क्या सीखा?

कांग्रेस आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी है। UPA के शासन काल में उसपे 12 लाख करोड़ से ऊपर के घोटालों के आरोप हैं।

पूरे देश मे उसकी चुनावी दुर्गति हुई है… फिर भी कांग्रेस ने क्या सीखा?

आज भी वो चुनाव में वापसी करने के लिए वही पुराने हथकंडे अपना रही है।

पहले वी पी सिंह के पुत्र अजेय सिंह थे, अब अमित शाह के बेटे जय शाह हैं।

आरोप तब भी फ़र्ज़ी थे आज भी फ़र्ज़ी हैं।

कांग्रेस लीडरशिप ने इतिहास से कुछ नही सीखा।

कांग्रेस 44 से 4 की तरफ गिर रही है।

देखते जाइये।

राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी मुकदमा जिसने इतिहास का रुख मोड़ दिया…

राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी मुकदमा जिसने इतिहास का रुख मोड़ दिया…

46 साल गुजर चुके हैं। पर यह भूलने वाला मुकदमा नहीं है। 12 जून 1975 को इस मुकदमें के फैसले ने देश में भूचाल ला दिया था। बाद का घटनाक्रम, 19 महीने की इमरजेंसी, उसकी सीख-सबक सब देश के इतिहास का अहम हिस्सा हैं। मुकदमा था… राज नारायण बनाम इंदिरा नेहरू गांधी आदि।

यह मुकदमा क्यों दायर हुआ?

1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिराजी की अगुवाई में कांग्रेस (आर) ने 352 सीटें हासिल करके जबरदस्त जीत दर्ज की थी। अपनी परम्परागत रायबरेली सीट से खुद इंदिराजी बड़े अंतर से जीतीं थीं। उनके प्रतिद्वंदी थे विपक्षी महागठबंधन के प्रत्याशी दिग्गज समाजवादी नेता राज नारायण। 7 मार्च 1971 को मतदान हुआ। 9 मार्च से मतगणना शुरू हुई। 10 मार्च को घोषित नतीजे के अनुसार इंदिरा गांधी को 1,83,309 और राजनारायण को 71,499 वोट मिले।

राजनारायण इस पराजय को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। उन्होंने अधिवक्ता रमेश चंद्र श्रीवास्तव के जरिये इलाहाबाद हाईकोर्ट में इंदिरा गांधी का निर्वाचन रद्द करने के लिए नियत अवधि की आखिरी तारीख 24 अप्रैल 1971 को चुनाव याचिका अतिरिक्त रजिस्ट्रार के समक्ष प्रस्तुत की। जस्टिस ब्रूम के समक्ष इसे सूचीबद्ध किया गया। याचिका में इंदिरा गांधी को पहला और निर्दलीय उम्मीदवार स्वामी अद्वैतानंद को दूसरा प्रतिवादी बनाया गया था। 1974 में यह याचिका जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा की बेंच में आयी। तभी से इसकी सुनवाई में गति आई। शुरुआत में मुख्य आरोप मतपत्रों में अदृश्य रसायन के प्रयोग का था। भ्रष्ट आचरण के आरोप सहायक मुद्दों के तौर पर दर्ज थे। बाद मे राजनारायण ने शांतिभूषण को अपना एडवोकेट नियुक्त किया। शांतिभूषण ने इस शर्त पर अपनी स्वीकृति दी कि मुकदमा प्रचार के लिए नहीं बल्कि गम्भीरता से लड़ा जाएगा। उन्होंने भ्रष्ट आचरण के आरोपों को इतना विकसित किया कि वे निर्णय के केंद्र में आ गए।

अदालत के सामने प्रमुख सवाल थे; क्या इन्दिरा गांधी ने यशपाल कपूर की तब सेवाएं ली थीं जब वह राजपत्रित अधिकारी थे? यशपाल कपूर 14 जनवरी 1971 या उसके बाद कब तक भारत सरकार की सेवा में रहे? कपूर के अनुसार उन्होंने 13 जनवरी 1971 को इस्तीफा दे दिया था। प्रधानमंत्री के तत्कालीन प्रधान सचिव पी.एन. हक्सर ने उसी समय मौखिक स्वीकृति दे दी थी। अभिलेखीय साक्ष्यों के अनुसार राष्ट्रपति ने 25 जनवरी 1971 को इस्तीफे को पूर्वगामी तिथि 14 जनवरी से स्वीकार किया था। अदालत को पूर्वगामी तिथि से इस्तीफे की स्वीकार्यता की वैधता का बिंदु भी निर्णीत करना था।

क्या इंदिरा गांधी 1 फरवरी 1971 के पूर्व स्वयं को रायबरेली से उम्मीदवार के तौर पर प्रस्तुत कर रहीं थीं? अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने 29 जनवरी 1971 को उनकी उम्मीदवारी को मंजूरी दी। राजनारायण के अनुसार 29 दिसम्बर 1970 को लोकसभा भंग होने के साथ ही इंदिरा गांधी खुद को उम्मीदवार के तौर पर प्रस्तुत कर रहीं थीं। इस बिंदु का आधार जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 का वह प्रावधान था, जिसके अनुसार एक व्यक्ति तभी उम्मीदवार बन जाता है, जब सामाजिक तौर पर स्वयं को इस रूप में प्रस्तुत करने लगता है।

प्रधानमंत्री की सभाओं के लिए मंच निर्माण, शामियाने, बिजली, माइक्रोफोन की व्यवस्था, सशस्त्र बलों का प्रयोग और इनके जरिए चुनाव प्रचार को प्रभावी बनाने का मुद्दा भी अदालत के सामने विचाराधीन था। निर्दलीय प्रत्याशी स्वामी अद्वैतानंद को आर्थिक मदद, मतदाताओं को रजाई, कम्बल, धोती, शराब वितरण और तय सीमा पैंतीस हजार रुपये से अधिक खर्च करने के भी सवाल याचिका में उठाये गए थे।

मुकदमें के फैसले के बाद ही नहीं उसकी सुनवाई के दौरान भी जबरदस्त सरगर्मी थी। इस मुकदमे के साथ मशहूर हो गए एडवोकेट शांति भूषण ने अपनी किताब ‘कोर्टिंग डेस्टिनी’ में लिखा है, ‘मैंने बहस शुरू की तो मुझे लगा कि जस्टिस सिन्हा मुकदमें को कोई खास महत्व नहीं दे रहे हैं लेकिन तीसरे दिन से जब वह नोट्स लेने लगे, तब मुझे आभास हुआ कि वह इसे गम्भीरता से ले रहे हैं’। इंदिराजी के वकीलों की टीम की अगुवाई वरिष्ठ एडवोकेट सतीश चंद्र खरे ने की थी। दोनों ओर से तैंतीस दिनों तक दलीलें पेश की गईं थीं। मुकदमे में एक अहम तारीख 17 मार्च 1975 थी जब देश का कोई प्रधानमंत्री गवाह के तौर पर पहली बार अदालत के कटघरे में पेश हुआ। जस्टिस सिन्हा ने उस दिन कोर्ट परिसर में पुलिस के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी थी। उन दिनों वकालत कर रहे और बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज बने जस्टिस आर.बी. मेहरोत्रा ने याद किया कि वकीलों ने मानव श्रंखला बनाकर प्रधानमंत्री की सुरक्षा सुनिश्चित की थी। रजिस्ट्रार को सख्त निर्देश था कि गवाह के तौर पर प्रधानमंत्री के अदालत में पहुँचने पर कोई खड़ा नहीं होगा। हालांकि इंदिराजी के लिए कुर्सी लगाई गई थी। इंदिराजी के पहुँचने पर उनके एडवोकेट सतीश चंद्र खरे अपनी कुर्सी से थोड़ा सा उठते

नजर आए थे। इंदिराजी की गवाही पांच घंटों तक चली। शांतिभूषण ने उनसे जिरह की थी। जबाब में अपने पक्ष को लेकर इंदिराजी दृढ़ रहीं। राजीव गांधी और सोनिया गांधी दिल्ली से उनके साथ आये थे लेकिन उन्होंने इंदिराजी के अदालत में रहने के दौरान अपना समय पारिवारिक घर आनंद भवन में बिताया था।

यह सामान्य चुनाव याचिका नहीं थी। फैसले से सीधे प्रधानमंत्री की कुर्सी जुड़ी हुई थी। विपक्ष सिर्फ अदालत में सत्ता से नहीं लड़ रहा था। सड़कों पर भी उसकी सरकार से तेज लड़ाई चल रही थी। गुजरात के छात्र आंदोलन और बिहार की गफूर सरकार की बर्खास्तगी की मांग से बढ़ते सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन की तपिश दिल्ली को परेशान कर रही थी। अगुवाई लोकनायक जयप्रकाश नारायण कर रहे थे। उनकी नैतिक सत्ता ने सरकार को बेचैन कर रखा था। शांति भूषण ने अपनी किताब में दावा किया है कि जस्टिस सिन्हा को अनुकूल निर्णय देने के लिए सुप्रीमकोर्ट की जस्टिसशिप का प्रलोभन दिया गया। उन्होंने लिखा, ‘सिन्हा गोल्फ़ खेलने के शौकीन थे। एक बार खेल के बीच उन्होंने बताया था कि जब मुकदमें की सुनवाई चरम पर थी तब चीफ जस्टिस डी एस माथुर सपत्नीक उनके घर आये। यह पहला मौका था जब वह उनके घर आये। जस्टिस माथुर इंदिराजी के पारिवारिक डॉक्टर के.पी. माथुर के निकट संबंधी थे। स्त्रोत न पूछे जाने की शर्त पर उन्होंने बताया कि उनसे कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के लिए उनके(सिन्हा के) नाम पर विचार हो रहा है। फैसला होते ही उन्हें वहां भेज दिया जाएगा’। दिलचस्प यह है कि इन्हीं जस्टिस माथुर को जनता पार्टी की सरकार के समय गृहमंत्री चरण सिंह ने एक महत्वपूर्ण जांच आयोग की अगुवाई सौंप दी थी। शांतिभूषण ने जस्टिस सिन्हा को पत्र लिख कर पूछा था कि क्या गोल्फ के दौरान जस्टिस माथुर के संबंध में कही बातों की वह पुष्टि कर सकते हैं? जस्टिस सिन्हा के उत्तर को शांतिभूषण ने चरण सिंह को भेज दिया था। चरण सिंह ने इस पत्र पर जस्टिस माथुर की टिप्पणी मांगी थी। जस्टिस माथुर ने तुरंत ही जांच आयोग से इस्तीफा दे दिया था।

शांतिभूषण की तरह ही उनके पुत्र प्रशांत भूषण ने भी जस्टिस सिन्हा को दबाव में लेने की कोशिशों का जिक्र किया है। प्रशांत भूषण की किताब, ‘द केस दैट शुक इंडिया’ के अनुसार छुट्टियों के एकांत में जस्टिस सिन्हा घर पर फैसला लिखाना चाहते थे। लेकिन तब रोज ही शाम को इलाहाबाद के एक सांसद उनके घर पहुँचने लगे। बाद में सिन्हा को उन्हें मना करना पड़ा। वे तब भी नहीं माने तो जस्टिस सिन्हा ने पड़ोसी जस्टिस पारिख की सहायता ली। उस दौरान उन्होंने घर के बरामदे में भी आना बंद कर दिया और आने वाले लोगों को बताया गया कि जस्टिस सिन्हा अपने भाई के यहाँ उज्जैन गए हुए हैं। फैसले के कुछ महीनों बाद मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर भी जस्टिस सिन्हा से मिले थे। सांसद के जरिये उन्हें अनुकूल करने की कोशिश का जिक्र जस्टिस सिन्हा ने उनसे भी किया था। प्रशांत भूषण ने लिखा है कि जस्टिस सिन्हा पर जुलाई तक फैसला टालने का दबाव चीफ जस्टिस डी. एस. माथुर के जरिये डाला गया। जस्टिस माथुर ने देहरादून से उन्हें फोन करके ऐसा करने के लिए कहा। उस समय तक जस्टिस सिन्हा फैसला लिखा चुके थे। नाराज सिन्हा उसी समय हाईकोर्ट पहुँचे और रजिस्ट्रार को बुलाकर फैसले की तारीख 12 जून निश्चित करने के निर्देश दिए। फैसले की गोपनीयता बनाये रखने की बड़ी चुनौती थी। गुप्तचर विभाग फैसले की गंध लेने की कोशिश में था। जस्टिस सिन्हा ने अपने सचिव मन्ना लाल को कसम दिलाई। स्टेनोग्राफर को छुट्टी पर भेज दिया और फैसले के प्रभावी अंश खुद लिखे।

12 जून 1975 को जस्टिस सिन्हा सुबह 9.55 पर अदालत में पहुँचे। चैंबर खचाखच भरा था। निर्देश दिया गया कि फैसला सुनाए जाने के दौरान अथवा बाद में ताली आदि न बजाई जाए। लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं हुआ। 258 पेज के फैसले में इंदिराजी का रायबरेली से निर्वाचन दो बिंदुओं पर अवैध और शून्य घोषित किया गया। सरकारी सेवा में रहते हुए चुनाव में यशपाल कपूर की सेवाओं को प्राप्त करने का आरोप सही पाया गया। मंच, माइक्रोफोन, शामियाने आदि की सरकारी खर्च से व्यवस्था के कारण भी उन्हें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 (7) के अधीन चुनावी कदाचरण का दोषी पाया गया। अगले छह साल के लिए किसी संवैधानिक पद के लिए उन्हें अयोग्य करार दिया गया। तब टीवी और इंटरनेट का जमाना नहीं था। पत्रकार और खुफिया विभाग के लोग टेलीफोन की ओर भागे। राजनारायण के वकील जश्न के माहौल में समर्थकों से घिरे थे। दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास पर फैसले को लेकर फिक्र साफ महसूस की जा रही थी। टेलीप्रिंटर पर निगाह गड़ी हुई थी। समाचार एजेंसी यूएनआई की खबर फ्लैश होते ही इंदिराजी को इसकी सूचना दी गई। इधर हाईकोर्ट में इंदिराजी के वकील जस्टिस सिन्हा के रिटायरिंग रूम में सुप्रीम कोर्ट में अपील तक फैसले पर स्टे की गुजारिश कर रहे थे। जस्टिस सिन्हा ने कहा कि इसके लिए उन्हें दूसरे पक्ष को

सुनने का अवसर देना होगा।

राजनारायण के वकीलों के पहुँचने तक जस्टिस सिन्हा अपने फैसले का क्रियान्वयन 20 दिन के लिए स्थगित कर चुके थे। राजनारायण के वकीलों ने इस पर एतराज किया। निवेदन किया कि अवकाश में अदालत केवल फैसला सुनाने के लिए बैठी थी। उसे स्टे जारी करने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार केवल अवकाशकालीन पीठ को है। जस्टिस सिन्हा ने ‘अब दूसरी गलती नहीं’ की टिप्पणी के साथ स्टे ऑर्डर रद्द करने से इनकार कर दिया। इस फैसले के अलावा भी 12 जून 1975 की तारीख इंदिराजी के लिए दुःख और चिंताएं बढ़ाने वाली थी। उनके भरोसेमंद सलाहकार डीपी धर की उसी दिन दुःखद मृत्यु हो गई। उधर इसी दिन उस दौर के आंदोलन के शुरुआती केंद्र गुजरात से विधानसभा चुनाव में विपक्ष का जनता मोर्चा अपनी जीत दर्ज कर रहा था।

इलाहाबाद की अदालत के इस फैसले की गूंज अब देश के कोने कोने में थी। फैसले पर 20 दिन का विराम था लेकिन विपक्षी इंदिराजी का फौरन इस्तीफा चाहते थे। अदालती लड़ाई का एक चरण पूरा हो चुका था लेकिन असली संघर्ष सड़कों पर शुरू हो चुका था। जबाब में इंदिराजी के समर्थक भी खुलकर मैदान में थे और उन पर किसी भी हाल में इस्तीफा न देने का दबाव बनाए हुए थे। कुछ ऐसा बड़ा, जो इस देश के इतिहास में कभी नहीं हुआ था, की आहट महसूस की जा रही थी। 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी.कृष्णा अय्यर की अवकाशकालीन एकलपीठ ने हाईकोर्ट के 12 जून के आदेश के क्रियान्वयन पर सशर्त रोक लगा दी। इस आदेश के तहत इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री पद सुरक्षित हुआ। वह संसद में बैठ सकती थीं लेकिन उन्हें सांसद के तौर पर सदन में वोट देने का अधिकार नहीं था। अगले ही दिन 25 जून को इंदिराजी ने आंतरिक आपातकाल की घोषणा कर दी। विपक्षियों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों के साथ ही नागरिकों को उनके मूल अधिकारों से वंचित कर दिया गया। उस सबकी एक अलग गाथा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए संविधान में 39 वां संशोधन किया गया जिसके तहत राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के निर्वाचन को अदालती चुनौती से बाहर कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट में संविधान का यह संशोधन तो नहीं टिक पाया लेकिन जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में पूर्वगामी प्रभाव से किये गए संशोधनों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ इंदिराजी की अपील स्वीकार किये जाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। 7 नवम्बर 1975 को सुप्रीमकोर्ट ने उनकी अपील मंजूर कर ली।

हाईकार्ट के फैसले पर स्टे देने वाले सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अय्यर से कुलदीप नैयर ने पूछा था कि क्या स्टे के पहले उनसे कोई मिला था? नैयर के मुताबिक उन्होंने कम्युनिस्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे और जस्टिस पी.एन. भगवती की मुलाकात का जिक्र किया था। नैयर का निष्कर्ष था कि जस्टिस भगवती ने उन्हें हर पहलू पर गौर करने की सलाह दी। वर्षों बाद जस्टिस अय्यर ने कहा कि लोग उन्हें इमरजेंसी लागू किये जाने का जिम्मेदार मानते हैं। नैयर ने जबाब दिया था कि लोग सही सोचते है।

…और जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा। इमरजेंसी में उनके कागजों और सम्पर्कों की गहरी छानबीन हुई। उन्हें और उनके स्टाफ़ को काफी दबाव तनाव से गुजरना पड़ा। जनता पार्टी की सरकार में शांतिभूषण देश के कानून मंत्री बने। उन्होंने जस्टिस सिन्हा के सामने हिमांचल प्रदेश हाईकोर्ट में स्थानांतरण की पेशकश की, जहाँ आगे उनको चीफ जस्टिस के पद पर नियुक्ति मिलती। जस्टिस सिन्हा ने विनम्रतापूर्वक यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। 1982 में वह इलाहाबाद हाईकोर्ट से ही रिटायर हुए। मूलतः बरेली के वाशिंदे जस्टिस सिन्हा ने जिंदगी के अगले 26 साल इलाहाबाद में खामोशी के साथ पढ़ने और बागवानी के शौक के बीच गुजारे। 87 साल की उम्र में 20 मार्च 2008 को उनका निधन हुआ। शांतिभूषण ने उनके विषय में लिखा, ‘वे बहुत महत्वाकांक्षी नहीं थे। वे इस बात से संतुष्ट थे कि एक काबिल, ईमानदार शख्स के तौर पर उन्हें याद किया जाए।’ प्रशांत भूषण की किताब की भूमिका में देश के चीफ़ जस्टिस रह चुके तत्कालीन उपराष्ट्रपति मोहम्मद हिदायतुल्लाह ने जस्टिस सिन्हा की तुलना वाटरगेट कांड का फैसला देने वाले जस्टिस जॉन सिरिका से की। इस फैसले के चलते अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन इस्तीफा देने को मजबूर हो गए थे। जज जॉन सिरिका से उनकी जो तुलना बाद में हुई, उसके संकेत एक युवक ने याचिका के फैसले के पहले ही दे दिए थे। बाद में विदेश मंत्रालय में सचिव रहे राजनयिक विवेक काटजू अपने जज पिता के साथ उस पार्टी में मौजूद थे, जिसमें जस्टिस सिन्हा भी शामिल थे। विवेक काटजू ने जस्टिस सिन्हा से कहा था, ‘अंकल आपके नाम के शुरुआती दो अक्षर जॉन सिरिका से मिलते हैं’। सिन्हा साहब ने हँसते हुए कहा था, बहुत बदमाश हो गए हो।

लेकिन यहाँ फर्क था। इंदिराजी ने इस्तीफे की जगह इमरजेंसी लागू करने का रास्ता चुना। वह इमरजेंसी जिसके बचाव में आज भी कांग्रेस पार्टी को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। जहाँ तक जस्टिस सिन्हा का सवाल है, प्रधानमंत्री के खिलाफ फैसले के पहले और बाद दोनो ही मौकों पर प्रलोभनों को ठुकरा कर न्यायिक इतिहास में उन्होंने अपना सम्मानजनक स्थान सुरक्षित कर दिया।

मैं ईश्वर का शुक्रिया अदा करता हूँ कि मेरी पत्नी 2 महीने पहले ही मर चुकी है : जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा

मैं ईश्वर का शुक्रिया अदा करता हूँ कि मेरी पत्नी 2 महीने पहले ही मर चुकी है : जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा

ये शब्द थे भारत के महान न्यायाधीश जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के… इंदिरा गांधी के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप थे… वो भ्रष्टाचार के दम पर प्रधानमंत्री बनी थी, इंदिरा के खिलाफ केस चला और ये केस इलाहबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सिन्हा की कोर्ट में चला, सबको लग रहा था कि इस महिला तानाशाह से जस्टिस सिन्हा डर जाएंगे, मगर सिन्हा के अंदर बैठा सिंह टस से मस नहीं हुआ, जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा को दोषी पाया और फैसले की तारीख 12 जून 1975 तय की… जिस दिन फैसला देना था उस दिन जस्टिस सिन्हा के लैंडलाइन फोन की घंटी बजी और सामने से आवाज आई… अगर तुमने प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला दिया तो अपनी पत्नी को बोल देना की करवा चौथ न मनाये… ये सुनकर जस्टिस सिन्हा बोले… आप कौन बोल रहे है ये मुझे नहीं मालूम लेकिन आपकी जानकारी के लिए मैं आपको बता दू कि मेरी पत्नी का 2 महीने पहले ही स्वर्गवास हुआ है, इसलिए मैं ईश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि मेरे लिए व्रत रखने वाली स्त्री अब इस संसार में नहीं है… और जस्टिस सिन्हा ने कोर्ट पहुंचकर इंदिरा गांधी को सजा सुना दी, इंदिरा गिरफ्तार हो गयी…

इंदिरा की भ्रष्ट टुकड़ी ने संविधान संशोधन का फैसला किया ताकि प्रधानमंत्री को कभी जेल न जाना पड़े, और अनुच्छेद 329A का प्रस्ताव संसद में पारित हुआ लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया…

इंदिरा ने सुप्रीम कोर्ट पर अपना नियंत्रण करने की कोशिश की, इंदिरा के घमंड से तंग आकर सुप्रीम कोर्ट के तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों ने इस्तीफा दे दिया, लेकिन कुछ समझदार न्यायाधीश इंदिरा के आगे झुके नहीं और इंदिरा के मंसूबो में पानी फिर गया…

वही जस्टिस सिन्हा को इंदिरा को जेल भेजने की भारी कीमत चुकानी पड़ी… जस्टिस सिन्हा का लाइफ टाइम प्रमोशन नहीं हुआ… वो सुप्रीम कोर्ट के जज बन सकते थे मगर इंदिरा की सरकार ने उन्हें परेशान करने के हर हथकंडे अपनाये…

सत्ता का जितना दुरूपयोग इस अहंकारी स्त्री ने किया उतना किसी ने नही किया… संविधान से लेकर न्यायपालिका तक को अपने काबू में करने की कोशिश इस आदमखोर व्याभिचाणिनी भ्रष्ट महिला ने की, ऐसा लग रहा था जैसे बंदरिया के हाथ में उस्तरा दे दिया गया हो… फिर भी कुछ लोग इस इंदिरा को महान बोलते हैं…

12 जून 1975: जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा का इंसाफ, इन्दिरा गांधी की हार और देश में आपातकाल।

12 जून 1975: जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा का इंसाफ, इन्दिरा गांधी की हार और देश में आपातकाल।

1971 में रायबरेली के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने जीत हासिल की। उनकी जीत को उनके प्रतिद्वंदी राज नारायण ने चुनौती दी। भारतीय राजनीति के इतिहास में इस मुक़दमे को इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण के नाम से जाना जाता है।

1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया। क्या थे इसके न्यायिक पहलू और क्या था फ़ैसला? प्रस्तुत है इस ऐतिहासिक फ़ैसले की विवेचना।

12 जून 1975 की सुबह दस बजे से पहले ही इलाहाबाद हाईकोर्ट का कोर्टरूम नंबर 24 खचाखच भर चुका था। जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा पर पूरे देश की नज़रें थीं क्योंकि वो राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी के मामले में फ़ैसला सुनाने जा रहे थे।

मामला 1971 के रायबरेली चुनावों से जुड़ा था। यह वही लोकसभा चुनाव था जिसमें इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी को जबरदस्त क़ामयाबी दिलाई थी। इंदिरा खुद रायबरेली से चुनाव जीती थीं। उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण को भारी अंतर से हराया था। लेकिन राजनारायण अपनी जीत को लेकर इतने आश्वस्त थे कि नतीजे घोषित होने से पहले ही उनके समर्थकों ने विजय जुलूस निकाल दिया था। जब परिणाम घोषित हुआ तो राजनारायण के होश उड़ गए।

राजनारायण शांत नहीं बैठे। उन्होंने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया। उन्होंने अपील की कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी और संसाधनों का दुरुपयोग किया है इसलिए उनका चुनाव निरस्त कर दिया जाए। राजनारायण के वकील थे शांति भूषण और इन्दिरा गांधी के वकील थे एन पालकीवाला।

जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ठीक दस बजे अपने चेंबर से कोर्टरूम में आए। सभी लोग उठकर खड़े हुए। शुरुआत में ही उन्होंने साफ़ कर दिया कि राजनारायण की याचिका में उठाए गए कुछ मुद्दों को उन्होंने सही पाया है। राजनारायण की याचिका में जो सात मुद्दे इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ गिनाए गए थे उनमें से पांच में तो जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी को राहत दे दी थी लेकिन दो मुद्दों पर उन्होंने इंदिरा गांधी को दोषी पाया था। फ़ैसले के अनुसार, जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत अगले छह सालों तक इंदिरा गांधी को लोकसभा या विधानसभा का चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा दिया गया।

राजनारायण की ओर से जिरह करने वाले वकील शांति भूषण याद करते हैं, “इंदिरा के कोर्ट में प्रवेश करने से पहले जस्टिस सिन्हा ने कहा, अदालत में लोग तभी खड़े होते हैं जब जज आते हैं इसलिए इंदिरा गाँधी के आने पर किसी को खड़ा नहीं होना चाहिए। लोगों को प्रवेश के लिए पास बांटे गए थे।”

अदालत में इंदिरा गांधी को करीब पांच घंटे तक सवालों के जवाब देने पड़े। इंदिरा गांधी और उनके समर्थकों को अंदाज़ा लगने लगा था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का फ़ैसला उनके ख़िलाफ़ जा सकता है तो ऐसे में जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा को प्रभावित करने की कोशिशें भी शुरू हुईं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ़ जस्टिस डीएस माथुर इंदिरा गांधी के निजी डॉक्टर केपी माथुर के क़रीबी रिश्तेदार थे। शांति भूषण बताते हैं कि जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के घर पर जस्टिस माथुर अपनी पत्नी के साथ पहुंचे। उन्होंने जस्टिस सिन्हा से कह दिया कि अगर वह राजनारायण वाले मामले में सरकार के अनुकूल फ़ैसला सुनाते हैं तो उन्हें तुरंत सुप्रीम कोर्ट भेज दिया जाएगा। लेकिन इसका जस्टिस सिन्हा पर कोई असर नहीं हुआ।

जस्टिस सिन्हा ने अपने आदेश में लिखा कि इंदिरा गांधी ने अपने चुनाव में भारत सरकार के अधिकारियों और सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया जो जन प्रतिनिधित्व कानून के अंतर्गत ग़ैर क़ानूनी था। इन्हीं दो मुद्दों को आधार बनाकर जस्टिस सिन्हा ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रायबरेली से लोकसभा के लिए हुआ चुनाव निरस्त कर दिया। साथ ही जस्टिस सिन्हा ने अपने फ़ैसले पर बीस दिन का स्थगन आदेश दे दिया। दुनिया के इतिहास में भी यह पहला मौका था जब किसी हाईकोर्ट के जज ने किसी प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ इस तरह का कोई फैसला सुनाया हो।

आखिरकार इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील किया। 22 जून 1975 को वैकेशन जज जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर के सामने ये अपील आई। इंदिरा गांधी की तरफ़ से पालखीवाला ने बात रखी और राजनारायण की तरफ से शांति भूषण अदालत में आए। 24 जून, 1975 को जस्टिस अय्यर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले पर स्थगन आदेश तो दे दिया लेकिन यह पूर्ण स्थगन आदेश न होकर आंशिक स्थगन आदेश था। जस्टिस अय्यर ने फ़ैसला दिया था कि इंदिरा गांधी संसद की कार्यवाही में भाग तो ले सकती हैं लेकिन वोट नहीं कर सकतीं। यानी सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के मुताबिक इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता चालू रह सकती थी।

सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य और सेल्युकस

जब यूनानी आक्रमणकारी सेल्यूकस सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य से हार गया और उसकी सेना बंदी बना ली गयी तब उसने अपनी अतिसुंदर पुत्री हेलेन के विवाह का प्रस्ताव सम्राट चन्द्रगुप्त के पास भेजा…

हेलेन… सेल्यूकस की सबसे छोटी अतिसुंदर पुत्री थी उसके विवाह का प्रस्ताव मिलने पर आचार्य चाणक्य ने सम्राट चन्द्रगुप्त से उसका विवाह कराया था…!!

पर उन्होंने विवाह से पहले हेलेन और चन्द्रगुप्त से कुछ शर्ते रखीं थीं, जिस पर ही उन दोनों का विवाह हुआ था…

पहली शर्त यह थी कि उन दोनों के संसर्ग से उत्पन्न संतान उनके राज्य की उत्तराधिकारी नहीं होगी…

और कारण बताया कि हेलेन एक विदेशी महिला है, भारत के पूर्वजों से उसका कोई नाता नहीं है भारतीय संस्कृति से हेलेन पूर्णतः अनभिज्ञ है…

दूसरा कारण बताया की हेलेन विदेशी शत्रुओं की बेटी है। उसकी निष्ठा कभी भी भारत के साथ नहीं हो सकती…

तीसरा कारण बताया की हेलेन का बेटा विदेशी माँ का पुत्र होने के नाते उसके प्रभाव से कभी मुक्त नहीं हो पायेगा और भारतीय माटी, भारतीय लोगों के प्रति कभी भी पूर्ण निष्ठावान नहीं हो पायेगा…

एक और शर्त आचार्य चाणक्य ने हेलेन के सामने रखी थी कि वह कभी भी चन्द्रगुप्त के राजकार्य में हस्तक्षेप नहीं करेगी और राजनीति और प्रशासनिक अधिकार से पूर्णतया दूर रहेगी… परन्तु गृहस्थ जीवन में हेलेन का पूर्ण अधिकार होगा…

विचार कीजिए… भारत ही नहीं विश्वभर में आचार्य चाणक्य जैसा कूटनीतिज्ञ और महान नीतिकार राजनीतिज्ञ आज तक कोई दूसरा नहीं हुआ…

किन्तु दुर्भाग्य देखिए आज देश को वर्तमान में एक ऐसी ही महिला का कुपुत्र प्राप्त हुआ है, जो कभी भी भारत और भारतीय नागरिकों के हितों की चिन्ता नहीं करता, विदेशों में जाकर सदैव भारत एवं भारतीयों के विरुद्ध निरन्तर जहर उगलता रहता है…

सेक्युलर और समाजवाद

सेक्युलर और समाजवाद ये दो शब्द संविधान में उस समय जोड़े गए थे जब आपातकाल के नाम पर पूरा विपक्ष जेल में बंद था और लोकतंत्र इंदिरा गांधी की मुट्ठी में छटपटा रहा था।

सेक्युलरिज्म का विरोध तो अब तीव्र हुआ है लेकिन समाजवाद को लोग इग्नोर कर रहे है और ये किसी दिन बहुत भारी पड़ने वाला है।

गूगल माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ भारतीय है, लोगो के रोल मॉडल है, लेकिन जो भारत के लिये काम कर रहे है वो भारतीयों के प्रमुख दुश्मन है। सुंदर पिचाई आज तक देश के कुछ काम नही आया है, मगर हीरो है, वही उड़ीसा के ट्रेन हादसे में मदद देने वाला गौतम अडानी दुश्मन है।

सत्या नाडेला माइक्रोसॉफ्ट का सीईओ है, ये सबको पता है लेकिन टीसीएस का सीईओ पूछो तो आधे लोग तो रतन टाटा ही कहेंगे, जबकि 1 जून को ही के. कृतिवासन ने पद संभाला है। सुंदर पिचाई का बंगला ऐसा है, ऋषि सुनक के पास वैसी कार है, ये गर्व की बात है वही हमारा उद्योगपति कोई बिजनेस डील भी करे तो वो तो चोर ही है।

कभी सोचा है हमारे अचेतन मन मे ये सब किसने कैसे फीट किया? पूंजीवाद शब्द सुनते ही अंग्रेज और पश्चिम क्यो घूमता है? जबकि जापान और ऑस्ट्रेलिया भी तो पूंजीवादी देश है। ये सब शीत युद्ध की काली यादे है, जब गुटनिरपेक्ष होकर भी हम सोवियत संघ के खेमे में हुआ करते थे।

सोवियत ने हमारी उंगली के साथ साथ सिर भी पकड़ा हुआ था ताकि भारत कभी पूंजीवाद की राह पकड़ कर अमेरिका के साथ ना खड़ा हो जाये। एक वजह यह भी थी कि पूंजीवादी व्यवस्था भारत को आत्मनिर्भर बनाएगी जो कि सोवियत संघ के हित मे तो कतई नही था।

यही कारण था कि हमारी विषम परिस्थितियों का दबाव बनाकर संविधान में यह शब्द जोड़ा गया, कक्षाओं में पूंजीवाद के दोष और लाभ दोनों पढ़ाये जाएंगे जबकि समाजवाद ना जाने कैसे बस महान है। बिहार ने आज तक सिर्फ समाजवाद चुना बदले में उसे कंगाली, भुखमरी और गुंडों का आतंक ही मिला, क्या आज बिहार को कोई मगध मान सकता है?

दूसरी ओर गुजरात है जिसने पूंजीवाद चुना था और आज गुजरात किसी परिभाषा का बपौती नही है। सुंदर पिचाई या किसी भी NRI से मेरा व्यक्तिगत विरोध नही है, बिल्कुल उनके पदचिन्हों पर चलकर प्रगति करना चाहिए, लेकिन वही सुंदर पिचाई जब अंबानी, अडानी, टाटा, बिड़ला की कंपनियों में सीईओ बनते है तो आपके दुश्मन क्यो बन जाते है।

समाजवाद धर्मनिरपेक्षता जितना ही बड़ा एक ढकोसला है, 1947 के समय लोग ईस्ट इंडिया कंपनी जैसे तंत्र से डरे थे बस इसलिए यह बीमारी हमारे देश मे घुस गई। लेकिन 2023 का भारत बहुत परिपक्व है ऐसे फिसड्डी तंत्रों की हमे कोई आवश्यकता नही है।

दुनिया का ऐसा कोई देश नही है जो आजाद होते ही अपनी एयर लाइन ऑपरेट कर रहा हो लेकिन टाटा की बदौलत हमारे पास एयर इंडिया था। रूस यूक्रेन युद्ध यदि 15 साल पहले हो गया होता तो हम तेल के मोहताज होते लेकिन मुकेश अंबानी की वजह से आज भारत ऐसी स्थिति में भी तेल निर्यात कर रहा है।

इसलिए ये सम्मान के पात्र है उतना ही जितना देश के किसान और जवान है, ये जन गण नही भारत भाग्यविधाता है। इनकी अनुपस्थिति में आज का भारत भारत नही हो सकता था इसीलिए धर्मनिरपेक्षता की तरह समाजवाद का भी त्याग कीजिये।

#साभार: परख सक्सेना ब्लॉग

तेल का कुआँ

तेल का कुआँ!

जिस रेगिस्तान में पानी का कुआँ मिलना दूभर था, वहाँ तेल के कुएँ मिलने की उम्मीद नगण्य थी। यूँ भी उन दिनों यह अनुमान नहीं था कि भविष्य में दुनिया का सबसे प्रचलित ईंधन पेट्रोलियम होगा। जब उन्नीसवीं सदी के अंत में अमरीका में तेल निकालना शुरू भी हुआ, तो यूरोप और एशिया में ख़ास उत्साह नहीं था। किंतु प्रथम विश्व युद्ध ने सभी समीकरण बदल दिए। वहाँ विजेता शक्तियों ने ईंधन के रूप में पेट्रोल का अधिक उपयोग किया, और जर्मनी की हार का एक कारण यह काले रंग का चिपचिपा द्रव भी रहा।

1909 में एक ब्रिटिश कंपनी APOC (एंग्लो- पर्सियन ऑयल कंपनी) ने फ़ारस (ईरान) के मस्जिद सुलेमान में तेल का एक बड़ा कुआँ खोद निकाला। किंतु ईरान का भूगोल अलग था। अरब प्रायद्वीप से तेल की उम्मीद नहीं थी, और न ही वह इलाक़ा ऐसे किसी शोध के लिए सुरक्षित था। जिस रेगिस्तान में यात्रा सबके बस की नहीं थी, वहाँ भटकते हुए तेल कहाँ ढूँढते? वहाँ के क़बीलों में ऐसी केंद्रित प्रशासन व्यवस्था नहीं थी और न ही उनके सरदारों में ऐसी दृष्टि थी। सिवाय इब्न सऊद (अब्दुल अजीज़ सऊद) के।

इब्न सऊद के अंदर एक क़बीलाई सरदार के साथ साथ व्यापारिक बुद्धि भी थी। मक्का पर आधिपत्य की वजह मज़हबी हो सकती है, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि वह आय का बड़ा स्रोत था (और है)। हिजाज़ रेल चलने के साथ ही वार्षिक हज-यात्रियों की संख्या लाख पहुँचने लगी थी। जब युद्ध के बाद यह रेल-यात्रा भंग हुई, तो यात्री घटने लगे। 1929 में आयी वैश्विक महामंदी ने तो संख्या घटा कर चालीस हज़ार कर दी। इब्न सऊद को लगने लगा कि आय का कोई स्थायी स्रोत ढूँढना ही होगा।

1931 में जब बहरैन में स्टैंडर्ड ऑयल कंपनी (कैलिफ़ोर्निया) ने तेल का कुआँ खोदा, तो इब्न सऊद की उम्मीद जगी। उन्होंने पहले ब्रिटिश कंपनी से संपर्क किया जिन्होंने अरब में तेल की संभावना से इंकार कर दिया। अमरीकी मूल कंपनी ने 1933 में आखिर एक करारनामा किया कि वे अरब में तेल की संभावना ढूँढ सकते हैं।

23 सितंबर 1933 को अमरीकी टीम अल- जुबैल गाँव में तेल तलाशने लगी। अगले दो वर्षों तक वे वहाँ से अल- दहरान की पहाड़ियों तक तेल तलाशते रहे, मगर कुछ हाथ नहीं आया। इब्न सऊद स्वयं आकर इन वैज्ञानिकों के साथ उम्मीद लगाए घंटों बैठे रहते और हाथ के इशारे से कहते कि तेल वहाँ मिलेगा। किंतु विज्ञान उनके इशारे से तो नहीं चल सकता था। वह किसी झाड़ी को देख कर पानी का स्रोत ढूँढ भी लेते, मगर तेल तो उनकी समझ से बाहर थी।

1935 में समुद्र तट पर स्थित दमाम की छोटी पहाड़ियों पर काम शुरू हुआ। सात महीने तक खुदाई करने पर आखिर ज़मीन की गहराई से धुआँ निकलना शुरू हुआ। वैज्ञानिक उत्साहित हुए क्योंकि उसमें तेल की गंध थी। लेकिन सिर्फ़ धुआँ ही निकलता रहा, तेल की एक बूँद न मिली।

1936 के जून के तपते महीने में पहली बार दमाम के कुएँ में थोड़ा बहुत तेल निकला। इब्न सऊद अपने काफ़िले के साथ वहाँ पहुँचे। उत्सव का माहौल बन गया। उन्हें कहा गया कि अब आगे के काम में सैकड़ों मज़दूर लगेंगे। अगले ही दिन से ऊँटों पर काफ़िले आने लगे। तीन कुएँ खोद दिए गए, मगर तेल नगण्य। छह कुएँ खोदने के बाद भी स्थिति नहीं बदली। यह साल सूखा निकला। अगला साल भी। अमरीकी टीम अपना बोरिया बिस्तर बाँधने लगी, मगर सैकड़ों अरबी अब भी आस लगाए बैठे थे। उनके लिए ऐसी तपिश, ऐसी असफल तलाश, ऐसी अपूर्ण आशाएँ तो कोई नयी नहीं थी। सातवाँ कुआँ खोदा गया।

मार्च 1938 को लगभग डेढ़ किलोमीटर गहराई से तेल निकला। पहली खेप में 1500 बैरल तेल निकल आया। 7 मार्च तक यह बढ़ कर 3700 बैरल हो गया। उसके बाद तो बस निकलता ही चला गया। अमरीकी टीम खुशी से नाचने लगी, क्योंकि ऐसा अनवरत स्रोत दुर्लभ था। वहीं अरबी मज़दूर इस प्रतीक्षा में थे कि अब अगला कुआँ कहाँ खोदें।

ठीक अगले वर्ष 1 मई 1939 को इब्न सऊद रास तन्नुरा तट पर आए, और एक तेल पाइपलाइन का वाल्व अपने हाथों से खोला। सऊदी अरब से निकल कर पहला तेल टैंकर दुनिया में जा रहा था।

कुछ ही महीनों में एडॉल्फ हिटलर नामक व्यक्ति की सेना पोलैंड की ओर बढ़ रही थी। दुनिया को तेल की बहुत ज़रूरत पड़ने वाली थी। उन्हीं दिनों इब्न सऊद रियाध के बाहर आलीशान मुरब्बा पैलेस बनवा रहे थे। वहाँ ठेकेदारों की भीड़ में एक यमनी युवा ठेकेदार भी था।

विश्व युद्धों और तेल कुओं के मध्य उस ठेकेदार का ज़िक्र ग़ैर ज़रूरी होता अगर उसका नाम मोहम्मद बिन लादेन न होता।

तेल का कुआँ

तेल का कुआँ!

जिस रेगिस्तान में पानी का कुआँ मिलना दूभर था, वहाँ तेल के कुएँ मिलने की उम्मीद नगण्य थी। यूँ भी उन दिनों यह अनुमान नहीं था कि भविष्य में दुनिया का सबसे प्रचलित ईंधन पेट्रोलियम होगा। जब उन्नीसवीं सदी के अंत में अमरीका में तेल निकालना शुरू भी हुआ, तो यूरोप और एशिया में ख़ास उत्साह नहीं था। किंतु प्रथम विश्व युद्ध ने सभी समीकरण बदल दिए। वहाँ विजेता शक्तियों ने ईंधन के रूप में पेट्रोल का अधिक उपयोग किया, और जर्मनी की हार का एक कारण यह काले रंग का चिपचिपा द्रव भी रहा।

1909 में एक ब्रिटिश कंपनी APOC (एंग्लो- पर्सियन ऑयल कंपनी) ने फ़ारस (ईरान) के मस्जिद सुलेमान में तेल का एक बड़ा कुआँ खोद निकाला। किंतु ईरान का भूगोल अलग था। अरब प्रायद्वीप से तेल की उम्मीद नहीं थी, और न ही वह इलाक़ा ऐसे किसी शोध के लिए सुरक्षित था। जिस रेगिस्तान में यात्रा सबके बस की नहीं थी, वहाँ भटकते हुए तेल कहाँ ढूँढते? वहाँ के क़बीलों में ऐसी केंद्रित प्रशासन व्यवस्था नहीं थी और न ही उनके सरदारों में ऐसी दृष्टि थी। सिवाय इब्न सऊद (अब्दुल अजीज़ सऊद) के।

इब्न सऊद के अंदर एक क़बीलाई सरदार के साथ साथ व्यापारिक बुद्धि भी थी। मक्का पर आधिपत्य की वजह मज़हबी हो सकती है, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि वह आय का बड़ा स्रोत था (और है)। हिजाज़ रेल चलने के साथ ही वार्षिक हज-यात्रियों की संख्या लाख पहुँचने लगी थी। जब युद्ध के बाद यह रेल-यात्रा भंग हुई, तो यात्री घटने लगे। 1929 में आयी वैश्विक महामंदी ने तो संख्या घटा कर चालीस हज़ार कर दी। इब्न सऊद को लगने लगा कि आय का कोई स्थायी स्रोत ढूँढना ही होगा।

1931 में जब बहरैन में स्टैंडर्ड ऑयल कंपनी (कैलिफ़ोर्निया) ने तेल का कुआँ खोदा, तो इब्न सऊद की उम्मीद जगी। उन्होंने पहले ब्रिटिश कंपनी से संपर्क किया जिन्होंने अरब में तेल की संभावना से इंकार कर दिया। अमरीकी मूल कंपनी ने 1933 में आखिर एक करारनामा किया कि वे अरब में तेल की संभावना ढूँढ सकते हैं।

23 सितंबर 1933 को अमरीकी टीम अल- जुबैल गाँव में तेल तलाशने लगी। अगले दो वर्षों तक वे वहाँ से अल- दहरान की पहाड़ियों तक तेल तलाशते रहे, मगर कुछ हाथ नहीं आया। इब्न सऊद स्वयं आकर इन वैज्ञानिकों के साथ उम्मीद लगाए घंटों बैठे रहते और हाथ के इशारे से कहते कि तेल वहाँ मिलेगा। किंतु विज्ञान उनके इशारे से तो नहीं चल सकता था। वह किसी झाड़ी को देख कर पानी का स्रोत ढूँढ भी लेते, मगर तेल तो उनकी समझ से बाहर थी।

1935 में समुद्र तट पर स्थित दमाम की छोटी पहाड़ियों पर काम शुरू हुआ। सात महीने तक खुदाई करने पर आखिर ज़मीन की गहराई से धुआँ निकलना शुरू हुआ। वैज्ञानिक उत्साहित हुए क्योंकि उसमें तेल की गंध थी। लेकिन सिर्फ़ धुआँ ही निकलता रहा, तेल की एक बूँद न मिली।

1936 के जून के तपते महीने में पहली बार दमाम के कुएँ में थोड़ा बहुत तेल निकला। इब्न सऊद अपने काफ़िले के साथ वहाँ पहुँचे। उत्सव का माहौल बन गया। उन्हें कहा गया कि अब आगे के काम में सैकड़ों मज़दूर लगेंगे। अगले ही दिन से ऊँटों पर काफ़िले आने लगे। तीन कुएँ खोद दिए गए, मगर तेल नगण्य। छह कुएँ खोदने के बाद भी स्थिति नहीं बदली। यह साल सूखा निकला। अगला साल भी। अमरीकी टीम अपना बोरिया बिस्तर बाँधने लगी, मगर सैकड़ों अरबी अब भी आस लगाए बैठे थे। उनके लिए ऐसी तपिश, ऐसी असफल तलाश, ऐसी अपूर्ण आशाएँ तो कोई नयी नहीं थी। सातवाँ कुआँ खोदा गया।

मार्च 1938 को लगभग डेढ़ किलोमीटर गहराई से तेल निकला। पहली खेप में 1500 बैरल तेल निकल आया। 7 मार्च तक यह बढ़ कर 3700 बैरल हो गया। उसके बाद तो बस निकलता ही चला गया। अमरीकी टीम खुशी से नाचने लगी, क्योंकि ऐसा अनवरत स्रोत दुर्लभ था। वहीं अरबी मज़दूर इस प्रतीक्षा में थे कि अब अगला कुआँ कहाँ खोदें।

ठीक अगले वर्ष 1 मई 1939 को इब्न सऊद रास तन्नुरा तट पर आए, और एक तेल पाइपलाइन का वाल्व अपने हाथों से खोला। सऊदी अरब से निकल कर पहला तेल टैंकर दुनिया में जा रहा था।

कुछ ही महीनों में एडॉल्फ हिटलर नामक व्यक्ति की सेना पोलैंड की ओर बढ़ रही थी। दुनिया को तेल की बहुत ज़रूरत पड़ने वाली थी। उन्हीं दिनों इब्न सऊद रियाध के बाहर आलीशान मुरब्बा पैलेस बनवा रहे थे। वहाँ ठेकेदारों की भीड़ में एक यमनी युवा ठेकेदार भी था।

विश्व युद्धों और तेल कुओं के मध्य उस ठेकेदार का ज़िक्र ग़ैर ज़रूरी होता अगर उसका नाम मोहम्मद बिन लादेन न होता।

“द केरल स्टोरी”कश्मीर फ़ाइल्स से एक कदम आगे।

आज से 04 दिन बाद इस देश में एक आंदोलन शुरू होने जा रहा है और यह आंदोलन सड़क, गली मोहल्ले, चौराहे पर नहीं होगा।

यह आंदोलन सिनेमाहाल में होगा। लोग अपने-अपने घर की बच्चियों के साथ फ़िल्म देखने जाएँगे। लोग सिनेमा हाल के टिकट स्पान्सर कर कर के बच्चियों को फ़िल्म दिखाने ले जाएँगे। आप लोग भी तैयारी करके रखिए। कुछ बच्चियों को फ़िल्म दिखाने के लिए।

इस फ़िल्म से कम्युनिस्ट कीड़े बिलबिला उठेंगे, Giहादी जल उठेंगे। कोई पोलिटिकल करेक्टनेस की चिंता नहीं। केवल एक चिंता सच दिखाया जाए और पूरा का पूरा सच, न कम, न ज़्यादा…

तैयारी करके रखिए “द केरल स्टोरी”
कश्मीर फ़ाइल्स से एक कदम आगे।

🙏

नेहरु के शिक्षा मंत्री: मौलाना अबुल कलाम आज़ाद…!

नेहरु के शिक्षा मंत्री: मौलाना अबुल कलाम आज़ाद…!

बहुत कम लोगों को ज्ञात है कि मौलाना अबुल कलाम किसी विश्वविद्यालय की देन नहीं अपितु एक मदरसे की देन थे… उनकी बड़ी उपलब्धि कोई शैक्षिक डिग्री नहीं अपितु नेहरू के संग नजदीकियां थी… इसीलिए जिस कुर्सी पर किसी वैदिक विद्वान को देश का पाठयक्रम निर्धारित करने के लिए बैठाना था उस पर एक मदरसे के मौलवी को बैठाया गया….यह भारतीय शिक्षा के विकृतीकरण को नेहरू की एक मुख्य देन है… आइए इस पर विचार करें…

११ नवम्बर १८८८ को पैदा हुए मक्का में, वालिद का नाम “मोहम्मद खैरुद्दीन” और अम्मी मदीना (अरब) की थीं,नाना शेख मोहम्मद ज़ैर वत्री, मदीना के बहुत बड़े विद्वान थे। मौलाना आज़ाद अफग़ान उलेमाओं के ख़ानदान से ताल्लुक रखते थे जो बाबर के समय हेरात से भारत आए थे। ये सज्जन जब दो साल के थे तो इनके वालिद कलकत्ता आ गए। सब कुछ घर में पढ़ा और कभी स्कूल कॉलेज नहीं गए। बहुत ज़हीन मुसलमान थे। इतने ज़हीन कि इन्हे मृत्युपर्यन्त “भारत रत्न” से भी नवाज़ा गया। इतने काबिल कि कभी स्कूल कॉलेज का मुंह नहीं देखा और बना दिए गए भारत के पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्री… इस शख्स का नाम था “मौलाना अबुल कलम आज़ाद”। इन्होने इस बात का ध्यान रखा कि विद्यालय हो या विश्वविद्यालय कहीं भी इस्लामिक अत्याचार को ना पढ़ाया जाए, इन्होने भारत के इतिहास को ही नहीं, अन्य पुस्तकों को भी इस तरह लिखवाया कि उनमे भारत के गौरवशाली अतीत की कोई बात ना आए। आज भी इतिहास का विद्यार्थी भारत के अतीत को गलत ढंग से समझता है… हमारे विश्वविद्यालयों में, गुरु तेग बहादुर, गुरु गोबिंद सिंह, बन्दा बैरागी, हरी सिंह नलवा, राजा सुहेल देव पासी, दुर्गा दास राठौर के बारे में कुछ नहीं बताया जाता…!

आज की तारीख में इतिहास हैं… हिन्दू सदैव असहिष्णु थे, मुस्लिम इतिहास की साम्प्रदायिकता को सहानुभूति की नज़र से देखा जाये… भारतीय संस्कृति की रीढ़ की हड्डी तोड़ने तथा लम्बे समय तक भारत पर राज करने के लिए १८३५ में ब्रिटिश संसद में भारतीय शिक्षा प्रणाली को ध्वस्त करने के लिए मैकाले ने क्या रणनीति सुझायी थी तथा उसी के तहत Indian Education Act-१८५८ लागु कर दिया गया… अंग्रेज़ों ने “Aryan Invasion Theory” द्वारा भारतीय इतिहास को इसलिए इतना तोडा मरोड़ा कि भारतियों कि नज़र में उनकी संस्कृति निकृष्ट नज़र आये और आने वाली पीढ़ियां यही समझें कि अँगरेज़ बहुत उत्कृष्ट प्रशासक थे।

आज जो पढाया जा रहा है उसका सार है; हिन्दू आर्यों की संतान हैं और वे भारत के रहने वाले नहीं हैं वे कहीं बाहर से आये हैं और यहाँ के आदिवासियों को मार मार कर तथा उनको जंगलों में भगाकर उनके नगरों और सुन्दर हरे-भरे मैदानों में स्वयं रहते हैं…!

हिन्दुओं के देवी देवता राम, कृष्ण आदि की बातें झूठे किस्से कहानियां हैं हिन्दू महामूर्ख और अनपढ़ हैं…!

हिन्दुओं का कोई इतिहास नहीं है और यह इतिहास अशोक के काल से आरम्भ होता है…! हमारे पूर्वज जातिवादी थे मानवता तो उनमे थी ही नहीं…! वेद, जो हिन्दुओं की सर्व मान्य पूज्य पुस्तकें हैं,गड़रियों के गीतों से भरी पड़ी हैं…! हिन्दू सदा से दास रहे हैं कभी शकों के, कभी हूणों के, कभी कुषाणों के और कभी पठानों तुर्कों और मुगलों के…!

रामायण तथा महाभारत काल्पनिक किस्से कहानियां हैं…!

१५ अगस्त १९४७ को आज़ादी मिली, क्या बदला…?

रंगमंच से सिर्फ अंग्रेज़ बदले बाकि सब तो वही चला अंग्रेज़ गए तो सत्ता उन्ही की मानसिकता को पोषित करने वाली कांग्रेस और नेहरू के हाथ में आ गयी। नेहरू के कृत्यों पर तो किताबें लिखी जा चुकी हैं। पर सार यही है की वो धर्मनिरपेक्ष कम और मुस्लिम हितैषी ज्यादा था। न मैकाले की शिक्षा नीति बदली और न ही शिक्षा प्रणाली। शिक्षा प्रणाली जस की तस चल रही है और इसका श्रेय स्वतंत्र भारत के प्रथम और दस वर्षों (१९४७-५८) तक रहे शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलम आज़ाद को दे ही देना चाहिए। बाकि जो कसर बची थी वो नेहरू की बिटिया इन्दिरा गाँधी ने तो आपातकाल में विद्यालयों में पढ़ाया जाने वाला इतिहास भी बदल कर पूरी कर दी… जिस आज़ादी के समय भारत की १८.७३% जनता साक्षर थी उस भारत के प्रधानमंत्री ने अपना पहला भाषण “tryst With Destiny” अंग्रेजी में दिया था। आज का युवा भी यही मानता है कि यदि अंग्रेजी न होती तो भारत इतनी तरक्की नहीं कर पाता और हम यह सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि पता नहीं जर्मनी, जापान, चीन इजराइल ने अपनी मातृभाषाओं में इतनी तरक्की कैसे कर ली…?

आज तक हम इससे उबर नही सके हैं २०१८ में NCERT की वे किताबें हैं जो २००५ का संस्करण हैं; यह पढाया जा रहा है विद्यार्थियों को… ICSE एक सरकारी परीक्षा संस्थान है जो CBSE की तरह पूरे भारत में मान्य है। संयोग से इसकी २०१६ की इतिहास की पुस्तकें देखें… नमूना देखें…

कक्षा ६

१. इतिहास की घटनाओं के समय का माप केवल ईसा के जन्म से पूर्व (BC बिफोर क्राईस्ट) या ईसा के बाद (AC आफ्टर क्राईस्ट) जैसे भारत का तो कोई समय था ही नहीं…?

२. सिंधु घाटी में एक महान सभ्यता अस्तित्व में थी, जिसे आक्रान्ता आर्यों ने तहस नहस कर दिया…?

३. आक्रमण के बाद आर्य भ्रमित थे कि वे अपने वेदों के साथ यहाँ बसें या यहाँ से चले जाएँ…?

४. उसके बाद सम्राट अशोक आते हैं हर जगह बौद्ध धर्म का उल्लेख उस समय तक मानो हिन्दू थे ही नहीं…?

५. गुप्तकाल… मानो समुद्रगुप्त पहला हिंदू शासक हो क्योंकि वह सहिष्णु था और वह भी अपवादस्वरुप… पल्लव, चोल, चेर या तो वैष्णव थे अथवा शैव, हिन्दू नहीं पूरी किताब में हिंदुओं का उल्लेख सिर्फ तीन बार…?

६. मुखपृष्ठ से अंतिम पृष्ठ तक छठवीं क्लास के आईसीएसई के इतिहास में हिन्दू कहीं मौजूद ही नहीं है कुछ है तो आर्यों द्वारा किया गया सभ्यताओं का सफाया तथा बौद्धों पर जाति थोपने का उल्लेख इन ४० पृष्ठों में ५००० से अधिक वर्षों पुरानी धार्मिक सभ्यता का उल्लेख तक नहीं है पूरे ३०० वर्ष के राजवंशों का इतिहास एक पैरा में निबटा दिया गया…?

कक्षा ७ संक्षेप में…

कक्षा सात की इतिहास की पुस्तक में ईसामसीह का प्रचार है और वह केवल इसी के लिए ही लिखी गई है… दुनिया भर में इस्लाम का खूनी विजय अभियान, अरबों द्वारा किया गया “एकीकरण” का प्रयास था, जिसने अनेक लेखक, विचारक और वैज्ञानिक दिए तुर्की के आक्रमण से पहले भारत क्या था, इसका उल्लेख केवल दो पृष्ठों में हैं जबकि हर क्रूर मुग़ल बादशाह पर पूरा अध्याय है भारत पर अरब आक्रमण एक अच्छी बात थी, उन्होंने हमें सांस्कृतिक पहचान दी महमूद लुटने इसलिए आया क्योंकि उसे पैसे की जरूरत थी। जिस कट्टरपंथी कुतबुद्दीन ऐबक ने २७ मंदिरों को नष्ट कर कुतुब मीनार बनबाई वह एक दयालु और उदार आदमी था… बाबर ने अपने शासनकाल में धार्मिक सहिष्णुता की प्रवृत्ति शुरू की, औरंगजेब एक रूढ़िवादी और भगवान से डरने वाला मुस्लिम संत था जो अपने जीवन यापन के लिए टोपियां सिलता था वह अदूरदर्शी शासक अवश्य था…!

कक्षा ८ से दस तक संक्षेप में…

मराठा साम्राज्य अस्तित्व में आने के पूर्व ही समाप्त हो गया। यहाँ भी ईसाई उत्पीड़न घुसाने का प्रयास, बाइबल पढ़ने वाले गुलामों को निर्दयतापूर्वक दंडित किया जाता था… सिखाया जाता है कि गोरों का राष्ट्रवाद एक अच्छी बात है, किन्तु जब भारतीय राष्ट्रवादी हों तो वे अतिवादी हैं।

जाटों का उल्लेख महज सात लाइनों में,और राजपूतों का १२ में मिलता है पंजाब का उल्लेख सीधे गुरु गोबिंद सिंह से शुरू होता है। उम्मीद के मुताबिक़ हैदर अली और टीपू सुल्तान को बेहतर दिखाया गया है मैसूर किंगडम की शुरूआत हैदर अली से।

मराठाओं को बस एक पेज में लपेट दियाशिवाजी को महज एक पंक्ति में संभाजी कौन तो बस एक कमजोर उत्तराधिकारी… मराठा सिर्फ एक क्षेत्रीय शक्ति थे,जबकि मुगल और ब्रिटिश साम्राज्य थे मुगल साम्राज्य के पतन से अराजकता और अव्यवस्था फैली जिन महाराजा रणजीत सिंह का साम्राज्य पंजाब, कश्मीर और पार तक था, उनका उल्लेख केवल चार लाइनों में हो गया… कसाई टीपू को मैसूर का टाइगर बताया गया गया एक प्रबुद्ध शासक जो अपने समय से आगे का विचार करता था तो औरंगजेब एक संत था और कुतबुद्दीन ऐबक एक दयालु, उदार व्यक्ति और टीपू तो निश्चित रूप से धर्मनिरपेक्ष, उदार और सहिष्णु था ही मुरदान खान और खलील जैसे ठग देवी काली के उपासक थे जिन्होंने दो लाख से अधिक लोगों की हत्याएं कीं…भारतीय समाज गड्ढे में पड़ा हुआ था इसलिए दमनकारी था। १८४३ में अंग्रेजों ने यहाँ गुलामी को अवैध घोषित किया (है ना हैरत की बात उन्होंने भारत में गुलामी को अवैध घोषित किया अफ्रीका में नहीं)

भारतीय शिक्षा…?

मिशनरियों के आने के पूर्व केवल कुछ गिने चुने शिक्षक अपने घर में ही पढाया करते थे। जबकि सचाई यह है कि अकेले बिहार में ब्रिटेन से कहीं ज्यादा स्कूल और विश्वविद्यालय थे बिटिश ने अपनी स्वयं की शिक्षा प्रणाली भारत के अनुसार बनाई… हिंदू धर्म को पुनर्जीवित करने वाली सुधारक केवल एनी बेसेंट थीं… संयोग से एक सच्चाई जरूर सामने आ गई,।वह यह कि ह्यूम ने कांग्रेस का गठन १८५७ जैसी घटनाएँ रोकने के लिए किया था, और यह काम कांग्रेस ने बहुत अच्छी तरह से किया भी। युवाओं ने अभिनव भारत जैसी गुप्त गतिविधियों का संचालन किया, जिन्होंने भारत के बाहर काम किया, यहाँ भी वीर सावरकर का उल्लेख नहीं। क्रांतिकारी आंदोलन का उल्लेख केवल एक पेज से भी कम में किया गया है क्योंकि असली नायकों (गांधी, नेहरू) को ज्यादा स्थान की जरूरत है… नेहरू, गांधी को स्वतंत्रता का पूरा श्रेय दिया गया है…!

गांधी-इरविन समझौते को इतना महत्व दिया गया है कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का बलिदान पूरी तरह गौण हो गया है… नेताजी और आजाद हिंद फौज का उल्लेख मात्र एक चौथाई पृष्ठ में मिलता है…!

तो यह है हमारी आज की इतिहास शिक्षा का कच्चा चिट्ठा… नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और उनकी सेना को एक चौथाई पेज, शिवाजी को एक लाइन, लेकिन चाचा जी का स्तवन भरपूर और हाँ क्रिकेट तो भूल ही गए इस औपनिवेशिक खेल को पूरे दो पृष्ठ, आखिर बोस, भगत सिंह और मराठा साम्राज्य की तुलना में यह अधिक महत्वपूर्ण जो हैं…!

SADDAM HUSSEIN THE BUTCHER OF BAGHDAD

सेक्युलर रहबर की याद में…

सत्रह साल हो गये। ठीक आज ही (9 अप्रैल), भारतमित्र, इस्लामी राष्ट्रनायकों में एक अकेले सेक्युलर व्यक्ति सद्दाम हुसैन अल टिकरीती को अमरीकी सेना ने फाँसी पर चढ़ाया था। बगदाद में न्यायिक प्रक्रिया का ढकोसला दिखा था। उसकी बाबत उल्लेख हो जिसमें सद्दाम को मुत्युदण्ड मिला था। कल्पना कीजिए यदि कहीं जार्ज बुश पर ईरान में नरसंहार का मुकदमा चलता। प्रधान न्यायाधीश होता ओसामा बिन लादेन, अभियोजन पक्ष के प्रमुख होते उत्तरी कोरिया के किम जोंग इल और अदालत का स्थान होता क्यूबा? सद्दाम हुसैन के साथ ठीक ऐसा ही हुआ। प्रधान न्यायाधीश रउफ अब्दुल रशीद थे जो अल्पसंख्यक जनजाति कुर्द के थे। प्रधानमंत्री थे नूरी अल मलिकी जिनकी शिया पार्टी अल दावा ने 1982 में दुजैल में सद्दाम पर जानलेवा हमला किया था। मुकदमें की सुनवाई के दौरान सद्दाम के तीन वकीलों की हत्या कर दी गई थी। एक प्रधान जज रिज़गार मोहम्मद अमीन को त्यागपत्र देने पर विवश कर दिया गया क्योंकि वे निष्पक्ष थे। दूसरे जज का रहस्यमय निधन हो गया था। सद्दाम के वकील, अमरीका के पूर्व महाधिवक्ता तथा मानवाधिकार कार्यकर्ता रेम्ज़े क्लार्क को ईराकी सरकार ने बगदाद से निकाल दिया था। अर्थात् विजेता ने तय किया कि पराजित को कैसा न्याय दिया जाय। अमरीका की न्यायप्रियता महज़ आडम्बर सिद्ध हुई। केवल चरमपन्थी लोग ही इस पीड़ा से अछूते रहेंगे। कारण? दर्द की अनुभूति के लिए मर्म होना चाहिए!

अतः चर्चा का मुद्दा है कि आखिर अपदस्थ राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन का अंजाम ऐसा क्यों हुआ? मजहब के नाम पर बादशाहत और सियासत करने वालों को सद्दाम कभी पसन्द नहीं आए। उनकी बाथ सोशलिस्ट पार्टी ने रूढ़िग्रस्त ईराकी समाज को समता-मूलक आधार पर पुनर्गठित किया था। रोटी, दवाई, शिक्षा, आवास आदि बुनियादी आवश्यकताओं को मूलाधिकार बनाया था। पड़ोसी अरब देशों में मध्यकालीन बर्बरता ही राजकीय प्रशासन की नीति है, मगर बगदाद में कानूनी ढांचा पश्चिमी न्याय सिद्धान्त पर आधारित था। ईराक में चोरी का दण्ड हाथ काटना नहीं था, वरन् जेल की सज़ा होती थी। इसीलिए अमरीकी पूंजीवादी दबाव में शाही सऊदी अरब ने सद्दाम हुसैन के सोशिलिस्ट ईराक को नेस्तनाबूद करने में कसर नहीं छोड़ी। सऊदी अरब के बादशाह ने पैगम्बरे इस्लाम की जन्मस्थली के निकट अमरीकी बमवर्षक जहाजी बेड़े को जगह दी। नाना की मसनद (जन्म स्थली) के ऊपर से उड़कर अमरीकी आततायियों ने नवासे की मजारों पर कर्बला में बम बरसाए थे। अपनी पत्रकारी यात्रा के दौरान इस तीर्थस्थली की मीनारों को क्षतिग्रस्त देख कर गैर-इस्लामी व्यक्ति का दिल भर आयेगा, कि सऊदी अरब के इस्लामी शासकों को ऐसा नापाक काम करते अल्लाह का भी खौफ नही हुआ? शकूर खोसाई के राष्ट्रीय पुस्तकालय में अमरीकी बमों द्वारा जले ग्रन्थों को देखकर नालंदा विश्वविद्यालय और बख्तियार खिलजी को भी शर्म आ जाए।

ईराकी समाजवादी गणराज्य के अपदस्थ राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन पर चले अभियोग और फिर सुनाए गये फैसले की मीनमेख निकालने के पूर्व खुदा के इस बन्दे की सुकृतियों से अवगत हो लें। भारत के हिन्दू राष्ट्रवादियों को याद दिलाना होगा कि सद्दाम हुसैन अकेले मुस्लिम राष्ट्राध्यक्ष थे जिन्होंने कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग कहा था। उनके राज में सरकारी कार्यालयों में नमाज़ अदायगी हेतु अवकाश नहीं मिलता था। कारण यही कि वे मज़हब को निजी आस्था की बात मानते थे। अयोध्या काण्ड पर जब इस्लामी दुनिया में बवण्डर उठा था, तो बगदाद शान्त था। सद्दाम ने कहा था कि एक पुरानी इमारत गिरी है, यह भारत का अपना मामला है। उन्हीं दिनों ढाका में प्राचीन ढाकेश्वरी मन्दिर ढाया गया था। तस्लीमा तसरीन ने अपनी कृति (लज्जा) में बांग्लादेश में हिन्दू तरूणियों पर हुए वीभत्स जुल्मों का वर्णन किया है। इसी पूर्वी पाकिस्तान को भारतीय सेना द्वारा मुक्त कराने पर शेख मुजीब के बांग्लादेश को मान्यता देने में सद्दाम सर्वप्रथम थे। इन्दिरा गांधी की (1975) ईराक यात्रा पर मेज़बान सद्दाम ने उनका सूटकेस उठाया था। जब रायबरेली से लोकसभा चुनाव (1977) में वे हार गईं थीं तो इन्दिरा गांधी को बगदाद में स्थायी आवास की पेशकश सद्दाम ने की थी। पोखरण द्वितीय (मई, 1998) पर भाजपावाली राजग सरकार को सद्दाम ने बधाई दी थी, जबकि कई परमाणु शक्ति वाले राष्ट्रों ने आर्थिक प्रतिबन्ध लादे थे। सद्दाम के नेतृत्व वाली बाथ सोशलिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि भारतीय राजनैतिक पार्टियों के अधिवेशनों में शिरकत करते रहे। भारतीय राजनेताओं को स्मरण होगा कि भारतीय रेल के असंख्य कर्मियों को आकर्षक रोजगार सद्दाम ने वर्षों तक ईराक में उपलब्ध कराए। उत्तर प्रदेश सेतु निर्माण निगम ने तो ईराक से मिले ठेकों द्वारा बहुत लाभ कमाया। पैंतीस लाख अप्रवासी भारतीय श्रमजीवी सालाना एक खरब रुपये भारत भेजते थे। भारत को ईराकी तेल सस्ते दामों पर मुहय्या होता रहा। इस सुविधा का दुरूपयोग करने में कांग्रेसी

विदेश मंत्री नटवर सिंह जैसे लोग तक नहीं चूके थे। आक्रान्त ईराक के तेल पर कई भारतीयों ने बेशर्मी से चाँदी काटी।

सद्दाम को जार्ज बुश ने सेटन (शैतान) कहा था। टिकरीती गाँव का एक यतीम तरूण सद्दाम हुसैन अपने चाचाओं की कृपा पर पला। पैगम्बरे इस्लाम की पुत्री फातिमा का यह वंशज जब मात्र उन्नीस वर्ष का था तो बाथ सोशलिस्ट पार्टी में भर्ती हुआ। श्रम को उचित महत्व देना उसका दर्शन था। अमरीकी फौजों ने इस अपदस्थ राष्ट्रपति की जो मूर्तियां ढहा दी है, उनमें सद्दाम हुसैन हंसिया से बालियाँ काटते और हथौड़ा चलाते दिखते थे। अक्सर प्रश्न उठा कि सद्दाम हुसैन ईराक में ही क्यों छिपे रहे? क्योंकि उन्होंने हार मानी नहीं, रार ही ठानी थी। अमूमन अपदस्थ राष्ट्रनेतागण स्विस बैंक में जमा दौलत से विदेश में जीवन बसर करते हैं। बगदाद से पलायन कर सद्दाम भी कास्त्रों के क्यूबा, किम जोंग इल के उत्तरी कोरिया अथवा चेवेज़ के वेनेजुएला में पनाह पा सकते थे। ये तीनों अमरीका के कट्टर शत्रु रहे। जब अमरीकी सैनिकों ने भूमिगत पुरोधा को पकड़ा था, पूछा कि आप कौन हैं? तो इसी दृढ़ता से सद्दाम का सधा जवाब था, ‘‘ईराक का राष्ट्रपति हूँ।’’

भारत के सेक्युलर मुसलमानों को फख्र होगा याद करके कि ईराक में बुर्का लगभग लुप्त हो गया था। नरनारी की गैरबराबरी का प्रतीक यह काली पोशाक सद्दाम के ईराक में नागवार हो गई थी। कर्बला, मौसूल, टिकरीती आदि सुदूर इलाकों में मुझे बुर्का दिखता ही नहीं था। स्कर्ट और ब्लाउज़ राजधानी बगदाद में आम लिबास था। माथे पर वे बिन्दिया लगाती थीं और उसे हिन्दिया कहती थीं। आधुनिक स्कूलों में पढ़ती छात्राओं, मेडिकल कालेजों में महिला चिकित्सकों और खाकी वर्दी में महिला पुलिस और सैनिकों को देखकर आशंका होती थी कि कहीं सेक्युलर भारत से आगे यह इस्लामी देश न बढ़ जाए।

आज अमरीका द्वारा थोपे गये ‘‘लोकतांत्रिक’’ संविधान के तहत सेक्युलर निज़ाम का स्थान कठमुल्लों ने कब्जाया है। नरनारी की गैरबराबरी फिर मान्य हो गई है। दाढ़ी और बुर्का भी प्रगट हो गये हैं। ईराकी युवतियों के ऊँचे ललाट, घनी लटें, गहरी आंखें, नुकीली नाक, शोणित कपोल, उभरे वक्ष अब छिप गये। यदि आज बगदाद में कालिदास रहते तो वे यक्ष के दूत मेघ के वर्ण की उपमा एक सियाह बुर्के से करते। ईराक में ठीक वैसा ही हुआ जो सम्राट रजा शाह पहलवी के अपदस्थ होने पर खुमैनी राज में ईरान में हुआ, जहां चांद को लजा देने वाली पर्शियन रमणियां काले कैद में ढकेल दी गईं। इराक के नये संविधान में बहुपत्नी प्रथा, जुबानी तलाक का नियम और जारकर्म पर केवल स्त्री को पत्थर से मार डालना फिर से कानूनी बन गया हैं। लेकिन भाजपाई नेता जो मोहम्मद अली जिन्ना को सेक्युलर के खिताब से नवाज चुके हैं, सद्दाम हुसैन को सेक्युलर नहीं मानेंगे। उसके कारण भी हैं। सद्दाम हुसैन सोशलिस्ट थे। नित्य नमाज अता करते थे। कुरान की प्रति अपने साथ रखते थे। पैगम्बर के साथ ईसा मसीह का नाम लेते थे। मगर यहूदियों को शत्रु मानते थे।

अब पुरोगामी मुस्लिम राष्ट्रों ने अमरीकी साम्राज्यवादी के साथ साजिश कर ईराक को फिर से मध्ययुग में ढकेल दिया।

प्रत्येक नेक मुसलमान को और दुनिया के प्रगतिशीलों को सद्दाम बहुत याद आते रहेंगे।

गांधी हत्याकांड की प्रामाणिक पड़ताल

एनसीआरईटी ने जब से गांधी हत्याकांड पर आरएसएस को बदनाम करने वाली पंक्तियां हटाई हैं, तब कई कांग्रेस के नेता ट्विटर पर विचारों की उल्टी कर रहे हैं। उन्हें इन सवालों और तथ्यों पर जवाब देने चाहिएं

  1. सरदार पटेल ने 27 फरवरी, 1948 को नेहरू को एक पत्र में लिखा था कि मैं करीब-करीब रोज बापू की हत्या के मामले में चल रही जांच पर व्यक्तिगत तौर पर नजर रख रहा हूं। इसमें कोई शक नहीं कि आरएसएस का इस हत्याकांड से कोई संबंध नहीं है। कई सूचनाएं हमें गुमनाम सूत्रों से प्राप्त होती हैं। जिनकी जांच होने पर उनमें से 90 फीसदी झूठी पाई जाती हैं। हम जब गुमनाम सूचनाओं पर संघ वालों को पकड़ते है तो केन्द्र तथा राज्य सरकारों पर आरोप लगता है कि हम निर्दोष लोगों को जेलों में ठूंस रहे है। मैं इसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि बापू की हत्या का षड्यंत्र उतना व्यापक नहीं था जितना कि माना जा रहा है, यह सिर्फ चंद मुट्ठी भर लोगों का काम है।” (स्रोत – सरदार पटेल: चुना हुआ पत्र व्यवहार, खंड 2, पृष्ठ 294 )
  2. संघ से सरदार पटेल को इतनी ही दिक्कत थी तो फिर उनकी मौजूदगी में 10 अक्टूबर, 1949 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने यह प्रस्ताव पारित क्यों किया कि संघ के स्वयंसेवक कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं? वो भी गांधी की हत्या के दो साल के भीतर। हालांकि बाद में ये प्रस्ताव नेहरू के विरोधी की वजह से वापस ले लिया गया।
  3. सरादर पटेल के पर्सनल सेकैट्री और आईसीएस अधिकारी वी. शंकर ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि – “सरदार पटेल हमेशा हिंदू समाज के उत्थान और पुनर्गठन में विश्वास करते थे। वह महसूस करते थे कि हिंदू समाज में संगठन और अनुशासन की कमी है। हिंदुओं पर ये दाग है कि वह दूसरे समुदायों के बदमाशों से अपनी सुरक्षा करने में कमजोर है। सरदार पटेल का मानना था कि यदि हिंदू अच्छी तरह से संगठित और अनुशासित होते हैं तो उनपर आक्रमण बंद हो जाएंगे। इस तरह, हिंदू अन्य समुदायों के उग्रवाद की तेज धार को कुंद कर देंगे, चाहे वे मुस्लिम हों या कोई और। सरदार पटेल की नजर में आरएसएस इस अवधारणा में फिट होता था और इसीलिए उनकी आरएसएस के साथ सहानुभूति और समर्थन था।” यानी साफ है कि सरदार पटेल संघ को समर्थन देते थे और सहानुभूति रखते थे। है कोई जवाब आपके पास?
  4. गांधी हत्याकांड की जांच के लिये कांग्रेस सरकार ने 1964 में कपूर आयोग का गठन किया, उसमें गवाही देते हुए गांधी की हत्या के समय देश के गृह सचिव आर.एन. बनर्जी ने कहा था, – “यह साबित नहीं हुआ है कि अपराधी (गोडसे और अन्य) आरएसएस के सदस्य थे। हालांकि आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, लेकिन इसका यह मतलब नहीं था कि सरकार ने यह मान लिया था कि गांधी की हत्या आरएसएस के सदस्यों द्वारा की गई थी। सुबूतों से पता चलता है कि आरएसएस इस तरह की साजिश या हत्या के लिए जिम्मेदार नहीं था।”
  5. कपूर कमीशन ने अपनी जांच रिपोर्ट में साफ शब्दों में दर्ज किया है, “आरएसएस का रुख गांधीवाद के खिलाफ था, लेकिन उसका यह विरोध महात्मा गांधी को व्यक्तिगत रूप से नुक्सान पहुंचाने की हद तक नहीं गया।” कांग्रेस के नेता क्या कपूर कमीशन की रिपोर्ट नहीं मानते हैं?
  6. अब सवाल है कि गांधी की हत्या के बाद नेहरू पूरे 16 साल तक देश के प्रधानमंत्री रहे, उनके दिमाग में आरएसएस के लिए नफरत कूट-कूट कर भरी थी। 1950 में सरदार पटेल की मौत के बाद, उन्हें कोई रोकने वाला भी नहीं था। फिर भी उन्होंने कभी गांधी हत्याकांड में आरएसएस की तथाकथित भूमिका के खिलाफ कोई जांच या आयोग का गठन क्यों नहीं किया? असल में, नेहरू अच्छी तरह जानते थे कि वह और उनकी सरकार आरएसएस के खिलाफ सुबूत नहीं जुटा पाएंगे। अगर कहीं जरा भी गुंजाइश होती तो आरएसएस को अपना दुश्मन नंबर 1 समझने वाले नेहरू यह मौका कभी नहीं छोड़ते।
  7. नेहरू ही नहीं, उनके बाद उनकी बेटी इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की सरकार ने भी कभी यह कोशिश करने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाई?
  8. सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस के.टी. थॉमस ने करारा जवाब देते हुए कहा था, – “RSS पर जांच के शुरुआती चरण में संदेह किया गया था, लेकिन यह जांच आखिरकार इस नतीजे पर पहुंची कि महात्मा गांधी की हत्या में RSS की किसी भी स्तर पर कोई भागीदारी नहीं थी। जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल, दोनों ने बाद में यह महसूस किया कि RSS इस साजिश में शामिल नहीं है। लेकिन राजनैतिक कारणों से आज भी चारों ओर भड़काऊ प्रचार किया जाता है। इस विषय पर ढेर सारा अध्ययन करने के बाद मेरा भी यह मानना है कि एक संगठन के रूप में RSS का गांधी की हत्या से कोई लेना-देना नहीं था।”

Courtesy – #Prakhar_Shrivastav_DDNews_TV_journalist

कृष्ण के मृत्यु के समय का वृतांत

अपने पिता को यदुवंशियों के विनाश की सूचना देकर कृष्ण वन में अपने भाई बलराम के पास वापस लौट आये थे।यदुकुल की स्त्रियों की रक्षा का भार उन्होंने अपने सारथी बाहुक के माध्यम से अर्जुन पर छोड़ दिया था।अब इस धरा पर वे बस अपने भाई के साथ कुछ क्षण व्यतीत करना चाहते थे।

बलराम एक वृक्ष के नीचे निश्चेष्ट बैठे हुए थे। प्राणवान अथवा प्राणहीन, यह देखने भर से पता नहीं चल रहा था। कृष्ण उनकी समाधि को भंग नहीं करना चाहते थे, अतः वहीं निकट ही बैठ गए। कुछ ही क्षण बीते होंगे कि उन्हें बलराम के सिर के पीछे से एक विशाल नाग निकलता हुआ दिखा, जो देखते ही देखते तनिक दूर पर स्थित समुद्र में समा गया। समुद्र तट पर वासुकी, कर्कोटक, शँख, अतिषण्ड इत्यादि नाग एवं स्वयं वरुण देव उसके स्वागत और अगवानी हेतु खड़े थे।
बलराम का शरीर लुढ़क गया।

बड़े भाई को मृत जान श्रीकृष्ण तनिक दूर जाकर लेट गए।

क्या वे जीवन से थक गए थे? या उन्हें भी संसार छोड़ने की इच्छा हो आई थी। लेटे-लेटे ही उन्हें अपना पूरा भूतकाल स्मरण हो आया। मैया यशोदा की डांट, यमुना का वो तट, राधा के साथ रास, कंस का वध, द्वारिका की स्थापना, रुक्मिणी का प्रेम, संयन्तक मणि, पुत्र प्रद्युम्न, बुआ कुंती, मित्र द्रौपदी, अर्जुन और उसके भाई, महाभारत का युद्ध और अंततः यादवों का विनाश। अभी उनकी विचारधारा बह ही रही थी कि उन्हें अपने एक तलवे में पीड़ा का आभास हुआ। नेत्र खोलकर देखा तो एक बाण धँसा हुआ था।

एक व्याध दौड़ता हुआ आया और कृष्ण के पैरों पर गिरकर रोने लगा।
उसने उन गुलाबी चरणों को अपनी गोद में रख लिया और बारम्बार क्षमा मांगने लगा। कृष्ण बोले, “क्यों रोते हो मित्र? तुमसे क्या अपराध हुआ है?”

“क्षमा करो राजन! मृगों को मारने निकला था। तुम्हारे चरणों की झलक दिखी। उन्हें मृग समझ तीर छोड़ दिया। क्षमा करो।

मैं अभी इस बाण को निकालकर औषधि लगा देता हूँ।”

“रुको व्याध। पहले अपना नाम तो बताओ!”

“मेरा नाम जरा है राजन!”

“तो मित्र जरा! शांत हो जाओ। तुमसे कोई पाप नहीं हुआ है। और मैं कोई राजा नहीं, देवकी और वसुदेव का पुत्र कृष्ण हूँ।”

कृष्ण का परिचय सुन वह व्याध और अधिक दुख में डूब गया। जिसके जीवित रहते ही संसार ईश्वर मानने लगा हो, उसी के साथ यह अपराध कर दिया उसने! व्याध हिचकियाँ लेते हुए बोला, “यदि आप वे ही कृष्ण हैं, जो मैं समझ पा रहा हूँ तो आप तो साक्षात ईश्वर हैं।

आपको तो मुझ जैसे नगण्य व्यक्ति के बाण से घायल होना ही नहीं चाहिए था। और अब हो भी गए तो बिना औषधि के भी आपका घाव ठीक हो जाएगा। है न?”

“ऐसा क्यों कहते हो मित्र? क्या कृष्ण मानव नहीं है? उसे भी घाव लग सकते हैं। महाभारत युद्ध में कितनी ही बार मुझे महारथियों, रथियों, यहाँ तक कि सामान्य पदाति सैनिकों तक से अनगिनत घाव मिले हैं। यह अवश्य है कि वे सभी घाव शीघ्र ही ठीक हो गए। परन्तु तुम्हारा दिया घाव विशिष्ट है मित्र।”

“ऐसा क्या विशिष्ट है मेरे दिए घाव में?”

“यह मेरी मृत्यु का कारण जो बनेगा।”

“हे राम!”, लगा कि व्याध के सिर पर पहाड़ गिर पड़ा हो, वह व्याकुल होकर बोला, “ऐसा क्यों कहते हैं कृष्ण? भला मेरे बाण में ऐसी सामर्थ्य कि वह स्वयं ईश्वर के अवतार का अंत कर दे?”

“तुम्हारा बाण महादेव का प्रसाद है मित्र।” व्याध के नेत्रों में जीवंत प्रश्न देख माधव बोलते गए, “बहुत पहले एक बार द्वारिका में एक साधु आया था। वो जोर-जोर से बोल रहा था कि उसका स्वभाव बड़ा क्रोधी है। वो शाप देने में देरी नहीं करता। उसकी इच्छा द्वारिका में कुछ दिन रहने की है। यदि द्वारिका का कोई नागरिक उसके क्रोध को सहन कर सके तो ही उसे आमंत्रित करे।

“उस अत्यंत लंबे और पतले साधु के बारे में समस्त संसार जानता है। दुर्वासा थे वे। जब किसी ने भी उन्हें अपने घर नहीं बुलाया तो मैं आगे बढ़ा और उन्हें अपने घर लिवा लाया। अद्भुत थे वे। कभी खाना खाते तो खाते ही चले जाते। दस लोगों का भोजन कम पड़ जाता। कभी एक ग्रास खाकर उठ जाते।

कभी अचानक ही सोने चले जाते तो कभी अचानक ही उठ जाते। इसलिए उनके लिए सदैव ही भोजन, शयन की उत्तम व्यवस्था रखनी पड़ती। एक बार तो शैया सहित सब कुछ जलाकर चल पड़े, और थोड़ी ही देर में सोने चले आये। उन्होंने अपनी ओर से बहुत प्रयास किया कि उनकी सेवा में उन्हें कोई कमी दिख जाए।
परन्तु मैंने और मेरे परिवारजनों ने ऐसा कोई अवसर ही नहीं दिया।

“एक बार उन्होंने बहुत सारी खीर बनवाई। मैं और रुक्मिणी उन्हें खीर परोसने के लिए खड़े थे। उन्होंने उस स्वादिष्ट खीर में अपनी एक उंगली डुबोई और बस उतना सा ही खाकर बोले कि इस खीर को अपने पूरे शरीर पर मल लूं।

मैंने निःसंकोच उनकी आज्ञा का पालन किया। उन्होंने रुक्मिणी की ओर देखा। उनकी इच्छा समझ मैंने रुक्मिणी को भी खीर लगा दिया। तत्पश्चात वे बाहर आये और एक रथ के घोड़ों को हटाकर उसमें रुक्मिणी को ही जोत दिया। जैसे अश्वों पर कशाघात होते हैं, वैसे ही रुक्मिणी को भी कशाघात सहने पड़े।
द्वारिका की वीथियों पर उस रथ पर बैठे वे साधु रुक्मिणी की पीठ पर प्रहार करते हुए चले जा रहे थे। अंततः वे उतरे और पैदल ही एक दिशा में चलने लगे। हम उनके पीछे भागे।

“वे एक स्थान पर रुके और रुक्मिणी से बोले कि उनकी परीक्षा पूर्ण हुई। घावों को त्वरित रूप से ठीक करने के लिए औषधि देते हुए उसे अनन्त आशीर्वाद दिया और मुझसे बोले, ‘मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था। संसार ने तुम्हारी उदण्डता को कई बार देखा है। अपनी माता और ग्रामवासियों को सताने से लेकर पापी राक्षसों, असुरों और अन्यायी राजाओं का वध करते आये हो। तुमने सदैव अपने मन की ही की है।

आज संसार ने तुम्हारा विनय भी देख लिया। मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। आगे एक महायुद्ध होने वाला है। मुझे ज्ञात है कि उस युद्ध में तुम्हें असंख्य बार असंख्य घाव लगेंगे, और तुम उनका प्रतिकार भी नहीं करोगे। अतः, शरीर के जिस भी अंग पर तुमने खीर का लेपन किया है, वह घावों को सहन कर लेगा।

वे अतिशीघ्र भर जाएंगे। परन्तु कृष्ण, तुमने अपने तलवों पर खीर नहीं मला। चलो, यह भी ठीक ही हुआ। तुम्हें भी एक बहाना मिल जाएगा।”

व्याध, जो अपने हाथ से माधव के तलुओं से निकलते रक्त को रोकने का प्रयास करते हुए उनकी बात सुन रहा था, बोला,

“बहाना कैसा कृष्ण? और तुमने कहा था कि मेरा बाण महादेव का प्रसाद है। सो कैसे?”

“मृत्यु तो निश्चित है न मित्र। मृत्यु के लिए कोई न कोई तो बहाना चाहिए ही। मेरा जीवन पूर्ण हुआ। जिस उद्देश्य के लिए मेरा जन्म हुआ था, वह पूर्ण हुआ। वे साधु, वे महात्मा दुर्वासा महारुद्र के ही अंश हैं।

उन्होंने ही मेरे पूरे शरीर को निरोगी होने का आशीर्वाद दिया था और एक स्थान छोड़ दिया कि मेरी मृत्यु को मार्ग मिल सके।”

“तो क्या आप सच में मर जाएंगे? फिर संसार का क्या होगा?”

“संसार तो मेरे होने से पहले भी था मित्र, और मेरे जाने के बाद भी होगा। धर्म की स्थापना हो चुकी है।

मेरा उद्देश्य पूर्ण हो चुका है। जीवन नश्वर है। पर धर्म और अधर्म का युद्ध शाश्वत है। पूर्वकाल में भी जब-जब धर्म की हानि हुई, कोई न कोई आया था। भविष्य में भी जब-जब पुनः अधर्म प्रबल होगा, कोई न कोई किसी अन्य रूप में आएगा ही।

“अब तुम जाओ मित्र। बहुत बोल लिया मैंने। जीवन भर बोलता ही तो रहा हूँ। अब बस शांति चाहता हूँ। जाओ, अपने मन पर कोई बोझ न रखो। जाओ। तुम्हारा कल्याण हो।”

कोई नहीं जानता यह देश अवकास प्राप्त जज SM soni का भी क़र्ज़दार है

ये कोई नहीं जानता कि ये देश जस्टिस SM Soni का भी कर्जदार है!!

आइए बताता हूं!

नरेंद्र मोदी को जेल मे सडाने की प्लानिंग किसकी थी!? कैसे नरेंद्र मोदी बच सके!!?

षड्यंत्र कितने खतरनाक आप अंदाज नहीं लगा सकते!!

अगर वो सफल हो जाते तो हम क्या खो देते? और नरेंद्र मोदी का हश्र क्याहोता!?कांग्रेस राज में कोई भी केस सुप्रीम कोर्ट में जाने के पहले ही सब कुछ मैनेज हो जाता था!!
वो. कि केस किस जज की बेंच में जायेगा और वो जज क्या फैसला देंगे.कांग्रेस की 70 सालों की सफलता का यही सबसे बड़ा राज है कि!!.उसने मीडिया और न्यायपालिका सबको मैनेज करके अपना राज स्थापित किया.गुजरात हाईकोर्ट के रिटायर जज जस्टिस एसएम सोनी ने इसका खुलासा तब किया, जब उन्होंने पाया की गुजरात दंगो के सम्बन्धित कोई भी याचिका,जो तीस्ता सीतलवाड सुप्रीम कोर्ट में दायर करती है वो सिर्फ जस्टिस आफताब आलम के बेंच में ही क्यों जाती है,जबकि रोस्टर के अनुसार वो किसीऔर के बेंच में जानी चाहिए .फिर उन्होंने और तहकीकात की तो पता चला कि रजिस्ट्रार को ऊपर से आदेश था कि तीस्ता का केस जस्टिस आफ़ताब आलम के बेंच में भेजा जाए और इसके लिए मस्टर रोल और रोस्टर को बदल दिया जाये फिर उन्होंने और तहकीकात की तो पता चला कि.जस्टिस आफताब आलम की सगी बेटीअरुसा आलम, तीस्ता के एनजीओ सबरंग में पार्टनर है और.उस समय के केबिनेट मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की पत्नी भी उसी NGO में हैं,.* यह सब जानकर उन्होंने.इसके खिलाफ चीफ जस्टिस को पत्र भेजा,और * जस्टिस आफ़ताब आलम, कांग्रेस नेता और हिमाचल के मुख्यमंत्री की बेटी (जस्टिस अभिलाषा कुमारी) के 10 फैसलों की बकायदा आठ हजार पन्नों में विस्तृत विबेचना करके भेजा.और कहा कि इन लोगों ने खुलेआम न्यायव्यवस्था का बलात्कार किया है।* इसके बाद ही इस गैंग को.गुजरात के हर एक मामले से अलग किया गया.अगर जस्टिस एस एम सोनी नहीं होतेतो कांग्रेस सरकार नरेंद्र मोदी को दंगों के मामलों में फंसाने की पूरी प्लानिंग कर चुकी थी।कभी आपने राहुल गाँधी, लालू यादव, सीताराम येचुरी, मायावती,अखिलेश, ममता, महबूबा, और विपक्ष के नेताओं को एक दूसरे को चोर बोलते सुना है? नहीं !जबकि इनमें से कुछ को.सजा भी हो चुकी है,कोई जेल में है, कोई बेल पर है और. कुछ पर कोर्ट में मुकदमे चल रहे हैं, मगर. ये लोग एक दूसरे को चोर कभी नहीं बोलते !*परन्तु मोदी जिस पर.कोई भी आधिकारिक आरोप नहीं है,कोई FIR नहीं है,.कोई मुकदमा भी नहीं चल रहा है और. किसी कोर्ट ने किसी जाँच का आदेश भी नहीं दिया, उसे ये सारे नेता चोर बोलते हैं !

यह देखकर आश्चर्य होता है…. धन्य है इस तरह की बेहूदी समझ को, और देश के प्रति गैरजिम्मेदारी के भाव को…. बल्कि लानत है ऐसे देशद्रोही समझ पर! और लानत है इनके पीछे चलने वाले चमचों पर!!

यह है अमेरिकी वैचारिक हथियार घर की सबसे बड़ी तोप।

यह है अमेरिकी वैचारिक हथियार घर की सबसे बड़ी तोप। नाम है एरिक गारसेटी। उम्र 52 वर्ष
लास एंजेलिस का मेयर रहा है। लोमड़ी की तरह चालाक और चीते की तरह फुर्तीला।जो बाइडेन की नाक का बाल। कट्टर कम्युनिस्ट है।
ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि यह व्यक्ति भारत में अमेरिका का राजदूत बनकर आ रहा है।
शायद याद न हो कि पिछले दो सालों से भारत में कोई अमेरिकी राजदूत नहीं है।
इसका कारण यह है कि जो बाइडेन को कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिल रहा था जो भारत की अर्थव्यवस्था को बढ़ने से रोक सके और मोदी को उखाड़ फेंके। अमेरिका में किसी देश में राजदूत नियुक्त करने की प्रक्रिया कुछ अलग ढंग की है। इसके लिए अमेरिकी सीनेट की संस्तुति लेना आवश्यक है। पिछले दो साल से जो बाइडेन बार-बार इसका नाम रख रहे थे पर सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत था।रिपब्लिकन पार्टी का का कहना था कि एरिक गारसेटी का राजदूत बनना भारत अमेरिका के संबंधों को खतरा पहुंचाने जैसा होगा।अंत में जार्ज सोरोस ने पैसे के बल पर दो रिपब्लिकन सदस्यों को सरकार की ओर मिलाकर बिल पास करा दिया। किसी भी दिन यह भारत में धमक सकता है। अंतरराष्ट्रीय राजनयिक प्रोटोकॉल ऐसा है कि भारत इंकार नहीं सकता। यह भारत आते ही विपक्षी दलों को एकजुट करने का प्रयास करेगा। भारत विरोधी एनजीओ और लुटियंस जोन के देशद्रोही मीडिया वालों को मिला कर काम करेगा।
भारत के लिए राहत की बात यह है कि देश को एस जयशंकर जैसा योग्य विदेश मंत्री मिला है।एस जयशंकर ने कहा है कि चिंता की कोई बात नहीं है। एरिक गारसेटी को मैं बड़े “प्यार’ से समझा दूंगा।

अब यह तो जानते ही होंगे कि एस जयशंकर का प्यार कैसा होता है।न मालूम हो यूरोपीय संघ के देशों से पूछ सकते हैं।

ज्योति बसु: सामूहिक हत्याओं का वो वामपंथी प्रतीक जिसे भारत भूल चुका है।

ज्योति बसु: सामूहिक हत्याओं का वो वामपंथी प्रतीक जिसे भारत भूल चुका है।

पश्चिम बंगाल की एक जगह है जहाँ गंगा की दो धाराएँ हुगली और पद्मा समंदर में जाकर मिलती हैं। यहीं है एक सुनसान सा दलदली द्वीप मरीचझापी। इसी जगह पर तत्कालीन ज्योति बसु की वामपंथी सरकार ने हजारों हिन्दू शरणार्थियों को सिर्फ इसीलिए मार दिया था क्योंकि उन्होंने भारत के विभाजन के खिलाफ मतदान किया था।

1979 में तत्कालीन ज्योति बसु सरकार की पुलिस व सीपीएम काडरों ने बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों के ऊपर जिस निर्ममता से गोलियाँ बरसाईं उसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती। जान बचाने के लिए दर्जनों लोग समुद्र में कूद गए थे। अब तक इस बात का कहीं कोई ठोस आँकड़ा नहीं मिलता कि उस मरीचझापी नरसंहार में कुल कितने लोगों की मौत हुई थी। प्रत्यक्षदर्शियों का अनुमान है कि इस दौरान 1000 से ज्यादा लोग मारे गए। लेकिन, सरकारी फाइल में केवल दो मौत दर्ज की गई।

ज्योति बसु वह सामूहिक कातिल है जिसे इतिहास भूल गया है। आज उनका जन्मदिन है। उनका जन्म 8 जुलाई 1914 को कलकत्ता के एक उच्च मध्यम वर्ग बंगाली परिवार में हुआ था। उनकी शुरुआती पढ़ाई कोलकाता के लोरेटो स्कूल और फिर सेंट जेवियर स्कूल में हुई। इसके बाद वो कानून के उच्च अध्ययन के लिए इंग्लैंड रवाना हो गए, जहाँ ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आने के बाद राजनैतिक क्षेत्र में उन्होंने कदम रखा।

इसकी कहानी शुरू होती है भारत के विभाजन से। भारत का विभाजन ऐसी दर्दनाक घटना है जिससे मिले घाव कभी भरे नहीं जा सकते। भारत जिसे मातृभूमि माना जाता है उसे टुकड़ों में बाँट दिया गया। तत्कालीन नेताओं और जिहादी मानसिकता के लोगों ने अपने निजी स्वार्थ के लिए देश का विभाजन करा दिया।

विभाजन भारत के दोनों ओर हुआ था। पूर्व और पश्चिम। पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान। ट्रेन से भरकर लाशें आ रही थी। पश्चिमी पाकिस्तान के हिस्से में कुछ वक्त में स्थिति कुछ सामान्य हुई लेकिन पूर्वी क्षेत्र जलता रहा।

इसी वजह से विस्थापन की जो प्रक्रिया पश्चिम में थम चुकी थी वह पूर्व में लगातार होती रही। बांग्लादेश से धार्मिक रूप से उत्पीड़न झेलने के बाद बांग्लादेशी हिन्दू भारत में शरण लेने आते गए। यह वही लोग थे जिन्होंने 1946 के मतदान के समय भारत के विभाजन के विरोध में मतदान किया था, लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी ने विभाजन के पक्ष में मतदान किया था।

बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) से बाद में आने कारण लोगों को नागरिकता नहीं दी जा रही थी। 1971 के युद्ध के दौरान एक करोड़ से अधिक हिन्दू शरणार्थी भारत आए जिनमें अधिकतर नाम शूद्र अर्थात दलित समुदाय से थे। उन्हें भारत सरकार ने कैम्पों में रखा और नागरिकता नहीं दी। पश्चिम बंगाल के दलदली सुंदरबन डेल्टा में मरीचझापी नामक द्वीप पर बांग्लादेश से भागे करीब 40,000 शरणार्थी एकत्रित हो चुके थे।

बांग्लादेश से आए शरणार्थियों में ज्यादातर बेहद गरीब परिवारों और दलित समुदाय से आते थे। गरीबों, दलितों, वंचितों और मजदूर वर्ग की पार्टी होने का दावा करने वाले वामपंथी दलों ने सत्ता में आने पर शरणार्थियों को नागरिकता देने का वादा किया।

1977 में सरकार आने के बाद वामपंथी दल ने इस बात को दोहराया भी। इसके बाद छत्तीसगढ़, दंडकारण्य, असम और अन्य क्षेत्रों में रहने वाले बांग्लादेशी हिंदुओं ने बंगाल की तरफ पलायन किया। लेकिन किसी तरह की सहायता ना होते देख उन्होंने सुनसान दलदली द्वीप मरीचझापी में अपना ठिकाना बनाया।

इसी जगह पर उन्होंने खेती शुरू की, विद्यालय शुरू किए और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्था की। लेकिन वामपंथी सरकार को 1947 में भारत विभाजन के विरोध में किए गए मतदान का बदला लेने की सनक ने इन हिन्दू शरणार्थियों के लिए मरीचझापी को “खूनी द्वीप” बना दिया।

100 से अधिक पुलिस जहाज और 2 स्टीमर भेजकर राज्य की कम्युनिस्ट सरकार ने द्वीप की पूरी घेरे बंदी कर दी। वहाँ से आवागमन के सारे रास्ते बंद कर दिए गए। द्वीप चारों तरफ से समुद्र से घिरा हुआ था, इसकी वजह से वहाँ पीने के पानी का एकमात्र स्त्रोत था। उसमें भी सरकारी आदेश के बाद जहर मिला दिया गया।

वामपंथी सरकार के केवल इस आर्थिक घेरेबंदी के दौरान ही 2000 से अधिक लोग मारे गए थे। मरने वालों में छोटे छोटे दुधमुँहे बच्चे भी शामिल थे। मजबूरी में हिन्दू शरणार्थी लोगों को द्वीप से निकलना पड़ा।

कुछ लोगों को वहीं मार दिया गया। मार कर लाशों को समुद्र में ही फेंक दिया गया। सुंदरवन के जंगलों में लाशों को छोड़ दिया गया जिसे खाकर वहाँ के बाघ आदमखोर बन गए।

यह सब कुछ जो हुआ वह जलियाँवाला बाग नरसंहार के बराबर या उससे अधिक ही जघन्य था। लेकिन इस मामले को कभी मुख्यधारा की खबरों में जगह नहीं मिली। कभी वामपंथी दलों से इस मुद्दे पर प्रश्न नहीं पूछा गया।

अगर कायदे से देखा जाए तो इस भयानक नरसंहार के बाद ज्योति बसु को तुरंत पद छोड़ना देना चाहिए था। शायद उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया जाना चाहिए था, मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसके विपरीत जिस समय ज्योति बसु ने पश्चिम बंगाल के सीएम के रूप में इस्तीफा दिया, उन्होंने भारत के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री के रूप में इतिहास रचा था। उन्होंने तो इस नरसंहार पर सहानुभूति भी नहीं व्यक्त की।

आज भी वही वामपंथी दल, पत्रकार, बुद्धिजीवी हिन्दू शरणार्थियों को नागरिकता देने के खिलाफत कर रहे हैं। आखिर कुछ लोगों के द्वारा लिए गए फैसले की वजह से उनकी जमीन, उनकी मातृभूमि में उनके साथ ही धार्मिक उत्पीड़न होता है तो उसके लिए वो लोग जिम्मेदार कैसे हैं?

यह वामपंथ की पुरानी आदत है कि दलितों, गरीबों, वंचितों, अल्पसंख्यकों के नाम से खुद को पेश कर गरीबों और दलितों का शोषण किया जाता है। मरीचझापी की घटना सबसे बड़ा उदाहरण है किस तरह वामपंथ भारत में भारतीय मूल के धर्मों से नफरत करता है और उनका नरसंहार चाहता है।

वामपंथियों के देशविरोधी कृत्यों का एक पूरा काला इतिहास है। वामपंथी जब भी मुँह खोलते हैं देशविरोधी भाषा ही बोलते हैं। यह किसी से छिपा नहीं है। साल 1962 के युद्ध के बाद भी ज्योति बसु ने सार्वजनिक रूप से एक रैली में घोषणा की थी कि “चीन आक्रामक नहीं हो सकता है।”

वर्ष 1977 में भारी बहुमत के साथ सत्ता में आए लेफ्ट फ्रंट ने हत्या को संगठित तरीके से राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू किया। वैसे, सीपीएम काडरों ने वर्ष 1969 में ही बर्दवान जिले के सेन भाइयों की हत्या कर अपने राजनीतिक नजरिए का परिचय दे दिया था। वह हत्याएँ बंगाल के राजनीतिक इतिहास में सेनबाड़ी हत्या के तौर पर दर्ज है। वर्ष 1977 से 2011 के 34 वर्षों के वामपंथी शासन के दौरान जितने नरसंहार हुए उतने शायद देश के किसी दूसरे राज्य में नहीं हुए।

वैसे मशहूर बांग्ला कहावत ‘जेई जाए लंका सेई होए रावण’ यानी जो लंका जाता है वही रावण बन जाता है। इसी तर्ज पर सत्ता संभालने वाले तमाम दलों ने इस दौरान इस हथियार को और धारदार ही बनाया है।

वर्ष 2011 में ममता बनर्जी की अगुवाई में तृणमूल कॉन्ग्रेस के सत्ता में आने के बाद भी राजनीतिक हिंसा का दौर जारी रहा। दरअसल, लेफ्ट के तमाम काडरों ने धीरे-धीरे तृणमूल का दामन लिया था। यानी दल तो बदले लेकिन चेहरे नहीं। अब धीरे-धीरे बीजेपी के सिर उभारने के बाद एक बार फिर नए सिरे से राजनीतिक हिंसा का दौर शुरू हुआ है।

केरल से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे एपी अब्दुललाकुट्टी ने कॉन्ग्रेस पार्टी के विधायक रहने के दौरान कम्युनिस्ट सरकार की वर्तमान क्रूरता नहीं बल्कि अतीत में की गई क्रूरता की भी पोल खोल दी थी। एपी अब्दुललाकुट्टी फिलहाल केरल भाजपा के उपाध्यक्ष हैं।

5 मार्च 2008 को कन्नूर जिले में पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक के हवाले से उन्होंने अपने आलेख में लिखा है कि जो पिनरायी विजयन अभी केरल की मार्क्सवादी सरकार के मुख्यमंत्री हैं, उस समय सीपीएम के सेक्रेटरी थे। उन्होंने कहा थ कि विजयन ने अपने कार्यकर्ताओं को साफ संदेश दिया था कि केरल में पश्चिम बंगाल के मॉडल को अपनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार वहाँ अपने दुश्मनों का एक बिना बूँद खून बहाए जिंदा में दफना दिया जाता है वही फार्मूला केरल में भी लागू किया जाना चाहिए।

विजयन ने स्पष्ट रूप से कहा था कि केरल में भी अपने राजनीतिक दुश्मनों को सबक सिखाने के लिए उन्हें जिंदा जमीन में गाड़ देना चाहिए। उन्होंने विस्तार से बताते हुए लिखा कि एक गड्ढा बनाने के बाद में उसमें काफी मात्रा नमक रखकर आदमी को वहीं दफना देना चाहिए। क्योंकि इससे पुलिस को कभी कोई सुराग नहीं मिलेगा।

एपी अब्दुललाकुट्टी के इस खुलासे यह तो तय हो गया है कि कम्युनिस्ट कितने क्रूर होते हैं। पश्चिम बंगाल में यदि कम्युनिस्टों ने इतने दिनो तक शासन किया है तो वह लोकप्रियता के आधार पर नहीं बल्कि क्रूरता के आधार पर। इसी के उदाहरण थे भारत के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले ज्योति बसु।

WITNESS THE DARKEST CHAPTER IN INDIAN POLITICS HISTORY

जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था तब सुरक्षा अधिकारियों ने इंदिरा गाँधी को बुलेटप्रूफ़ कार में चलने की सलाह दी थी।

इंदिरा गाँधी ने अम्बेसेडर कारों को बुलेटप्रूफ़ बनवाने के लिये कहा, उस वक्त भारत में बुलेटप्रूफ़ कारें नहीं बनती थीं इसलिये एक जर्मन कम्पनी को कारों को बुलेटप्रूफ़ बनाने का ठेका दिया गया।

जानना चाहते हैं उस ठेके का बिचौलिया कौन था, वाल्टर विंसी, सोनिया गाँधी की बहन अनुष्का का पति!

रॉ को हमेशा यह शक था कि उसे इसमें कमीशन मिला था, लेकिन कमीशन से भी गंभीर बात यह थी कि इतना महत्वपूर्ण सुरक्षा सम्बन्धी कार्य उसके मार्फ़त कराया गया। इटली का प्रभाव सोनिया दिल्ली तक लाने में कामयाब रही थीं, जबकि इंदिरा गाँधी जीवित थीं।

दो साल बाद 1986 में ये वही वाल्टर विंसी महाशय थे जिन्हें एसपीजी को इटालियन सुरक्षा एजेंसियों द्वारा प्रशिक्षण दिये जाने का ठेका मिला, और आश्चर्य की बात यह कि इस सौदे के लिये उन्होंने नकद भुगतान की मांग की और वह सरकारी तौर पर किया भी गया।

यह नकद भुगतान पहले एक रॉ अधिकारी के हाथों जिनेवा (स्विटजरलैण्ड) पहुँचाया गया लेकिन वाल्टर विंसी ने जिनेवा में पैसा लेने से मना कर दिया और रॉ के अधिकारी से कहा कि वह यह पैसा मिलान (इटली) में चाहता है।

विंसी ने उस अधिकारी को कहा कि वह स्विस और इटली के कस्टम से उन्हें आराम से निकलवा देगा और यह “कैश” चेक नहीं किया जायेगा। रॉ के उस अधिकारी ने उसकी बात नहीं मानी और अंततः वह भुगतान इटली में भारतीय दूतावास के जरिये किया गया।

इस नकद भुगतान के बारे में तत्कालीन कैबिनेट सचिव बी. जी. देशमुख ने अपनी हालिया किताब में उल्लेख किया है, हालांकि वह तथाकथित ट्रेनिंग घोर असफ़ल रही और सारा पैसा लगभग व्यर्थ चला गया।

इटली के जो सुरक्षा अधिकारी भारतीय एसपीजी कमांडो को प्रशिक्षण देने आये थे उनका रवैया जवानों के प्रति बेहद रूखा था। एक जवान को तो उस दौरान थप्पड़ भी मारा गया। रॉ अधिकारियों ने यह बात राजीव गाँधी को बताई और कहा कि इस व्यवहार से सुरक्षा बलों के मनोबल पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है और उनकी खुद की सुरक्षा व्यवस्था भी ऐसे में खतरे में पड़ सकती है।

घबराये हुए राजीव ने तत्काल वह ट्रेनिंग रुकवा दी। लेकिन वह ट्रेनिंग का ठेका लेने वाले विंसी को तब तक भुगतान किया जा चुका था । राजीव गाँधी की हत्या के बाद तो सोनिया गाँधी पूरी तरह से इटालियन और पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों पर भरोसा करने लगीं, खासकर उस वक्त जब राहुल और प्रियंका यूरोप घूमने जाते थे।

सन 1985 में जब राजीव सपरिवार फ़्रांस गये थे तब रॉ का एक अधिकारी जो फ़्रेंच बोलना जानता था, उनके साथ भेजा गया था, ताकि फ़्रेंच सुरक्षा अधिकारियों से तालमेल बनाया जा सके। लियोन (फ़्रांस) में उस वक्त एसपीजी अधिकारियों में हड़कम्प मच गया जब पता चला कि राहुल और प्रियंका गुम हो गये हैं।

भारतीय सुरक्षा अधिकारियों को विंसी ने बताया कि चिंता की कोई बात नहीं है, दोनों बच्चे जोस वाल्डेमारो के साथ हैं जो कि सोनिया की एक और बहन नादिया के पति हैं। विंसी ने उन्हें यह भी कहा कि वे वाल्डेमारो के साथ स्पेन चले जायेंगे जहाँ स्पेनिश अधिकारी उनकी सुरक्षा संभाल लेंगे।

भारतीय सुरक्षा अधिकारी यह जानकर अचंभित रह गये कि न केवल स्पेनिश बल्कि इटालियन सुरक्षा अधिकारी उनके स्पेन जाने के कार्यक्रम के बारे में जानते थे। जाहिर है कि एक तो सोनिया गाँधी तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के अहसानों के तले दबना नहीं चाहती थीं, और वे भारतीय सुरक्षा एजेंसियों पर विश्वास नहीं करती थीं।

इसका एक और सबूत इससे भी मिलता है कि एक बार सन 1986 में जिनेवा स्थित रॉ के अधिकारी को वहाँ के पुलिस कमिश्नर जैक कुन्जी़ ने बताया कि जिनेवा से दो वीआईपी बच्चे इटली सुरक्षित पहुँच चुके हैं, खिसियाये हुए रॉ अधिकारी को तो इस बारे में कुछ मालूम ही नहीं था।

जिनेवा का पुलिस कमिश्नर उस रॉ अधिकारी का मित्र था, लेकिन यह अलग से बताने की जरूरत नहीं थी कि वे वीआईपी बच्चे कौन थे। वे कार से वाल्टर विंसी के साथ जिनेवा आये थे और स्विस पुलिस तथा इटालियन अधिकारी निरन्तर सम्पर्क में थे। जबकि रॉ अधिकारी को सिरे से कोई सूचना ही नहीं थी। है ना हास्यास्पद लेकिन चिंताजनक…।

उस स्विस पुलिस कमिश्नर ने ताना मारते हुए कहा कि “तुम्हारे प्रधानमंत्री की पत्नी तुम पर विश्वास नहीं करती और उनके बच्चों की सुरक्षा के लिये इटालियन एजेंसी से सहयोग करती है”।

बुरी तरह से अपमानित रॉ के अधिकारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से इसकी शिकायत की, लेकिन कुछ नहीं हुआ।

अंतरराष्ट्रीय खुफ़िया एजेंसियों के गुट में तेजी से यह बात फ़ैल गयी थी कि सोनिया गाँधी भारतीय अधिकारियों, भारतीय सुरक्षा और भारतीय दूतावासों पर बिलकुल भरोसा नहीं करती हैं, और यह निश्चित ही भारत की छवि खराब करने वाली बात थी।

राजीव की हत्या के बाद तो उनके विदेश प्रवास के बारे में विदेशी सुरक्षा एजेंसियाँ, एसपीजी से अधिक सूचनायें पा जाती थी और भारतीय पुलिस और रॉ उनका मुँह देखते रहते थे।

ओट्टावियो क्वात्रोची के बार-बार मक्खन की तरह हाथ से फ़िसल जाने का कारण समझ में आया?

उनके निजी सचिव विंसेंट जॉर्ज सीधे पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों के सम्पर्क में रहते थे। रॉ अधिकारियों ने इसकी शिकायत नरसिम्हा राव से की थी, लेकिन जैसी की उनकी आदत (?) थी वे मौन साध कर बैठ गये।

संक्षेप में तात्पर्य यह कि, जब एक गृहिणी होते हुए भी वे गंभीर सुरक्षा मामलों में अपने परिवार वालों को ठेका दिलवा सकती हैं। राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी के जीवित रहते रॉ को इटालियन जासूसों से सहयोग करने को कह सकती हैं। सत्ता में ना रहते हुए भी भारतीय सुरक्षा अधिकारियों पर अविश्वास दिखा सकती हैं तो, जब सारी सत्ता और ताकत उनके हाथों मे रही थी, वे क्या-क्या कर रही होंगी, बल्कि क्या नहीं किया होगा?

हालांकि “मैं भारत की बहू हूँ” और “मेरे खून की अंतिम बूँद भी भारत के काम आयेगी” आदि वे यदा-कदा बोलती रहती थीं, लेकिन यह असली सोनिया नहीं है। समूचा पश्चिमी जगत, जो कि जरूरी नहीं कि भारत का मित्र ही हो, उनके बारे में सब कुछ जानता था। लेकिन हम भारतीय लोग सोनिया के बारे में कितना जानते हैं?

भारत भूमि पर जन्म लेने वाला व्यक्ति चाहे कितने ही वर्ष विदेश में रह ले, स्थाई तौर पर बस जाये लेकिन उसका दिल हमेशा भारत के लिये धड़कता है, और इटली में जन्म लेने वाले व्यक्ति का?

उन्होंने कहा है कि, मेरी मेहनत भरी रिसर्च और बुद्धिमत्ता रंग लाई। उन चार मंत्रियों (इंदिरा सरकार के कैबिनेट मंत्री) और दो दर्जन सांसद KGB (रूस की जासूसी एजेंसी) के लिए काम करते थे। KGB इन्हें इसके लिए मोटी रकम देता था।

मलय कृष्ण धर ने उनकी किताब में कुछ जाने माने तथ्य और पब्लिक सिक्रेटों को प्रकाशित किया है। इस किताब में उन्होंने सोनिया गांधी पर आरोप लगाते हुए कहा है कि सोनिया गांधी एक KGB द्वारा भेजी हुई जासूस है।

वर्ष 1985 में रूसी जासूसी एजेंसी KGB द्वारा 2 बिलियन यूएस डॉलर (94 करोड़ रुपये) राहुल गांधी के स्विस बैंक खाते में जमा किये थे जो कि सोनिया गांधी द्वारा मैनेज किया जाता था। स्विस न्यूज़ मैगजीन में भी यह दर्शाया गया था कि KGB ने सोनिया गांधी जो कि भारतीय राजनेता से विवाहित है उसे इतनी मोटी रकम क्यों दी गयी?

अगर सोनिया गांधी भारत की प्रधानमंत्री बन गयी होती तो हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा, सेना, वैज्ञानिकता और टेक्नोलॉजी विकास (BARC, ISRO, DRDO, ICAR, ICAR) और हमारी व्यापारिक गतिविधियां रूस, रोम और अन्य मुस्लिम राष्ट्रों के लिए एक तरह से खुली किताब के समान हो जाती।

इटालियन माफिया भारतीय इंडस्ट्रीज और व्यापार पर अपना दबदबा कायम कर लेता, जिसका परिणाम बहुत ही खतरनाक होता।

कृष्ण धर द्वारा जुटाए गए कुछ सबूत सोनिया गांधी को रसियन एजेंट साबित करते है।

जवाहर लाल नेहरू के समय इंदिरा गांधी को भी KGB के द्वारा मोटी रकम मिलती थी। उसके बाद इंदिरा गांधी के चहेते राजीव और सोनिया को पाकिस्तानी बैंकर के द्वारा रकम दी जाती थी। बैंकर आघा हसन अबदी जो कि बैंक ऑफ क्रेडिट एंड कॉमर्स में कार्यरत था। यह बैंक अबु धाबी के शेख जैयद के अवैध धन (नशीली दवाओं से कमाई रकम) को वैध करता था।

तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमयी मृत्यु रूस पर उंगली उठाती है। 1965 भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद शास्त्रीजी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान से ताशकंद में मुलाकात की और ‘No-War समझौते’ पर हस्ताक्षर किये। जिसमें लिखा था कि अब कोई युद्ध नहीं होगा। लेकिन चौकाने वाली बात यह है कि उनकी अगले ही दिन रहस्यमयी मृत्यु हो गयी और इससे जुड़े सारे सबूत मिटा दिये गये।

संजय गांधी की मृत्यु से जुड़े सबूत भी सोनिया गांधी को संदेह के घेरे में खड़े करते थे। संजय गांधी को KGB के कहने पर मारा गया था, ताकि राजीव गांधी भारत के अगले प्रधानमंत्री हों।

राजीव गांधी की मृत्यु श्रीलंका के आतंकी समूह LTTE (जिसे ईसाई समूह द्वारा वित्तीय सहायता मिलती थी) द्वारा हुई थी।

बता दे कि राजीव गांधी को 21 मई, 1991 को तमिलनाडु में 24 वर्षीय धनु नामक रोमन कैथेलिक महिला, जिसका असली नाम क्लैबथि था, के द्वारा आत्मघाती बम द्वारा उड़ा दिया गया था। राजीव गांधी को मार दिया गया तो बाहरी जासूसी एजेंसियों ने सोनिया गांधी को बढ़ावा देने के लिए पर्दे के पीछे से काम किया।

सोनिया की लीडरशिप के लिए संभावित खतरों को एक एक कर के शानदार तरीके से दुर्घटनाओं को प्राकृतिक रूप देकर हटा दिया गया, जो KGB की विशेषता है।

कैथोलिक्स रविवार को विशेष मानते हैं और सोनिया गांधी के सभी खतरों को रविवार को ही खत्म कर दिया गया। राजेश पायलट की रोड एक्सीडेंट में रविवार को मौत हो गयी थी। जितेंद्र प्रसाद रविवार को ब्रेन हैमरेज से मारे गये।माधव रविवार के ही दिन प्लेन क्रैश में मारे गये। कमलनाथ जो कि कांग्रेस के बड़े युवा नेता थे वे भी प्लेन क्रैश में बाल बाल बचे थे।

सोर्स:

1. ‘ओपन सीक्रेट’ written by मलय कृष्णा धर (रिटायर इंडियन पुलिस सर्विस मलय कृष्णा धर जी ने 29 वर्षों तक इंटेलिजेंस ब्यूरो में सेवा दी है।)

2. “द न्यू इंडियन एक्सप्रेस” में प्रकाशित एक न्यूज: अनमास्किंग सोनिया गाँधी शीर्षक से (17 अप्रैल 2004 इंग्लिश में)

3. ‘Who Is Soniya Gandhi’ नाम से छापा गया सुब्रमण्यम स्वामी जी द्वारा लिखित एक लेख।

लड़की हूँ लड़ सकती हूँ

लडकी है लड सकती है…

जब ये खबर आयी कि प्रियंका मुरादाबाद के किसी ठठेरे से बियाह करेंगी तो मुल्क वाकई एक बार सन्न रह गया था। ठठेरा UP की एक बिरादरी होती है जो पुराने जमाने में बर्तन इत्यादि बनाया करते थे।

उनका असली नाम रोबर्ट बढ़ेड़ा था। बढ़ेड़ा पंजाब के खत्री होते हैं। उनके पिता का नाम श्री राजेंद्र बढ़ेड़ा था। राजेंद्र जी का जन्म अखंड भारत के मुल्तान में हुआ था। जब 1947 में देश का विभाजन हुआ तो उनका परिवार मुरादाबाद चला आया।

राजेंद्र जी बाढ़ेड़ा का विवाह मॉरीन मैकडॉनघ नामक स्कॉटिश मूल की एक ब्रिटिश महिला से हुआ। ये विवाह कब कैसे किन परिस्थितियों में हुआ इसके बारे में बहुत ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। बहरहाल राजेंद्र भाई बाढ़ेड़ा की मॉरीन से 3 संतानें हुई, रोबर्ट, रिचर्ड और एक लड़की मिशेल।

राजेंद्र जी का मुरादाबाद में पीतल के बर्तनों और कलात्मक वस्तुओं का निर्यात का छोटा मोटा व्यवसाय था। परिवार के हालात बहुत अच्छे न थे और मॉरीन दिल्ली के एक प्लेस्कूल में पढ़ाती थीं।

न जाने किन अज्ञात सूत्रों संबंधों के कारण उनके बच्चों का दाखिला दिल्ली के ब्रिटिश स्कूल में हो गया जिसमें उस समय देश के प्रधान मंत्री की बेटी प्रियंका पढ़ती थी।

13 साल की प्रियंका और मिशेल क्लास मेट थीं और मिशेल ने ही रोबर्ट की दोस्ती प्रियंका से कराई। स्कूल और स्कूल के बाहर भी प्रियंका सुरक्षा कर्मियों से घिरी रहती थीं।

शाही परिवार के बच्चों के चूँकि बहुत कम दोस्त थे लिहाजा मिशेल और रोबर्ट दोनों 10 जनपथ आने जाने लगे। धीरे धीरे रोबर्ट की दोस्ती राहुल से भी हो गयी। सोनिया निश्चिन्त थीं कि प्रियंका की सहेली मिशेल और राहुल के दोस्त रोबर्ट हैं। पहली बार सोनिया के सिर पे बम तब फूटा जब एक दिन प्रियंका एक अनाथ आश्रम के बच्चों की सेवा के बहाने घर से निकली और अपनी माँ को बिना बताए रोबर्ट के घर मुरादाबाद पहुँच गयी।

इधर दिल्ली में चिहाड़ मची। वापस लौटी तो पूछ ताछ हुई। IB ने सोनिया को खबर दी कि आपकी बेटी रोबर्ट से इश्क़ लड़ा रही है। जब सोनिया ने मना किया तो प्रियंका ने बगावत कर दी। और अपनी माँ से दो टूक कह दिया कि वो रोबर्ट से शादी करने जा रही हैं।

इस खबर से कांग्रेस में हड़कंम्प मच गया। राजनैतिक जमात में इसे ख़ुदकुशी करार दिया गया। प्रियंका को उंच नीच समझाने की जिम्म्मेवारी अहमद पटेल, जनार्दन द्विवेदी और मोतीलाल बोरा को दी गयी।

इन सबने प्रियंका को उनके उज्जवल राजनैतिक भविष्य की दुहाई देते हुए समझाया कि किस तरह रोबर्ट एक मिस्टर नोबॉडी हैं, एक बेमेल हैं और आगे चल के एक दायित्व बन जाएंगे। पर ये कम्बख़त इश्क़… जब दिल आ जाए? पर तो परी क्या चीज़ है। इधर प्रियंका अड़ गयी उधर सोनिया टस से मस न होती थीं।

इसके अलावा राजेंद्र बाढ़ेड़ा के परिवार की IB रिपोर्ट भी माकूल न थी। परिवार पुराना संघी था। राजेंद्र जी का परिवार लंबे अरसे से, मने पाकिस्तान बनने से पहले से ही संघ के सक्रिय सदस्य था।

इनके परिवार ने मुरादाबाद शहर की अपनी जमीन सरस्वती शिशु मंदिर के लिए दान कर दी थी और राजेंद्र जी के बड़े भाई श्री उस शिशु मंदिर के आज भी ट्रस्टी हैं।

ऐसे में एक पुराने जनसंघी परिवार में गांधी परिवार के चश्मे चिराग का रिश्ता हो जाए , ये कांग्रेस की लीडरशिप को मंजूर न था। ऐसे में मॉरीन मैकडॉनघ ने न जाने ऐसी कौन सी गोटी चली और अपने ब्रिटिश मूल के रोमन कैथोलिक इतिहास का क्या पव्वा लगाया कि अचानक सोनिया गांधी मान गयी।

वैसे बताया ये भी जाता है कि उन दिनों भी कांग्रेस नेतृत्व ये जान चुकी थी कि राहुल गांधी में बचपना हैं। थोड़ा बहुत चांस इस प्रियंका से लिया जा सकता है बशर्ते कि इसकी शादी किसी हिन्दू लीडर के परिवार में करा दी जाए। पर होइहैं वही जो राम रचि राखा।

शादी इस शर्त पे तय हुई कि राजेंद्र बाढ़ेड़ा का परिवार गांधी परिवार से किसी किस्म का मेलजोल रिश्तेदारी नहीं रखेगा और इनकी सियासी सत्ता का लाभ उठाने का कोई प्रयास नहीं करेगा।

अंततः फरवरी 1997 में प्रियंका गांधी की शादी रोबर्ट बाढ़ेड़ा से हो गयी। सोनिया गांधी को इस बाढ़ेड़ा उपनाम से बहुत चिढ थी। और ये नाम इन्हें राजनीतिक ढंग से भी पसन्द न था सो सबसे पहले इन ने इसे बदल के बाढ़ेड़ा से वाड्रा किया। यूँ भी ये परिवार नाम बदल के देश दुनिया को बेवक़ूफ़ बनाने में बहुत माहिर है।

बहरहाल प्रियंका की शादी मुरादाबाद के ठठेरे से हो गयी। इस बीच वाड्रा परिवार को ये सख्त हिदायत थी कि वो लोग कभी 10 जनपथ में पैर नहीं रखेंगे। अलबत्ता वक़्त ज़रूरत पे प्रियंका गांधी अपनी ससुराल हो आती थीं।

पर रोबर्ट “वाड्रा” को अपने परिवार से तआल्लुक़ रखने की इजाज़त न थी। गौर तलाब है कि प्रियंका से रोबर्ट की मुलाक़ात मिशेल ने कराई थी। पर अब उसी मिशेल का प्रवेश भी गांधी परिवार में वर्जित हो गया था। फिर एक दिन मिशेल की एक कार दुर्घटना में संदिग्ध हालात में मृत्यु हो गयी, जब कि वो दिल्ली से जयपुर जा रही थीं।
उसके चंद दिनों बाद ही एक और अजीब घटना घटी। दिल्ली के एक वकील अरुण भारद्वाज ने दिल्ली के दो अख़बारों में रोबर्ट वाड्रा के हवाले से ये इश्तहार दिया कि मेरे मुवक्किल श्री रोबर्ट वाड्रा का अपने पिता श्री राजेंद्र वाड्रा, और भाई रिचर्ड वाड्रा से कोई सम्बन्ध नहीं है।

यहां तक तो ठीक था। इसके बाद दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय से AICC के लेटर पैड पे देश के सभी कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों, प्रदेश कांग्रेस कमेटी एवं कांग्रेस वैधानिक पार्टियों को सोनिया गांधी की तरफ से एक पत्र भेजा गया जिसमें सभी को ये स्पष्ट निर्देश था कि मुरादाबाद के हमारे समधी और प्रियंका जी के जेठ जी की किसी सिफारिश पे कोई अमल न किया जाए और उन्हें किसी प्रकार के लाभ न पहुंचाए जाएं।

वो बात दीगर है कि आगे चल के इन्ही कांग्रेस मुख्यमंत्रियों अशोक गहलोत और भूपेंद्र हुड्डा के राज में मुरादाबादी ठठेरा देखते देखते ख़ाकपति से अरबपति व्यवसायी बन गया।

इस घटना क्रम के कुछ ही महीनों बाद अपनी प्रियंका दीदी के जेठ जी, यानी अपने रोबर्ट जीजू के बड़े भाई रिचर्ड भाई ने पंखे से लटक के आत्महत्या कर ली।

प्रियंका दीदी के ससुर जी, यानी रोबर्ट जीजू के पिता जी, श्री राजेंद्र भाई वाड्रा, जिनसे कि रोबर्ट वाड्रा जीजू ने बाकायदा एफिडेविट दे के संबंध विच्छेद कर लिया था, यानि कि बेटे ने बाप को बेदखल कर दिया था, वो राजेंद्र भाई गुमनामी और मुफलिसी में दिन काटने लगे।

उनको लिवर सिरोसिस हो गया। उनका इलाज दिल्ली के सरकारी अस्पताल सफ़दर जंग हॉस्पिटल के जनरल वार्ड में हुआ। कुछ दिन बाद राजेंद्र वाड्रा सफदरजंग अस्पताल से डिस्चार्ज ले, दिल्ली में ही AIIMS के नज़दीक एक सस्ते से लॉज के एक कमरे में पंखे से लटकते पाये गए।

उनकी जेब में सरकारी अस्पतालों की दवाई का एक पुर्जा और 10 रु का एक नोट पाया गया। सोनिया गांधी की दिल्ली में पुलिस ने अच्छा किया कि पोस्टमार्टम न कराया वरना पेट में भूख और मुफलिसी के अलावा कुछ न मिलता।

यूँ बताया जाता है कि जब पुलिस राजेंद्र वाड्रा की लाश उस लॉज से ले जाने लगी तो उसके मालिक ने अपना 3 दिन का बकाया किराया सिर्फ इसलिए मुआफ़ कर दिया कि मरहूम शख्स अपनी प्रियंका दीदी का ससुर था।

उसी शाम दिल्ली के एक श्मशान में राजेंद्र वाड्रा का अंतिम संस्कार कर दिया गया जिसमें सिर्फ प्रियंका गांधी, सोनिया गांधी और राहुल बाबा शामिल हुए। शेष लोगों को सुरक्षा कारणों से अंदर नहीं आने दिया गया। रोबर्ट तो पहले ही बेदखल कर चुके थे।

जिहाद

तमाम सरकारों ने मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी ईदगाह को पाठ्यक्रम में शामिल किया ताकि उस कहानी के द्वारा शांति दूतों का महिमामंडन किया जा सके

लेकिन मुंशी प्रेमचंद्र के द्वारा इस्लाम के असली स्वरूप को उजागर करती कहानी जिहाद को गुमनामी में ढकेल दिया गया

मुंशी प्रेमचंद्र जी ने इस्लाम की असली स्वरूप को कई दशक पहले एक कहानी के द्वारा लोगों को बताया था मगर अफसोस इस कहानी को भारत के किसी भी कक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया गया

पढ़िए मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी जिहाद

बहुत पुरानी बात है। हिंदुओं का एक काफ़िला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रदेश से भागा चला आ रहा था।

मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आये थे। धार्मिक द्वेष का नाम न था। पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाता था। बात-बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे। शासन की कोई व्यवस्था न थी। हर एक जिरगे और कबीले की व्यवस्था अलग थी। आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था। जान का बदला जान था, खून का बदला खून; इस नियम में कोई अपवाद न था। यही उनका धर्म था, यही ईमान; मगर उस भीषण रक्तपात में भी हिंदू परिवार शांति से जीवन व्यतीत करते थे।

पर एक महीने से देश की हालत बदल गयी है। एक मुल्ला ने न जाने कहाँ से आ कर अनपढ़ धर्मशून्य पठानों में धर्म का भाव जागृत कर दिया है। उसकी वाणी में कोई ऐसी मोहिनी है कि बूढ़े, जवान, स्त्री-पुरुष खिंचे चले आते हैं।
वह शेरों की तरह गरज कर कहता है-खुदा ने तुम्हें इसलिए पैदा किया है कि दुनिया को इस्लाम की रोशनी से रोशन कर दो, दुनिया से कुफ्र का निशान मिटा दो। एक काफिर के दिल को इस्लाम के उजाले से रोशनी कर देने का सवाब सारी उम्र के रोजे, नमाज और जकात से कहीं ज्यादा है। जन्नत की हूरें तुम्हारी बलाएँ लेंगी और फरिश्ते तुम्हारे कदमों की खाक माथे पर मलेंगे, खुदा तुम्हारी पेशानी पर बोसे देगा।

और सारी जनता यह आवाज सुन कर मजहब के नारों से मतवाली हो जाती है। उसी धार्मिक उत्तेजना ने कुफ्र और इस्लाम का भेद उत्पन्न कर दिया है। प्रत्येक पठान जन्नत का सुख भोगने के लिए अधीर हो उठा है। उन्हीं हिंदुओं पर जो सदियों से शांति के साथ रहते थे, हमले होने लगे हैं। कहीं उनके मंदिर ढाये जाते हैं, कहीं उनके देवताओं को गालियाँ दी जाती हैं। कहीं उन्हें जबरदस्ती इस्लाम की दीक्षा दी जाती है। हिंदू संख्या में कम हैं, असंगठित हैं; बिखरे हुए हैं, इस नयी परिस्थिति के लिए बिलकुल तैयार नहीं। उनके हाथ-पाँव फूले हुए हैं, कितने ही तो अपनी जमा-जथा छोड़ कर भाग खड़े हुए हैं, कुछ इस आँधी के शांत हो जाने का अवसर देख रहे हैं। यह काफिला भी उन्हीं भागनेवालों में था।

दोपहर का समय था। आसमान से आग बरस रही थी। पहाड़ों से ज्वाला-सी निकल रही थी। वृक्ष का कहीं नाम न था। ये लोग राज-पथ से हटे हुए, पेचीदा औघट रास्तों से चले आ रहे थे। पग-पग पर पकड़ लिये जाने का खटका लगा हुआ था। यहाँ तक कि भूख, प्यास और ताप से विकल होकर अंत को लोग एक उभरी हुई शिला की छाँह में विश्राम करने लगे। सहसा कुछ दूर पर एक कुआँ नजर आया। वहीं डेरे डाल दिये। भय लगा हुआ था कि जिहादियों का कोई दल पीछे से न आ रहा हो।

दो युवकों ने बंदूक भर कर कंधे पर रखीं और चारों तरफ गश्त करने लगे। बूढ़े कम्बल बिछा कर कमर सीधी करने लगे। स्त्रियाँ बालकों को गोद से उतार कर माथे का पसीना पोंछने और बिखरे हुए केशों को सँभालने लगीं। सभी के चेहरे मुरझाये हुए थे। सभी चिंता और भय से त्रास्त हो रहे थे, यहाँ तक कि बच्चे भी जोर से न रोते थे।

दोनों युवकों में एक लम्बा, गठीला रूपवान है। उसकी आँखों से अभिमान की रेखाएँ-सी निकल रही हैं, मानो वह अपने सामने किसी की हकीकत नहीं समझता, मानो उसकी एक-एक गत पर आकाश के देवता जयघोष कर रहे हैं। दूसरा कद का दुबला-पतला, रूपहीन-सा आदमी है, जिसके चेहरे से दीनता झलक रही है, मानो उसके लिए संसार में कोई आशा नहीं, मानो वह दीपक की भाँति रो-रो कर जीवन व्यतीत करने ही के लिए बनाया गया है। उसका नाम धर्मदास है; इसका ख़ज़ाँचन्द।

धर्मदास ने बंदूक को जमीन पर टिका कर एक चट्टान पर बैठते हुए कहा-तुमने अपने लिए क्या सोचा? कोई लाख-सवा लाख की सम्पत्ति रही होगी तुम्हारी ?

ख़ज़ाँचंद ने उदासीन भाव से उत्तर दिया-लाख-सवा लाख की तो नहीं,
हाँ, पचास-साठ हजार तो नकद ही थे।
‘तो अब क्या करोगे ?’
‘जो कुछ सिर पर आयेगा, झेलूँगा ! रावलपिंडी में दो-चार सम्बन्धी हैं, शायद कुछ मदद करें।
तुमने क्या सोचा है ?’
‘मुझे क्या गम ! अपने दोनों हाथ अपने साथ हैं। वहाँ इन्हीं का सहारा था, आगे भी इन्हीं का सहारा है।’
‘आज और कुशल से बीत जाये तो फिर कोई भय नहीं।’
‘मैं तो मना रहा हूँ कि एकाध शिकार मिल जाय। एक दरजन भी आ जायँ तो भून कर रख दूँ।’

इतने में चट्टानों के नीचे से एक युवती हाथ में लोटा-डोर लिये निकली और सामने कुएँ की ओर चली। प्रभात की सुनहरी, मधुर, अरुणिमा मूर्तिमान हो गयी थी।

धर्मदास पानी लेकर लौट ही रहा था कि उसे पश्चिम की ओर से कई आदमी घोड़ों पर सवार आते दिखायी दिये। जरा और समीप आने पर मालूम हुआ कि कुल पाँच आदमी हैं। उनकी बंदूक की नलियाँ धूप में साफ चमक रही थीं। धर्मदास पानी लिये हुए दौड़ा कि कहीं रास्ते ही में सवार उसे न पकड़ लें लेकिन कंधे पर बंदूक और एक हाथ में लोटा-डोर लिये वह बहुत तेज न दौड़ सकता था। फासला दो सौ गज से कम न था। रास्ते में पत्थरों के ढेर टूटे-फूटे पड़े हुए थे। भय होता था कि कहीं ठोकर न लग जाय, कहीं पैर न फिसल जायँ। इधर सवार प्रतिक्षण समीप होते जाते थे। अरबी घोड़ों से उसका मुकाबला ही क्या, उस पर मंजिलों का धावा हुआ। मुश्किल से पचास कदम गया होगा कि सवार उसके सिर पर आ पहुँचे और तुरंत उसे घेर लिया। धर्मदास बड़ा साहसी था; पर मृत्यु को सामने खड़ी देख कर उसकी आँखों में अँधेरा छा गया, उसके हाथ से बंदूक छूट कर गिर पड़ी। पाँचों उसी के गाँव के महसूदी पठान थे। एक पठान ने कहा-उड़ा दो सिर मरदूद का। दग़ाबाज़ काफिर।

दूसरा-नहीं नहीं, ठहरो, अगर यह इस वक्त भी इस्लाम कबूल कर ले, तो हम इसे मुआफ कर सकते हैं। क्यों धर्मदास, तुम्हें इस दग़ा की क्या सजा दी जाय ? हमने तुम्हें रात-भर का वक्त फैसला करने के लिए दिया था। मगर तुम इसी वक्त जहन्नुम पहुँचा दिये जाओ; लेकिन हम तुम्हें फिर मौका देते हैं। यह आखिरी मौका है। अगर तुमने अब भी इस्लाम न कबूल किया, तो तुम्हें दिन की रोशनी देखनी नसीब न होगी।

धर्मदास ने हिचकिचाते हुए कहा-जिस बात को अक्ल नहीं मानती, उसे कैसे …
पहले सवार ने आवेश में आकर कहा-मजहब को अक्ल से कोई वास्ता नहीं।
तीसरा-कुफ्र है ! कुफ्र है !

पहला- उड़ा दो सिर मरदूद का, धुआँ इस पार।
दूसरा-ठहरो-ठहरो, मार डालना मुश्किल नहीं, जिला लेना मुश्किल है। तुम्हारे और साथी कहाँ हैं धर्मदास ?
धर्मदास-सब मेरे साथ ही हैं।

दूसरा-कलामे शरीफ़ की कसम; अगर तुम सब खुदा और उनके रसूल पर ईमान लाओ, तो कोई तुम्हें तेज निगाहों से देख भी न सकेगा।
धर्मदास-आप लोग सोचने के लिए और कुछ मौका न देंगे।
इस पर चारों सवार चिल्ला उठे-नहीं, नहीं, हम तुम्हें न जाने देंगे, यह आखिरी मौका है।
इतना कहते ही पहले सवार ने बंदूक छतिया ली और नली धर्मदास की छाती की ओर करके बोला-बस बोलो, क्या मंजूर है ?

धर्मदास सिर से पैर तक काँप कर बोला-अगर मैं इस्लाम कबूल कर लूँ तो मेरे साथियों को तो कोई तकलीफ न दी जायेगी ?
दूसरा-हाँ, अगर तुम जमानत करो कि वे भी इस्लाम कबूल कर लेंगे।
पहला-हम इस शर्त को नहीं मानते। तुम्हारे साथियों से हम खुद निपट लेंगे। तुम अपनी कहो। क्या चाहते हो ? हाँ या नहीं ?
धर्मदास ने जहर का घूँट पी कर कहा-मैं खुदा पर ईमान लाता हूँ।
पाँचों ने एक स्वर से कहा-अलहमद व लिल्लाह ! और बारी-बारी से धर्मदास को गले लगाया।
श्यामा हृदय को दोनों हाथों से थामे यह दृश्य देख रही थी। वह मन में पछता रही थी कि मैंने क्यों इन्हें पानी लाने भेजा ? अगर मालूम होता कि विधि यों धोखा देगा, तो मैं प्यासों मर जाती, पर इन्हें न जाने देती। श्यामा से कुछ दूर ख़ज़ाँचंद भी खड़ा था। श्यामा ने उसकी ओर क्षुब्ध नेत्रों से देख कर कहा- अब इनकी जान बचती नहीं मालूम होती।

ख़ज़ाँचंद-बंदूक भी हाथ से छूट पड़ी है।
श्यामा-न जाने क्या बातें हो रही हैं। अरे गजब ! दुष्ट ने उनकी ओर बंदूक तानी है !
ख़ज़ाँ.-जरा और समीप आ जायँ, तो मैं बंदूक चलाऊँ। इतनी दूर की मार इसमें नहीं है।
श्यामा-अरे ! देखो, वे सब धर्मदास को गले लगा रहे हैं। यह माजरा क्या है ?
ख़ज़ाँ.-कुछ समझ में नहीं आता।
श्यामा-कहीं इसने कलमा तो नहीं पढ़ लिया ?
ख़ज़ाँ.-नहीं, ऐसा क्या होगा, धर्मदास से मुझे ऐसी आशा नहीं है।
श्यामा-मैं समझ गयी। ठीक यही बात है। बंदूक चलाओ।
ख़ज़ाँ.-धर्मदास बीच में हैं। कहीं उन्हें न लग जाय।
श्यामा-कोई हर्ज नहीं। मैं चाहती हूँ, पहला निशाना धर्मदास ही पर पड़े। कायर ! निर्लज्ज ! प्राणों के लिए धर्म त्याग किया। ऐसी बेहयाई की जिंदगी से मर जाना कहीं अच्छा है। क्या सोचते हो। क्या तुम्हारे भी हाथ-पाँव फूल गये। लाओ, बंदूक मुझे दे दो। मैं इस कायर को अपने हाथों से मारूँगी।
ख़ज़ाँ.-मुझे तो विश्वास नहीं होता कि धर्मदास …

श्यामा-तुम्हें कभी विश्वास न आयेगा। लाओ, बंदूक मुझे दो। खडे़ क्या ताकते हो ? क्या जब वे सिर पर आ जायँगे, तब बंदूक चलाओ? क्या तुम्हें भी यह मंजूर है कि मुसलमान हो कर जान बचाओ ? अच्छी बात है, जाओ। श्यामा अपनी रक्षा आप कर सकती है; मगर उसे अब मुँह न दिखाना।

ख़ज़ाँचंद ने बंदूक चलायी। एक सवार की पगड़ी को उड़ाती हुई निकल गयी। जिहादियों ने ‘अल्लाहो अकबर !’ की हाँक लगायी। दूसरी गोली चली और घोड़े की छाती पर बैठी। घोड़ा वहीं गिर पड़ा। जिहादियों ने फिर ‘अल्लाहो अकबर !’ की सदा लगायी और आगे बढ़े। तीसरी गोली आयी। एक पठान लोट गया; पर इसके पहले कि चौथी गोली छूटे, पठान ख़ज़ाँचंद के सिर पर पहुँच गये और बंदूक उसके हाथ से छीन ली।

एक सवार ने ख़ज़ाँचंद की ओर बंदूक तान कर कहा-उड़ा दूँ सिर मरदूद का, इससे खून का बदला लेना है।
दूसरे सवार ने जो इनका सरदार मालूम होता था, कहा-नहीं-नहीं, यह दिलेर आदमी है। ख़ज़ाँचंद, तुम्हारे ऊपर दगा, खून और कुफ्र, ये तीन इल्ज़ाम हैं, और तुम्हें कत्ल कर देना ऐन सवाब है, लेकिन हम तुम्हें एक मौका और देते हैं। अगर तुम अब भी खुदा और रसूल पर ईमान लाओ, तो हम तुम्हें सीने से लगाने को तैयार हैं। इसके सिवा तुम्हारे गुनाहों का और कोई कफारा (प्रायश्चित्त) नहीं है। यह हमारा आखिरी फैसला है। बोलो, क्या मंजूर है ?
चारों पठानों ने कमर से तलवारें निकाल लीं, और उन्हें ख़ज़ाँचंद के सिर पर तान दिया मानो ‘नहीं’ का शब्द मुँह से निकलते ही चारों तलवारें उसकी गर्दन पर चल जायँगी !

ख़ज़ाँचंद का मुखमंडल विलक्षण तेज से आलोकित हो उठा। उसकी दोनों आँखें स्वर्गीय ज्योति से चमकने लगीं। दृढ़ता से बोला-तुम एक हिन्दू से यह प्रश्न कर रहे हो ? क्या तुम समझते हो कि जान के खौफ से वह अपना ईमान बेच डालेगा ? हिंदू को अपने ईश्वर तक पहुँचने के लिए किसी नबी, वली या पैगम्बर की जरूरत नहीं ! चारों पठानों ने कहा-काफिर ! काफिर !

ख़ज़ाँ.-अगर तुम मुझे काफिर समझते हो तो समझो। मैं अपने को तुमसे ज्यादा खुदापरस्त समझता हूँ। मैं उस धर्म को मानता हूँ, जिसकी बुनियाद अक्ल पर है। आदमी में अक्ल ही खुदा का नूर (प्रकाश) है और हमारा ईमान हमारी अक्ल …

चारों पठानों के मुँह से निकला ‘काफिर ! काफिर !’ और चारों तलवारें एक साथ ख़ज़ाँचंद की गर्दन पर गिर पड़ीं। लाश जमीन पर फड़कने लगी। धर्मदास सिर झुकाये खड़ा रहा। वह दिल में खुश था कि अब ख़ज़ाँचंद की सारी सम्पत्ति उसके हाथ लगेगी और वह श्यामा के साथ सुख से रहेगा; पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था। श्यामा अब तक मर्माहत-सी खड़ी यह दृश्य देख रही थी। ज्यों ही ख़ज़ाँचंद की लाश जमीन पर गिरी, वह झपट कर लाश के पास आयी और उसे गोद में लेकर आँचल से रक्त-प्रवाह को रोकने की चेष्टा करने लगी। उसके सारे कपड़े खून से तर हो गये। उसने बड़ी सुंदर बेल-बूटोंवाली साड़ियाँ पहनी होंगी, पर इस रक्त-रंजित साड़ी की शोभा अतुलनीय थी। बेल-बूटोंवाली साड़ियाँ रूप की शोभा बढ़ाती थीं, यह रक्त-रंजित साड़ी आत्मा की छवि दिखा रही थी।
ऐसा जान पड़ा मानो ख़ज़ाँचंद की बुझती आँखें एक अलौकिक ज्योति से प्रकाशमान हो गयी हैं। उन नेत्रों में कितना संतोष, कितनी तृप्ति, कितनी उत्कंठा भरी हुई थी। जीवन में जिसने प्रेम की भिक्षा भी न पायी, वह मरने पर उत्सर्ग जैसे स्वर्गीय रत्न का स्वामी बना हुआ था।

धर्मदास ने श्यामा का हाथ पकड़ कर कहा-श्यामा, होश में आओ, तुम्हारे सारे कपड़े खून से तर हो गये हैं। अब रोने से क्या हासिल होगा ? ये लोग हमारे मित्र हैं, हमें कोई कष्ट न देंगे। हम फिर अपने घर चलेंगे और जीवन के सुख भोगेंगे ?

श्यामा ने तिरस्कारपूर्ण नेत्रों से देख कर कहा-तुम्हें अपना घर बहुत प्यारा है, तो जाओ। मेरी चिंता मत करो, मैं अब न जाऊँगी। हाँ, अगर अब भी मुझसे कुछ प्रेम हो तो इन लोगों से इन्हीं तलवारों से मेरा भी अंत करा दो।

धर्मदास करुणा-कातर स्वर से बोला-श्यामा, यह तुम क्या कहती हो, तुम भूल गयीं कि हमसे-तुमसे क्या बातें हुई थीं ? मुझे खुद ख़ज़ाँचंद के मारे जाने का शोक है; पर भावी को कौन टाल सकता है ?

श्यामा-अगर यह भावी थी, तो यह भी भावी है कि मैं अपना अधम जीवन उस पवित्र आत्मा के शोक में काटूँ, जिसका मैंने सदैव निरादर किया। यह कहते-कहते श्यामा का शोकोद्गार, जो अब तक क्रोध और घृणा के नीचे दबा हुआ था, उबल पड़ा और वह ख़ज़ाँचंद के निस्पंद हाथों को अपने गले में डाल कर रोने लगी।

चारों पठान यह अलौकिक अनुराग और आत्म-समर्पण देख कर करुणार्द्र हो गये। सरदार ने धर्मदास से कहा-तुम इस पाकीजा खातून से कहो, हमारे साथ चले। हमारी जाति से इसे कोई तकलीफ न होगी। हम इसकी दिल से इज्जत करेंगे।

धर्मदास के हृदय में ईर्ष्या की आग धधक रही थी। वह रमणी, जिसे वह अपनी समझे बैठा था, इस वक्त उसका मुँह भी नहीं देखना चाहती थी। बोला-श्यामा, तुम चाहो इस लाश पर आँसुओं की नदी बहा दो, पर यह जिंदा न होगी। यहाँ से चलने की तैयारी करो। मैं साथ के और लोगों को भी जा कर समझाता हूँ। खान लोेग हमारी रक्षा करने का जिम्मा ले रहे हैं। हमारी जायदाद, जमीन, दौलत सब हमको मिल जायगी। ख़ज़ाँचंद की दोैलत के भी हमीं मालिक होंगे। अब देर न करो। रोने-धोने से अब कुछ हासिल नहीं।

श्यामा ने धर्मदास को आग्नेय नेत्रों से देख कर कहा-और इस वापसी की कीमत क्या देनी होगी ? वही जो तुमने दी है?

धर्मदास यह व्यंग्य न समझ सका। बोला-मैंने तो कोई कीमत नहीं दी। मेरे पास था ही क्या ?

श्यामा-ऐसा न कहो। तुम्हारे पास वह खजाना था, जो तुम्हें आज कई लाख वर्ष हुए ऋषियों ने प्रदान किया था। जिसकी रक्षा रघु और मनु, राम और कृष्ण, बुद्ध और शंकर, शिवाजी और गोविंदसिंह ने की थी। उस अमूल्य भंडार को आज तुमने तुच्छ प्राणों के लिए खो दिया। इन पाँवों पर लोटना तुम्हें मुबारक हो! तुम शौक से जाओ। जिन तलवारों ने वीर ख़ज़ाँचंद के जीवन का अंत किया, उन्होंने मेरे प्रेम का भी फैसला कर दिया। जीवन में इस वीरात्मा का मैंने जो निरादर और अपमान किया, इसके साथ जो उदासीनता दिखायी उसका अब मरने के बाद प्रायश्चित्त करूँगी। यह धर्म पर मरने वाला वीर था, धर्म को बेचनेवाला कायर नहीं ! अगर तुममें अब भी कुछ शर्म और हया है, तो इसका क्रिया-कर्म करने में मेरी मदद करो और यदि तुम्हारे स्वामियों को यह भी पसंद न हो, तो रहने दो, मैं सब कुछ कर लूँगी।

पठानों के हृदय दर्द से तड़प उठे। धर्मान्धता का प्रकोप शांत हो गया। देखते-देखते वहाँ लकड़ियों का ढेर लग गया। धर्मदास ग्लानि से सिर झुकाये बैठा था और चारों पठान लकड़ियाँ काट रहे थे। चिता तैयार हुई और जिन निर्दय हाथों ने ख़ज़ाँचंद की जान ली थी उन्हीं ने उसके शव को चिता पर रखा। ज्वाला प्रचंड हुई। अग्निदेव अपने अग्निमुख से उस धर्मवीर का यश गा रहे थे।

पठानों ने ख़ज़ाँचंद की सारी जंगम सम्पत्ति ला कर श्यामा को दे दी। श्यामा ने वहीं पर एक छोटा-सा मकान बनवाया और वीर ख़ज़ाँचंद की उपासना में जीवन के दिन काटने लगी। उसकी वृद्धा बुआ तो उसके साथ रह गयी, और सब लोग पठानों के साथ लौट गये, क्योंकि अब मुसलमान होने की शर्त न थी। ख़ज़ाँचंद के बलिदान ने धर्म के भूत को परास्त कर दिया। मगर धर्मदास को पठानों ने इस्लाम की दीक्षा लेने पर मजबूर किया। एक दिन नियत किया गया। मसजिद में मुल्लाओं का मेला लगा और लोग धर्मदास को उसके घर से बुलाने आये; पर उसका वहाँ पता न था। चारों तरफ तलाश हुई। कहीं निशान न मिला।

साल-भर गुजर गया। संध्या का समय था। श्यामा अपने झोंपड़े के सामने बैठी भविष्य की मधुर कल्पनाओं में मग्न थी। अतीत उसके लिए दुःख से भरा हुआ था। वर्तमान केवल एक निराशामय स्वप्न था। सारी अभिलाषाएँ भविष्य पर अवलम्बित थीं। और भविष्य भी वह, जिसका इस जीवन से कोई सम्बन्ध न था ! आकाश पर लालिमा छायी हुई थी। सामने की पर्वतमाला स्वर्णमयी शांति के आवरण से ढकी हुई थी। वृक्षों की काँपती हुई पत्तियों से सरसराहट की आवाज निकल रही थी, मानो कोई वियोगी आत्मा पत्तियों पर बैठी हुई सिसकियाँ भर रही हो।

उसी वक्त एक भिखारी फटे हुए कपड़े पहने झोंपड़ी के सामने खड़ा हो गया। कुत्ता जोर से भूँक उठा। श्यामा ने चौंक कर देखा और चिल्ला उठी-धर्मदास !

धर्मदास ने वहीं जमीन पर बैठते हुए कहा-हाँ श्यामा, मैं अभागा धर्मदास ही हूँ। साल-भर से मारा-मारा फिर रहा हूँ। मुझे खोज निकालने के लिए इनाम रख दिया गया है। सारा प्रांत मेरे पीछे पड़ा हुआ है। इस जीवन से अब ऊब उठा हूँ; पर मौत भी नहीं आती।

धर्मदास एक क्षण के लिए चुप हो गया। फिर बोला-क्यों श्यामा, क्या अभी तुम्हारा हृदय मेरी तरफ से साफ नहीं हुआ! तुमने मेरा अपराध क्षमा नहीं किया !
श्यामा ने उदासीन भाव से कहा-मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझी।
‘मैं अब भी हिंदू हूँ। मैंने इस्लाम नहीं कबूल किया है।’
‘जानती हूँ !’
‘यह जान कर भी तुम्हें मुझ पर दया नहीं आती !’

श्यामा ने कठोर नेत्रों से देखा और उत्तेजित होकर बोली-तुम्हें अपने मुँह से ऐसी बातें निकालते शर्म नहीं आती ! मैं उस धर्मवीर की ब्याहता हूँ, जिसने हिंदू-जाति का मुख उज्ज्वल किया है। तुम समझते हो कि वह मर गया ! यह तुम्हारा भ्रम है। वह अमर है। मैं इस समय भी उसे स्वर्ग में बैठा देख रही हूँ। तुमने हिंदू-जाति को कलंकित किया है। मेरे सामने से दूर हो जाओ।

धर्मदास ने कुछ जवाब न दिया ! चुपके से उठा, एक लम्बी साँस ली और एक तरफ चल दिया।
प्रातःकाल श्यामा पानी भरने जा रही थी, तब उसने रास्ते में एक लाश पड़ी हुई देखी। दो-चार गिद्ध उस पर मँडरा रहे थे। उसका हृदय धड़कने लगा। समीप जा कर देखा और पहचान गयी। यह धर्मदास की लाश थी।

पिछले 45 दिनों में उजागर हुई केजरीवाल और उसकी सरकार की इस जानलेवा निकम्मेपन हरामखोरी मक्कारी की कोई चर्चा किसी मीडिया में क्या सुनी आपने.?

पिछले 45 दिनों में उजागर हुई केजरीवाल और उसकी सरकार की इस जानलेवा निकम्मेपन हरामखोरी मक्कारी की कोई चर्चा किसी मीडिया में क्या सुनी आपने.?

ध्यान से पूरा पढ़िए तो चौंक जाएंगे आप.
——————————
याद करिए कि पिछले महीने 10 जून को जब दिल्ली में एक्टिव कोरोना संक्रमितों की संख्या 19581 तथा कुल संक्रमितों की संख्या 32810 थी और 984 मौतें हो चुकी थीं. उस समय दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री सिसोदिया की जोड़ी ने 15 जुलाई तक दिल्ली में कोरोना संक्रमितों की संख्या सवा दो से ढाई लाख तक पहुंचने और 30 जुलाई तक पांच से साढ़े पांच लाख तक पहुंचने की भयानक भविष्यवाणी कर के दिल्ली की जनता को बुरी तरह भयभीत कर दिया था. दोनों की जोड़ी ने यह ऐलान भी किया था कि 15 जुलाई तक दिल्ली में कोरोना संक्रमितों के लिए 33 हज़ार और 30 जुलाई तक 80 हजार बेड की आवश्यकता होगी. उनकी उस घोषणा का सीधा अर्थ यह था कि दिल्ली में कोरोना वायरस से गम्भीर रूप से संक्रमित एक्टिव मरीजों की संख्या 15 जुलाई तक कम से कम 33 हज़ार तथा 30 जुलाई तक कम से कम 80 हजार हो जाएगी.
“हमने चेतावनी दे दी, हमारे बस में अब कुछ नहीं, अब तुम जानो तुम्हारा काम जाने” वाले अंदाज में उपरोक्त घोषणा करते समय भी केजरीवाल और सिसोदिया की जोड़ी ने कोरोना संक्रमण के खिलाफ़ अपनी सरकार की कोई कार्ययोजना प्रस्तुत नहीं की थी. जबकि उससे पहले तक केजरीवाल और सिसोदिया की यही जोड़ी अफलातूनी दावे कर के दिल्ली की आंखों में धूल झोंकने में जुटी हुई थी. दरअसल केजरीवाल सिसोदिया की जोड़ी के पास ऐसी कोई कार्ययोजना कभी थी ही नहीं. अतः 10 जून को दिल्ली की जनता को बुरी तरह भयभीत करने वाली भविष्यवाणी करने के बाद यह जोड़ी मदद मांगने प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के पास पहुंची थी. परिणामस्वरुप दिल्ली में कोरोंना संक्रमण पर नियन्त्रण की कमान 15 जून से गृहमंत्री अमित शाह ने सम्भाल ली थी. और उसी दिन कोरोना संक्रमितों की सर्वाधिक संख्या वाले LNJP अस्पताल का जायजा लेने वहाँ पहुंच गए थे. जबकि केजरीवाल और सिसोदिया की जोड़ी LNJP तो छोड़िए, दिल्ली में कोरोना संक्रमितों के किसी अस्पताल में तब तक गए ही नहीं थे. सारा काम न्यूजचैनलों और अखबारों में विज्ञापनों से चल रहा था. 15 जून से गृहमंत्री अमित शाह ने जब कमान सम्भाली थी उस समय दिल्ली में एक्टिव कोरोना संक्रमितों की संख्या 25002 थी. और कुल कोरोना संक्रमितों की संख्या 42829 थी. और 1400 लोगों की मृत्यु हो चुकी थी.
अब यह भी जानिए कि स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा आज जारी आंकड़ों के अनुसार के अनुसार दिल्ली में आज सवेरे तक एक्टिव कोरोना संक्रमितों की संख्या 80 हजार नहीं बल्कि 10770 है. इनमें से भी लगभग 6 हजार संक्रमितों का संक्रमण इतना समान्य स्तर का है कि उन्हें घर में ही क्वारेंटाईन के लिए कहा गया है. अर्थात्‌ मात्र लगभग 5 हजार संक्रमितों के लिए अस्पतालों में बेड की आवश्यकता पड़ी है. जबकि केजरीवाल ने 30 जुलाई तक 80 हजार बेड की जरूरत पड़ने का दावा किया था.
बीती 15 जुलाई को भी दिल्ली में एक्टिव कोरोना संक्रमितों की संख्या 17807 थी. जिनमें से लगभग 9 हजार लोगों का संक्रमण इतना समान्य स्तर का था कि उन्हें घर में ही क्वारेंटाईन के लिए कहा गया था. जबकि केजरीवाल ने 15 जुलाई तक 33 हजार बेड की जरूरत पड़ने का दावा किया था.
लेकिन पिछले 45 दिनों के दौरान गृहमंत्री अमित शाह को किसी न्यूजचैनल पर आकर या प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के अपनी इस उपलब्धि का ढोल बजाते हुए नहीं देखा गया. दरअसल गम्भीरता से अपना काम करने वाले ऐसे हथकंडों से खुद को बहुत दूर रखते हैं. जबकि इन 45 दिनों के दौरान कभी प्लाजमा बैंक, कभी राशन कार्ड, कभी मुफ्त भोजन सरीखे अपने राजनीतिक पाखंडों के विज्ञापनों के जरिये केजरीवाल मीडिया को मोटी रकम लगातार पहुंचाने में जुटा हुआ था और न्यूज़चैनलों पर आधे से एक घण्टे लम्बे अपने प्रायोजित इंटरव्यू चलवा रहा था. यही कारण है कि आज 30 जुलाई को डंके की चोट पर उजागर हो रही केजरीवाल और उसकी सरकार के जानलेवा निकम्मेपन हरामखोरी मक्कारी की कोई चर्चा किसी अखबार या न्यूजचैनल में नहीं हुई है. होगी भी नहीं. हद तो यह है कि केजरीवाल सरकार के विज्ञापनों के बोझ से दबे ये न्यूजचैनल गृहमंत्री अमित शाह की सफ़लता का भी कोई उल्लेख नहीं कर रहे.

आज देश में भी कोरोंना संक्रमण की जो स्थिति है उसमें एक्टिव कोरोना संक्रमितों के 52% (302,009) मामले महाराष्ट्र बंगाल तमिलनाडु तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में हैं. शेष 48% एक्टिव कोरोना संक्रमित देश के 21 अन्य राज्यों और 9 “केन्द्र शासित प्रदेशों में हैं.
देश में कोरोना संक्रमण के कारण अबतक हुई 34968 मौतों में से 61% (21399) मौतें भी केवल इन्हीं 5 राज्यों में हुईं हैं.
ध्यान रहे कि महाराष्ट्र बंगाल तमिलनाडु तेलंगाना और आंध्रप्रदेश, ये पांचों राज्य केन्द्र सरकार विशेषकर गृहमंत्रालय के हर निर्देश हर सलाह को नहीं मानने के लिए कुख्यात हैं. इसका परिणाम वहां की जनता भोग रही है.
बहानों की बैसाखियों के सहारे न्यूजचैनलों पर मटकने चमकने वाले टोपीबाज केजरीवाल तथा चुनौतियों को स्वीकारने और उनसे सीधे टकराने वाले अमित शाह सरीखे राजनेता में क्या अन्तर होता है, आज 30 जुलाई को यह सच दिल्ली में कोरोना संक्रमण की स्थिति बता रही है.

क्या हैं:-Rafale Deal

Rafale Deal से सम्बंधित प्रश्नों के उत्तर जानने हों तो धैर्य से पूरा पढ़ें !

: क्या है Government to Government डील ?

अक्सर कोई भी देश किसी दूसरे देश से जब भी कोई रक्षा क्षेत्र में सौदा करता है तो दूसरा देश सिर्फ अनुमति देता है और फिर डील उस Defence कंपनी के साथ होती है। Defence Deals में हमेशा से बिचौलियों या डीलर्स का रोल रहा है। ज्ञात हो कि ‘Rafale Deal’ में कोई बिचौलिया या डीलर नही है, ये डील डायरेक्ट India की सरकार और France की सरकार के बीच हुई है, अर्थात ट्रेज़री से पैसा सीधे फ्रांस सरकार की ट्रेज़री में जायेगा।

क्या होता है Availability Rate ?

जब कोई देश लड़ाकू जहाज़ खरीदता है तो उसमें एक सबसे प्रमुख फैक्टर होता है Availability Rate का, भारत अभी तक सिर्फ 45% अवेलेबिलिटी रेट पर लड़ाकू जहाजों के कॉन्ट्रैक्ट साइन करता रहा है। 45% Availability Rate का अर्थ ये है कि यदि 100 लड़ाकू ज़हाज़ खरीदे गए तो उनमें से सिर्फ 45 जेट्स ही किसी भी समय युद्ध के लिए उपलब्ध अथवा तैयार होने की गारंटी है। Rafale Deal में अवेलेबिलिटी रेट 75% है। इसके लिए 300 मिलियन यूरो अतिरिक्त खर्च किया गया है।

क्या होता है Weapon Package ?

Fighter Jets की खरीद में अक्सर हथियारों को सम्मिलित नही किया जाता, अभी तक हथियार बाद में अलग से खरीदे जाते रहे हैं। Rafale Deal में भारतवर्ष ने पूरा Weapon Package लिया है। MTCR का मेंबर होने के चलते 560 किलोमीटर दूरी तक प्रहार करने वाली ‘SKALP’ मिसाइल खरीदी हैं, इसके अलावा 150 km तक हवा से हवा में प्रहार करने वाली ‘Meteor’ मिसाइल भी खरीदी गई हैं। 36 Rafale जहाजों में जितने भी Missile, Bombs या Rockets इत्यादि लगेंगे वो डील के साथ खरीदे गए हैं। इसके अतिरिक्त हथियारों के लिए स्टोरेज फैसिलिटी भी बनाएगा फ्रांस।

Rafale Deal में क्या है India Specific चेंज ?

ये एक प्रमुख फैक्टर है जिसके बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नही है। IAF ने Rafale लड़ाकू जेट्स में कुछ बदलाव करवाये हैं और कुछ अतिरिक्त इक्विपमेंट्स को शामिल किया है जिनमें Helmet Sights, Radar Receiver, Radio Altimeter, Doppler राडार, Cold Start इत्यादि शामिल हैं, इनसे Rafale की मारक क्षमता में और भी ज्यादा बढ़ोत्तरी हो गई है। इनके लिए 1.7 बिलियन यूरो अतिरिक्त खर्च किया गया है।

या 126 के बदले सिर्फ 36 जहाज़ खरीदे मोदी सरकार ने ?

जी नहीं ऐसा बिलकुल नहीं है, 36 लड़ाकू जहाज़ तो डायरेक्ट खरीद लिए गए हैं जो की फ्लाई-अवे कंडीशन में आएंगे और इसके अतिरिक्त 110 लड़ाकू जहाज़ों का अलग टेंडर और जारी कर दिया गया है जो की भारत में ‘Make In India’ के अंतर्गत निमित होंगे अर्थात अब 126 के बदले कुल 146 लड़ाकू जहाज़ भारतीय वायुसेना के लिए खरीदे जायेंगे और CAG की रिपोर्ट में ये स्पष्ट हो गया है की ये 36 जेट्स पहले की तुलना में कम समय में भारतीय वायुसेना में शामिल हो जायेंगे।

क्या होता है Offset ?

जब हम Offset बोलते है तो Obligation शब्द छोड़ देते हैं, पूरा शब्द है ‘Offset Obligation’. यहां पर ये एकदम स्पष्ट होना चाहिए कि 59,000 करोड़ की Rafale Deal में 50% ओफ़्सेट का अर्थ ये बिल्कुल नही है कि 59,000 करोड़ में से 30,000 करोड वापस आ जायेगा। बल्कि Offset का अर्थ ये है कि France भारत की कंपनियों के साथ 30,000 करोड़ रुपये तक का निवेश करेगा वो भी अगले 5 से 10 सालों में। ऐसी 100 से ज्यादा अलग अलग जॉइंट कंपनियां बनाई जाएंगी। UPA की MMRCA में सिर्फ 30% Offset का प्रावधान था अभी NDA की Rafale Deal में 50% का ओफ़्सेट Obligation हो रहा है।

क्यों ज़रूरी होता है Maintenance ?

करोड़ों रुपये का Fighter Jet क्रैश कर सकता है अगर एक छोटे से छोटा Part भी ख़राब हो तो, NDA सरकार ने जो Rafale डील साइन की है उसमें मेंटेनेंस का प्रोविज़न भी रक्खा गया है, अतिरिक्त Spare Parts खरीदे गए हैं ! भारत में Rafale के स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता सुनिश्चित कराएगा France, इसके लिए 1.8 बिलियन यूरो की अतिरिक्त रकम खर्च की गई है।

क्या है Offset और HAL तथा Reliance का द्वंद ?

France जो Offset Obligation के वादे के अनुरूप 30,000 करोड़ रुपये भारत की 100 अलग अलग कंपनियों के साथ इन्वेस्ट करेगा Reliance-Dassault का वेंचर भी उनमें से एक है। इस वेंचर के हिस्से में 850 करोड़ रुपये का इन्वेस्टमेंट होगा जिसमें Reliance के हिस्से का इन्वेस्टमेंट मात्र 426 करोड़ रुपये है, न कि पूरा का पूरा 30,000 करोड़। इसके अलावा पुराने एग्रीमेंट के अनुसार France की कंपनी भारत की किसी भी कंपनी के साथ Offset साझा करने के लिए स्वतंत्र है, और इन 100 वेंचर्स में से फिलहाल कोई भी Rafale के पार्ट्स नही बनाएगा। HAL ने स्पष्ट कर दिया है की वो ओफ़्सेट में डील नही करता।

Rafale Deal पर क्या कह रहा SC और CAG का रुख ?

Rafale डील को लेकर SC में सुनवाई हुई, सारे दस्तावेज़ देखने के बाद SC ने ये बिलकुल स्पष्ट कर दिया की Rafale डील की खरीद की प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी नहीं है हलाकि SC ने Rafale डील के दामों और उसकी टेक्निकल बातों पर प्रक्रिया देने से मना कर दिया, बाद में CAG की रिपोर्ट भी सामने आ गई जिसमें राफेल डील को क्लीन चिट मिल गई और ये स्पष्ट हो गया की NDA सरकार की राफेल डील UPA सरकार की MMRCA डील से सस्ती और बेहतर है। 2019 में SC ने पुनर्विचार याचिकाओं को भी रद्द कर दिया और 2018 का जजमेंट मान्य रखते हुए मोदी सरकार को ‘Rafale Deal’ में क्लीन चिट दे दी।

क्या है MMRCA डील का इतिहास ?

कारगिल युद्ध से अनुभव लेते हुए भारतीय वायुसेना ने 2001 में तत्कालीन एनडीए सरकार के समक्ष पुराने Mig-21 जहाज़ों को बदलने करने के लिए 126 नए लड़ाकू जहाज़ों की आवश्यकता का प्रस्ताव रखा था, जिस पर चर्चा की गई और 2004 में NDA सरकार ने RFI जारी कर दी। 2004 में सरकार बदलने के बाद 2007 में RFP जारी करि गई, टेक्निकल डिसकशंस चालू हुए और 2010 तक चले, 2011 में Rafale को सेलेक्ट कर लिया गया। टेंडर जारी हुआ और 2012 में Rafale लोवेस्ट बिडर के रूप में सेलेक्ट हुआ।

: क्यों नहीं हो पाई थी 126 लड़ाकू जहाजों की MMRCA डील ?

2004 से 2012 तक 126 Rafale लड़ाकू जहाज़ों कि अनुमानित कीमत $ 20 Bn से $ 25 Bn तक हो गई थी, सबसे प्रमुख बात कि Dassault कंपनी जो Rafale बनाती है उसने क्वालिटी कि गारंटी के चलते HAL के साथ मिलकर जहाज़ निर्मित करने से मन कर दिया था, 2014 तक तो आते आते तत्कालीन रक्षा मंत्री A. K. Antony ने मीडिया के समक्ष प्रेस कांफ्रेंस करके साफ़ साफ़ बोल दिया था कि UPA सरकार के पास भारतीय वायुसेना के लिए 126 रफले जहाज़ खरीदने के पैसे नहीं हैं। कुल मिलकर 10 सालों में न तो दाम तय हो पाए थे और न ही टर्म्स एंड कंडीशन।

क्या है Rafale Deal की फाइल चोरी होने की कहानी ?

Rafale Deal की कोई फाइल गायब नहीं हुई है बल्कि वो डॉक्यूमेंट जिसकी फोटोकॉपी को Crop करके कुछ दिन पहले The Hindu ने ब्लॉग छापा था और फिर Rahul Gandhi ने हंगामा किया था, वो दरअसल Defence मिनिस्ट्री से किसी ने चुरा कर फोटोकॉपी करके उन्हें उपलब्ध कराया था। हालांकि उन डाक्यूमेंट्स में कुछ विशेष नही है सिर्फ इस बात को छोड़कर की Modi सरकार Rafale Deal पर डिफेंस मिनिस्ट्री के द्वारा हो रही प्रोसीडिंग्स पर नज़र रखे हुए थी।

RafaleDeal

विचार धारा स्पष्ट होनी चाहिए

विचार धारा स्पष्ट होनी चाहिए

मैं गोली चलाने का आदेश नहीं दूँगा – नहीं दूँगा , सरकार जानी है तो जाए।

ऐसे थे हमारे कल्याण सिंह। आज जब राम मंदिर के शिलान्यास की तारीख की घोषणा हुई तो आपकी याद आ गयी ,

6 दिसंबर, 1992 की दोपहर कल्याण सिंह अपने निवास स्थान 5 कालिदास मार्ग पर अपने दो मंत्रिमंडलीय सहयोगियों लालजी टंडन और ओमप्रकाश सिंह के साथ एक टेलिविजन के सामने बैठे हुए थे.

मुख्यमंत्री के कमरे के बाहर उनके प्रधान सचिव योगेंद्र नारायण भी मौजूद थे. वहाँ मौजूद सब लोगों को भोजन परोसा जा रहा था. अचानक सबने देखा कि कई कार सेवक बाबरी मस्जिद के गुंबद पर चढ़ गए और कुदालों से उसे तोड़ने लगे.

हांलाकि वहाँ पर्याप्त संख्या में अर्ध सैनिक बल तैनात थे, लेकिन कारसेवकों ने उनके और बाबरी मस्जिद के बीच एक घेरा सा बना दिया था, ताकि वो वहाँ तक पहुंच न पाएं.

उस समय कल्याण सिंह के प्रधान सचिव रहे योगेंद्र नारायण बताते हैं, ‘तभी उस समय उत्तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक एस एम त्रिपाठी भागते हुए आए और उन्होंने मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से तुरंत मिलने की अनुमति मांगी. जब मैंने अंदर संदेश भिजवाया तो मुख्यमंत्री ने उन्हें भोजन समाप्त होने तक इंतज़ार करने के लिए कहा.’

वो कहते हैं, ‘थोड़ी देर बाद जब त्रिपाठी अंदर गए तो उन्होंने उन्हें देखते ही कार सेवकों पर गोली चलाने की अनुमति मांगी, ताकि बाबरी मस्जिद को गिरने से बचाया जा सके. कल्याण सिंह ने मेरे सामने उनसे पूछा कि अगर गोली चलाई जाती है तो क्या बहुत से कार सेवक मारे जाएंगे?

त्रिपाठी ने जवाब दिया, ‘जी हाँ बहुत से लोग मरेंगे.’

कल्याण सिंह ने तब उनसे कहा कि ‘मैं आपको गोली चलाने की अनुमति नहीं दूंगा. आप दूसरे माध्यमों जैसे लाठीचार्ज या आँसू गैस से हालात पर नियंत्रण करने की कोशिश करिए.’

योगेंद्र नारायण आगे कहते हैं, ‘डीजीपी ये सुन कर वापस अपने दफ़्तर लौट गए. (शायद DGP ने उनके हृदय की आवाज सुन ली थी )जैसे ही बाबरी मस्जिद की आखिरी ईंट गिरी, कल्याण सिंह ने अपना राइटिंग पैड मंगवाया और अपने हाथों से अपना त्याग पत्र लिखा और उसे ले कर खुद राज्यपाल के यहाँ पहुंच गए.’ और राम के नाम सरकार कुर्बान कर दी।

विचारोंकीप्रयोगशाला

#विभाजक_रेखा_स्पष्ट_होनी_चाहिए

वो काम तब तक पूरा नहीं होता जब तक उस काम को करने वाली टीम के सभी सदश्यो का उद्देश्य एक न हो |

राम मंदिर बनाने में इतना समय क्यों लगा ? आप पहले किसी भी हिन्दू से बात करते तो १०० में से 95 कहते की राम मंदिर बनना चाहिए , पर उन 95 में से कुछ समाजवादी पार्टी को वोट देते , कुछ कांग्रेस को , कुछ बसपा को , तो कुछ किसी और को | और ये सब की सब मंदिर के विरोध वाली ही पार्टिया थी | कौन क्या कह रहा है इस से कोई फर्क नहीं पड़ता फर्क इस से पड़ता है की वो कर क्या रहा है |

भले ही 95% हिन्दू मंदिर के पक्ष में थे पर असल में पक्ष में सिर्फ वोही थे जो बीजेपी के वोटर थे , बाकी तो विरोधी ही थे |

महाभारत में कौरव सेना के पास एसे धुरंधर थे जिनको हराना पांडवो के लिए असंभव था , भीष्म , द्रोणाचार्य जैसो को कोई हरा ही नहीं सकता था | पर फिर भी कौरव हारे क्योकि उनकी टीम के लोगो का उद्देश्य पांडवो को हराना नहीं था , भीष्म उनको हराने के लिए नहीं अपनी प्रतिज्ञा के लिए लड़ रहे थे , दोणाचार्य गरीबे में मिले आश्रय का बोझ उतारने के लिए लड़ रहे थे , कर्ण मित्रता का कर्ज उतारने के लिए |

1857 में देश में अंग्रेजो के खिलाफ क्रांति हुई, ये विफल हुई क्योकि लड़ने वालो का उद्देश्य तो आजादी था ही नहीं | हिन्दू सैनिको ने इसलिए बगावत की क्योकि उन्हें बन्दूक के कारतूस में गौ मॉस से आपात्ति थी , मुसलमान इसलिए लड़े क्योकि उन्हें सूअर की चर्बी के इस्तेमाल से आपत्ति थी | रानी लक्ष्मीबाई इसलिए लड़ी क्योकि अंग्रोजो ने उनके गोद लिए बेटे को मान्यता नहीं दी , अगर वो मिल जाती तो वो नहीं लडती | नाना साहेब इसलिए लड़े क्योंकी अंग्रेजो ने उनकी पेंसन रोक दी थी , जब तक पेंसन मिल रही थी उन्हें कोई तकलीफ नहीं | एसे ही सब लड़ने वालो के अपने अपने उद्देश्य थे लेकिन इनका उद्देश्य अंग्रेजो से आजादी नहीं था | और इसलिए ये क्रांति विफल रही |

गाँधीजी ने अयोग्य नेहरु का साथ दिया , नेताजी शुभाष का विरोध किया , कभी क्रांतिकारियों का साथ नहीं दिया | क्योकि इनका उद्देश्य भी पहले राजनीती थी , आजादी नहीं |

अब एक प्रशन उठाता है की देश तेजी से ग्रोथ क्यों नहीं कर रहा ? तो जवाब वही है टीम के लोगो का उद्देश्य ग्रोथ है ही नहीं , देश के लोगो को उद्देश्य ग्रोथ है ही नहीं |

किस व्यक्ति का क्या एजेंडा है वो उसकी राजनीतिक विचारधरा से समझ आ जाता है | जो caa , 370 हटाने का विरोध करने वाली पार्टी के समर्थक है वो असल में पाकिस्तान का समर्थक है , जो बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को रुकवा देने वाली पार्टी का वोटर है वो देश के विकास के विरोध का भी वोटर है | जो देश को कमजोर डिफेंस देने वाली पार्टी का समर्थक है वो देश का विरोधी भी है |

देश में एसे बहुत से है जो नाम के भारतीय है पर काम से पाकिस्तानी , जो बात करते है विकास की , पर वोट देते है विनाश को | और ये आसानी से उनके राजनीतिक झुकाव को देखकर समझा जा सकता है |

तो जब तक देश की आबादी कौरव सेना की तरह रहेगी देश तरक्की एसी ही करेगा |

Courtesy:#neodeep

विचारोंकीप्रयोगशाला

रक्तबीज

रक्तबीज

रक्तबीज,,,

तुम एक सर काटोगे दस उसकी जगह ले लेंगे,, तुम दस काटोगे,, हजार उठ खड़े होंगे,,,लेकिन रक्तबीज को भी साफ करने के लिए #काली प्रकट भई,,, काली कालरात्रि का प्रतीक हैं,,,इनका काल नजदीक है इसलिए कुलबुलाहट में उल्टी सीधी हरकतें कर रहे हैं,,

कथाबकरियों और मुराड़ी भोपूं के अली मौला के बाद अब अनुष्का शर्मा लेकर आई हैं एक वेबसीरीज #पाताललोक

फ़िल्म की प्रोड्यूसर अनुष्का शर्मा तथा।डायरेक्टर और पटकथा लेखक सुदीप शर्मा हैं
लेकिन फ़िल्म का कंटेंट देखकर लगता है कि वेबसीरीज़ के असली फाइनेंसर शायद #दुबई या #सऊदी अरब से हों

हमारे यहां सावित्री कहते ही माताओं की एक अलग छवि प्रकट होती है मन में,, लेकिन फ़िल्म में #कुतिया का नाम सावित्री रक्खा गया है,,
अप्रत्यक्ष रूप से योगी आदित्यनाथ पर प्रहार किए गए हैं,असल में सबको भनक है कि मोदीजी के बाद #योगीजी ही आने वाले हैं तो जेहादियों में अभी से हाय तौबा मचनी शुरू हो गई है,,

कोर्ट में यह साबित हो जाने के बाद भी कि जुनैद की मौत ट्रेन की सीट के लिए एक झगड़े का परिणाम थी उसमे #गौमांस का एंगल डाल कर लिंचिंग करार दिया जा रहा है फ़िल्म में,,,

अनुष्का जी और सुदीप जी यहीं नहीं रुके बल्कि शुक्ला नामक ब्राह्मण पात्र को दिखा रहे हैं कि वो सेक्स/बलात्कार करते वक्त कान पर जनेऊ चढ़ाता है
मन्दिर के पुजारी और महंत मन्दिर में मांस खा रहे हैं,,

हिन्दू महिला को जब मुस्लिम औरत पानी देती है तो हिन्दू महिला पानी पीने से इनकार कर देती है,,मने इस्लाम प्रेम का मज़हब है सनातन घृणा का,,

हिन्दू भगवान बने पात्र को अपमानजनक तरीके से गिरता हुआ दिखाया जा रहा है,,
सारे दुर्दान्त अपराधी, गुंडे शुक्ला, त्रिवेदी, द्विवेदी और त्यागी दिखाए गए हैं,,मने ब्राह्मण मतलब देश को नष्ट भृष्ट करने वाला समाज,,,

एक मुस्लिम करेक्टर #इमरान भी है,, मोहतरमा उसे निहायत टेलेंटेड पुलिस सब इंस्पेक्टर दिखा रही हैं लेकिन हिन्दू पुलिसकर्मि उस पर छीटा-कशी करते हैं,,

आर्यावर्त नामक देश मे मोमिनों को पानी पीने तक की आज़ादी नहीं है दिखाया गया है
साधु-संत माँ-बहन की गालियां बकते दिखाए गए है,,
मार काट के लिए गुंडे #चित्रकूट’ से बुलाये जाते हैं

अप्रत्यक्ष रूप से वर्तमान सरकार को तानाशाही शासन बताया जा रहा है
अनेक बार भगवा कपड़ो में जय श्रीराम बोलते लोगों को गुंडागर्दी करते दिखाया है

वेब सीरीज़ को सेंसरबोर्ड से भी पास नहीं कराना पड़ता है,,
जब तक पैसे पर जमीर बेचने वाले रहेंगे तबतक ऐसी फिल्में भी बनती रहेंगी और ऐसे कथाकार अली मौला भी करते रहेंगे,,,

दम है तो बहिष्कार करो ऐसे भाँडो का,,, #विचारों_की_प्रयोगशाला

अवतारों की भूमि पर …

अवतारों की भूमि_पर…

महाराष्ट्र के पालघर में साधुओं की भीड़ द्वारा नृशंस हत्या के लिए……
समस्त संतों के अखाड़े,
हिन्दू संगठन,
हिंदुत्ववादी नेता,
हिन्दू शेर चीते गधे घोड़े इत्यादि
सबको हार्दिक बधाई।

जूना अखाड़े के #आचार्यमहामंडलेश्वर #स्वामीअवधेशानन्दगिरिजी महाराज को विशेष आभार!!
आप १५-१५ लाख में गोल्डन बाबा और राधे माँ जैसों को महामंडलेश्वर पद बेचते रहिये प्रभु।
भागवत कथाएँ करके मोटे मोटे धनपतियों को कथाओं में नचाते रहिये महाराज।
दो नंबर वालों और नेताओं को पर्दे के पीछे सैटिंग करवाते रहिये देवता।
इन साधुओं का क्या है….. मरते रहते हैं ये तो।

अखाड़ों को अपनी सेना बता कर अकड़ बताने वाले #शंकराचार्य_महाराज, सोए रहना। जाग गए तो इतनी चर्बी के बोझ से ही मर न जाओ कहीं।
हाँ आपकी इटैलियन मालकिन और उसके पिल्लों की सुरक्षा के लिए बिलकुल द्वार पर बंधे श्वान की भांति चौकस और गुर्राते रहना।
ये दो तीन साधुओं की मौत से क्या होता है…. आप पप्पू को प्रधानमंत्री बनवाने के लिए जोर लगा दो, सफाया कर दिया जाएगा सब अखाड़ों का।

सनातन धर्म के रक्षक अखाड़ों…. चिलम मार कर धुत्त पड़े रहोगे।
तुम्हारी शक्ति और रौद्र रूप बस कुंभ मेलों की शोबाजी ही तो है।
कुंभ मेलों में नर्तकियों की भांति तरह तरह के श्रंगार करके दुकानें लगा लो। आते जाते गृहस्थों को गालीगलौज करते रहो। चिमटा फटकारते रहो। आपस में भी सिर फुटौव्वल करते रहो।
तुम वो योद्धा तो रहे नहीं जिन्होंने जहाँगीर और औरंगजेब के लश्कर खदेड़ डाले थे।
तुम तो उनके नाम पर बची हुई नौटंकी हो जो आज किसी काम की नहीं है।
तुमसे भय होता था लोगों को। और आज तुम्हें जानवर की भांति पीटकर मार डाला।
तुम रोटियाँ तोड़ो और चिलम फूंको।वही रह गया है तुम्हारे वश में अब।

हिन्दू संगठनों…. को कोसते भी रहना कि वो एक नहीं होते।
वो एक होकर करें भी क्या???
जब वो एक होते हैं तुम्हारी फट जाती है और तुम गायब हो जाते हो। सड़कों पर रह जाता है एक हुआ हिन्दू, चूतिया बनने के लिए।
साधुओं से तुम्हें क्या??? तुम तो किसी भी चोर उठाईगीरे को उठा कर महर्षि, योगी, तपस्वी घोषित कर सकते हो।

जब तक ये अखाड़े, मठ और ब्राह्मण रहेंगे हिंदुत्व नामक तुम्हारा नकली माल तो बिकेगा नहीं। इसलिये इनके समाप्त होने पर तुम्हें भीतर से आनंद भी आ रहा होगा।

और हम….. हमें क्या????
हम कोई साधु थोड़े ही हैं। जो हैं वो दुखी हों।
हम तो उन साधुओं की मौत का विश्लेषण करेंगे।
और हम करें भी तो क्या???
हमें जगाने वाले, एकसूत्र में बाँधने वाले, दिशानिर्देश देने वाले खुद ही मृतप्राय पड़े हैं।
हमें गुस्सा आ रहा है तो यहाँ वहाँ लिखकर ठंडा कर रहे हैं। कल नया विषय आएगा।

नोकदारकलमसे✍️ #विचारोंकीप्रयोगशाला

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः

जब भी कोई राष्ट्र अपनी अंतरात्मा पर चढ़ी पुरानी केचुलों को उतार कर, नवजागृति की ओर बढ़ता है तो इस परिवर्तन का पूरा समयकाल, बड़ा मंथर गति से पारित होता प्रतीत होता है। राष्ट्र की अंतरात्मा में हो रहे इस परिवर्तन की प्रक्रिया इतनी चिरकारी होती है कि स्वयं केंचुलो के उतरने की कामना करने वालों को न सिर्फ व्यग्र कर देती है बल्कि दूरदृष्टि के अभाव व उत्कंठा में, यह सब होते हुए दृष्टिगोचर भी नही होता है।
आज भारत शनः शनः, अपने ऊपर लादी गयी पाश्चात्य जगत से आये वामपंथ व सोशलिस्म की व्याख्याओं, परिभाषाओं और शब्दालियों का पुनर्विन्यास कर रहा है। वह, शताब्दियों के दासत्व की हीनता में झुके अपने आत्मबल को रीढ़ दे रहा है। आज भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी अपनी वाचा और कर्मणा से, विदेशी आक्रांताओं के धर्मो व बौद्धिकी को श्रंगार समझ कर, अपनी मूल संस्कृति का तिरस्कार कर, भारतीयों में पनपे अभिजात होने के दम्भ का भंजन भी करते जारहे है।
यदि लोगो ने प्रधानमंत्री मोदी जी के, चीनी कोरोना वायरस की आपदा को लेकर, राष्ट्र के नाम तीनों संबोधनों को सुष्मता से सुना होगा तो इसका आभास अवश्य होगया होगा कि अपने संभाषणों में मोदी जी ने शब्दों के प्रयोग में विशेष ध्यान दिया है। उन्होंने संस्कृत और भारत के विकल्प के रूप में माँ भारती का उद्बोधन किया है। यही उन्होंने आज भी किया है। आज उन्होंने अपने राष्ट्र के संबोधन के अंत मे यजुर्वेद(9:23) में उल्लेखित ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता’ का आवाहन किया है, जिसका अर्थ है कि “हम पुरोहित राष्ट्र को जीवंत ओर जाग्रत बनाए रखेंगे”।
पुरोहित वह जो इस पुर का हित करता है, जो राष्ट्र का दूरगामी हित समझकर उसकी प्राप्ति की व्यवस्था करता है। जो सही परामर्श दे, वह चिन्तक और साधक दोनो हो, वही पुरोहित है!
आज मोदी जी ने माँ भारती के सभी पुरवासियों को उनके साथ पुरोहित्व का प्रावरण करने का आवाहन किया है।
विचारोंकीप्रयोगशाला
BJPJAUNPUR

जबसे अमेरिका ने बगदाद में ईरानी मिलिट्री कमांडर मारा है

जबसे अमेरिका ने बगदाद में ईरानी मिलिट्री कमांडर मारा है तबसे कई मीडिया हाउस व् स्वघोषित डिफेंस व् रणनीतिक विशेषज्ञ तीसरे विश्व युद्ध के नाम की डूंडी पीटते फिर रहे हैं, हमारे न्यूज़ चैनल भी प्रतिदिन इस विषय पर समझदारी भरी कवरेज के सिवाय केवल TRP के लिए व्यर्थ की बातें करने में लगे हुए हैं,

मैं कोई डिफेंस व् स्ट्रेटेजिक अफेयर्स एक्सपर्ट नही हूँ किंतु वैश्विक शक्ति समीकरणों पर दृष्टि रखना मेरी रुचि है और अपनी उसी समझ के आधार पर कह रहा हूँ कि ईरान के विषय पर कोई तीसरा विश्व युद्ध नही होने जा रहा,

विश्वयुद्ध की प्रथम कंडीशन होती है जब विश्व की आर्थिक व् सैन्य महाशक्तियां लगभग बराबरी की संख्या में दो खेमों में बंट चुकी हों और वार्ताओं द्वारा ना सुलझाए जा सकने वाले गंभीर मतभेदों से ग्रस्त हों, तब जाकर विश्वयुद्ध होने की संभावना बनती है,

वर्तमान परिस्थिति में किसी भी एंगल से यह कंडीशन सेटिस्फाई नही होती, क्योंकि अमेरिका संग ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, साउथ कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात व् इज़रायल जैसे देश खड़े हुए हैं, और वहीं दूसरी तरफ ईरान संग तो मौखिक रूप से भी चीन व् रूस मजबूती से खड़े नही दिख रहे।

और यह कहना कि ईरान के लिए रूस और चीन, अमेरिका व् नाटो से लड़ जायेंगे यह अतिशयोक्ति ही है, हाल के समय में घटित हुई कुछ घटनाओं पर दृष्टि डालकर कायदे से इस विषय को समझने का प्रयत्न करते हैं

:rotating_light: वर्ष 2015 : अमेरिका के नाटो सहयोगी टर्की ने सीरिया में रूस का सुखोई 24 फाइटर जेट तब मार गिराया था जब रूस ने पहले से ही अमेरिकी सेनाओं को su24 के फ्लाइट प्लान की जानकारी दे रखी थी,

सोचिए जब उसके बावजूद रूस ने नैटो व् अमेरिका के विरुद्ध युद्ध नहीं छेड़ा, तो भला अब ईरान के एक मिलिट्री कमांडर के मारे जाने पर वह रूस, अमेरिका व् नाटो से युद्ध करने क्यों जाने लगा ?

और वर्तमान समय में रूस की अर्थव्यवस्था भी बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है, क्रीमिया वाले केस के बाद लगे आर्थिक प्रतिबंधों ने रूसी अर्थव्यवस्था को गम्भीर क्षति पहुंचाई है, तथा वर्तमान में रूसी अर्थव्यवस्था केवल कच्चे तेल, गैस व् हथियारों की बिक्री पर ही निर्भर है, ऐसे मे रूस द्वारा ईरान के लिए अमेरिका व् नाटो के विरुद्ध युद्ध छेड़ना आत्मघाती कदम होगा।

:rotating_light: अब बात करते हैं चीन की, तो याद करिए सीरिया में जब रूस ने अपनी सेना उतारी थी तो चीन ने भी अपनी सेना सीरिया भेजने की बातें मीडिया में खूब चलवाईं थी, किंतु वास्तव में चीन ने ऐसा कुछ नहीं किया।

अब चलीये ढोकलाम की बात करते हैं, भारत के पडोसी देश भूटान के भूभाग ढोकलाम पर जब चीन ने सेना भेजकर कब्जा करने का प्रयास किया, तो भारतीय सेना अपनी सीमाएं पार कर भूटान में गई और ढोकलाम में चीनी सेना के समक्ष हथियार तानकर कर सामने खड़ी हो गई,

तीन महीनों तक चीनी सरकार व् चीनी मीडिया बिलबिलाती रही बयानबाजी करती रही, गीदड़ भभकियाँ देती रही, किन्तु भारत और भारतीय सेना ने उसे कोई महत्व नही दिया,

अंत में पूरी दुनिया में चीन की जगहंसाई होने लगी, लोग चीन की सैन्य क्षमता व् शक्ति ही पर प्रश्न उठाने लगे, तब जाकर चीन ने नाक रगड़कर पीछे जाने में ही अपनी भलाई समझी, बैक चैनल द्वारा डिप्लोमेटिक वार्ता भारत सरकार से आरंभ करी और धीरे से चीनी सेना डोकलाम से पीछे खिसक गई,

सोचिए जब पूरे विश्व भर में अपनी सैन्य शक्ति की शेखी बघारने वाले चीन की नाक भारत ने दुनिया के सामने काटकर छोटी कर दी थी, जब तब चीन ने भारत से युद्ध नहीं किया तो भला इरान के लिए अमेरिका से भिड़ना तो चीन के लिए बहुत दूर की कौड़ी है,

आर्थिक दृष्टि से पूर्णरूप से निर्यात पर निर्भर चीन जिसने हाल ही में ट्रेडवार में अमेरिका द्वारा चीनी उत्पादों पर लगाए इंफेलेटेड टैरिफ के कारण गंभीर आर्थिक क्षती झेलने के बाद अमेरिका संग वार्ता का रास्ता चुना था,

उस चीन से यह अपेक्षा करना की वह ईरान के लिए अपने उत्पादों के इतने बड़े बाजार अमेरिका के विरुद्ध जाकर युद्ध करेगा व् अपने आर्थिक हितों का गला स्वंय दबाएगा यह वास्तव में एक बचकानी सोंच है।

अतः मेरे विचार से ईरान के मिलिट्री कमांडर के मारे जाने को तृतीय विश्व युद्ध का आरंभ बताना सर्वथा अनुचित है,

हां ईरान व् अमेरिका के बीच युद्ध हुआ भी तो उसका परिणाम पूर्वनिर्धारित है, क्योंकि ईरान न तो स्वंय ही कोई आर्थिक व् सैन्य महाशक्ति है और न ही ईरान के पास इतने आर्थिक व् सैन्य शक्ति संपन्न तथा विश्वसनीय अलायज़ हैं जो उसके लिए विश्व की सबसे बड़ी मिलिट्री पॉवर अमेरिका और विश्व के सबसे सशक्त सैन्य अलायंस NATO से सीधे लड़कर अपनी अर्थव्यवस्था व् मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर की बैक बोन तुड़वाने को आतुर हों,

युद्ध लड़ना कोई सस्ता सौदा नही होता, युद्ध में केवल सैनिक व् सैन्य उपकरण ही प्रयोग नहीं होते बल्कि कई कई बिलियन डॉलर भी खर्च होते हैं, जो जुटाना हर किसी देश के वश की बात नही है, युद्ध बड़ी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की हालत पतली कर देते हैं और कई बार तो लंबे युद्ध के कारण देशों के अंदर ही गृहयुद्ध शुरू होने का आसार बन जाते हैं।

चीन और रूस द्वारा ईरान के साथ मिलकर अमेरिका का मुकाबला करने की भविष्यवाणियां करने वालों को समझना चाहिए की वर्तमान समय में प्रतिद्वंदियों की आर्थिक शक्ति यह डिसाइड करती है की कौन जीतेगा, सीधी सी बात समझिए जितनी बड़ी व् सशक्त अर्थव्यवस्था होगी उतना ही अधिक होगी उसकी R&D पर खर्च की क्षमता और उतनी ही मजबूत होगी सैन्य इंफ्रा जुटाने व् उसे निरंतर विकसित व् सुदृण करने हेतु लगने वाली फंडिंग की निर्बाध सप्पलाई लाइन, इस समय रूसी अर्थव्यवस्था कमजोर है जो किसी भी युद्ध में जाने कि रूस को अनुमति नहीं देती, वहीं चीनी अर्थव्यवस्था निर्यात पर निर्भर है और एक स्लोडाउन झेल रही है, अमेरिका के विरुद्ध युद्ध में जाने का मतलब चीन, यूरोप व् अमेरिका जैसे अपने प्रमुख बाजारों से हाथ धो बैठेगा और बर्बादी के मुहाने पर आ जाएगा।

मैं इसीलिये हमेशा से कहता हूं की अब युद्ध बैटलफील्ड से अधिक आर्थिक मोर्चे पर लड़े जाते हैं, सैन्य इंफ्रा व् शक्तिशाली सैन्य सहयोगी अपने साथ खड़े करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है मजबूत अर्थतंत्र की, जिस देश की जितनी सशक्त अर्थव्यवस्था उतने ही अधिक शक्तिशाली उसके अलाइज़, क्योंकि आर्थिक महाशक्तियों के आर्थिक हित भी सशक्त अर्थव्यवस्थाओं संग जुड़े होते हैं।

उदाहरण के रूप में भारत को ले लीजिए वर्ष 2014 में भारत दुनिया में 11वें नंबर की अर्थव्यवस्था थी, विश्व की पांच सबसे कमजोर अर्थव्यवस्थाओं के समूह फ्रेजाइल फाइव में सम्मिलित थी, और तब जापान ऑस्ट्रेलिया कनाडा जैसे देश भारत को उच्च गुणवत्ता वाले न्यूक्लियर फ्यूल की सप्लाई तक करने को तैयार नहीं थे, इटली जैसे देश MTCR में भारत कि सदस्यता को समर्थन देने के विरुद्ध थे, उस समय भारत से भागे हुए अपराधीयों और आर्थिक भगोड़ों को पकड़ने और उनकी संपत्ति जप्त करने की भारत सरकार के निवेदनों पर अन्य देशो की सरकारें ध्यान तक नहीं दिया करती थी,

और आज जब भारत विश्व में 5वे नंबर की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, तब उन्हीं देश का आचरण भारत के संग पूर्णतः बदलकर मित्रतापूर्ण हो चुका है, आज उन्हें भारत के सभी निवेदन स्वीकार हैं, किसी भी ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर भारत के विरुद्ध कोई प्रस्ताव आने पर भारत से पहले आज उसके सहयोगी देश मोर्चा खोलते हैं, यह है सुदृढ़ अर्थव्यवस्था की शक्ति जो इस समय ईरान के पास नहीं है,

जो लोग पूछ रहे हैं की ईरान- अमेरिका तनाव में भारत की भूमिका क्या होगी तो बता दूँ की अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध होने की स्थिति में भारत भी तटस्थ रहेगा क्योंकि भले ही ईरान के चाबहार में भारी भरकम भारतीय इन्वेस्टमेंट फंसा हुआ हो, किन्तु अमेरिका संग भारत के व्यापार सम्बंध उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, बड़े बड़े रक्षा सौदे भारत अमेरिका के बीच हुए हैं और कई अभी होने बाकी है,

2014 के बाद से अमेरिका भी निरंतर वैश्विक फ्रंट पर भारत के सामरिक व् कूटनीतिक हितों की रक्षा करता आ रहा है, साथ ही अमेरिका द्वारा भारत संग साइन किये GSOMIA LEMOA COMCASA CISMOA जैसे  महत्वपूर्ण रक्षा समझौते जिनमे एक दूसरे संग गोपनीय मिलिट्री इंटेलिजेंस शेयरिंग, रिसप्पलाई व् रिपेयर्स हेतु एक दूसरे की मिलिट्री बेस प्रयोग करने का समझौता व् स्वीकृत रक्षा उपकरणों के सिक्योर कम्युनिकेशन व् जानकारी साझाकरण जैसे सौदे सम्मिलित हैं जो भारत को अमेरिका के डिफेंस पार्टनर के रूप में स्थापित करते हैं, इन सब विषयों को ध्यान में रखने के बाद भारत द्वारा अमेरिका के विरुद्ध जाकर ईरान का समर्थन करना कहीं से तर्कसंगत नही लगता।

नागरिकता संसोधन बिल 2019

नागरिकता संशोधन बिल 2019
कुछ तथ्य जिनसे हिन्दू अनजान है।
1- युगांडा -4 अगस्त, 1972, को युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन ने युगांडा में वर्षों से रह रहे 60000 एशियाइयों (गैर मुस्लिम मुख्यतः हिन्दू) को अचानक देश छोड़ देने का आदेश दे दिया है. उन्हें देश छोड़ने के लिए सिर्फ़ 90 दिन का समय दिया जाता है। ईदी अमीन को अचानक एक सपना आया और उन्होंने युगांडा के एक नगर टोरोरो में सैनिक अधिकारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अल्लाह ने उनसे कहा है कि वो सारे एशियाइयों (गैर मुस्लिम मुख्यतः हिन्दू) को अपने देश से तुरंत निकाल बाहर करें. वास्तव मे यह सलाह उसे लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफ़ी ने दी थी।

हर व्यक्ति को अपने साथ सिर्फ़ 55 पाउंड और 250 किलो सामान ले जाने की इजाज़त थी.लोगों के सूटकेस खोल कर देखे जा रहे थे. उनकी हर चीज़ बाहर निकाल कर फेंकी जा रही थी, ताकि वो देख सकें कि उसमें सोना या पैसा तो छिपा कर नहीं रखे गए हैं. एक हिन्दू लड़की गीता की उंगली से अंगूठी नहीं निकली तो सैनिकों ने उसकी अंगुली काट दी।

लोगों को दुकाने और घर ऐसे ही खुले छोड़ कर आना पड़ा. उन्हें अपना घर का सामान बेचने की इजाज़त नहीं थी. युगांडाई सैनिक उनका वो सामान भी लूटने की फ़िराक में थे, जिन्हें वो अपने साथ बाहर ले जाना चाहते थे। युगांडा से बाहर जाने वाले हर एशियाई को बीच में बने पांच रोड ब्लॉक्स से हो कर जाना पड़ता था. हर रोड ब्लॉक पर उनकी तलाशी होती थी और सैनिकों की पूरी कोशिश होती थी कि उनसे कुछ न कुछ सामान ऐंठ लिया जाए.’

जॉर्ज इवान स्मिथ अपनी किताब ‘घोस्ट ऑफ़ कंपाला’ में लिखते हैं, ”अमीन ने एशियाइयों की ज़्यादातर दुकानें और होटल अपने सैनिकों को दे दिए. इस तरह के वीडियो मौजूद हैं जिसमें अमीन अपने सैनिक अधिकारियों के साथ चल रहे हैं. उनके साथ हाथ में नोट बुक लिए एक असैनिक अधिकारी भी चल रहा है और अमीन उसे आदेश दे रहे हैं कि फ़लाँ दुकान को फ़लाँ ब्रिगेडियर को दे दिया जाए और फ़लाँ होटल फ़लाँ ब्रिगेडियर को सौंप दिया जाए. ‘इन अधिकारियों को अपना घर तक चलाने की भी तमीज़ नहीं थी.

वो मुफ़्त में मिली दुकानों को क्या चला पाते. वो एक जनजातीय प्रथा का पालन करते हुए अपने कुनबे के लोगों को आमंत्रित करते और उनसे कहते कि वो जो चाहें, वो चीज़ यहाँ से ले जा सकते हैं. उनको इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं था कि कहाँ से नई चीज़ें ख़रीदी जाएं और इन चीज़ों का क्या दाम वसूला जाए. नतीजा ये हुआ कि कुछ ही दिनों में पूरी अर्थव्यवस्था धरातल पर पहुंच गई.”

निकाले गए 60000 लोगों में से 29000 लोगों को ब्रिटेन ने शरण दी. केवल वे 11000 लोग भारत आ सके जबकि इनमे से अधिकांश भारतीय गैर मुस्लिम थे। 5000 लोग कनाडा गए । कितने ग बेघर मारे गए उसका कोई रिकार्ड नहीं। भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने उन हिन्दुओ को भारत लाने की कोई सार्थक कोशिश नहीं की।

2- 1947 मे महात्मा (?) गांधी ने अनशन किया। गांधी की मुख्य 2 मांगें थी। पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिए जाएँ और पाकिस्तान से जान बचा कर आए हिन्दू शरणार्थियों को नवंबर दिसंबर की सर्दी मे पाकिस्तान गए मुस्लिमो के खाली पड़े घरों मे ना घुसने दिया जाए।

1948 मे पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर से हजारों लोग जान बचा कर भारतीय कश्मीर मे आए। उसमे से 99% से अधिक हिन्दू थे। इनमे भी अधिकांश दलित थे। आज उनकी संख्या 8 लाख है। उन्हे 2019 तक नागरिकता नहीं मिली। इन दलितों के लिए भीम मीम वाले भी चुप थे मायवती भी और कांग्रेस भी। क्योंकि ये वोटबैंक नहीं थे।

1971 – बांग्लादेश बना – बड़ी संख्या मे बंग्लादेशी हिन्दू जान बचा कर आए। सबसे अधिक लूट, ह्त्या और बलात्कार के पीड़ित ये हिन्दू ही थे। सरकारों की मानसिकता देखिए। 93000 कैदी सैनिकों के लिए तो विशेष भोजन और सुविधाएं परंतु उन शरणार्थी हिंदूओ के लिए कुछ भी नहीं।

1990 वी पी सिंह प्रधानमंत्री थे। खाड़ी युद्ध हुआ। कुवैत से बड़ी संख्या मे (1.5 लाख लगभग) भारतीय लाए गए जिसमे बड़ी संख्या मे मुस्लिम थे। परंतु अपने ही देश कश्मीर से 3 लाख से अधिक हिन्दू भागा दिए गए। तब हिन्दू का विचार न तो प्र्धानमंत्री को आया ना ग्रहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद को।

3- विश्व में 52 से अधिक मुस्लिम देश हैं. इसमें से 90% इस्लामिक शासन प्रणाली से चलते हैं.इनमे परमाणु शक्ति सम्पन्न पाकिस्तान के हालात आज इतने खराब हैं कि गैर मुस्लिम का अस्तित्व ही खतरे में हो गया है. पुरे विश्व के मुल्कों में जितने भी शरणार्थी हैं वहअधिकाँश मुसलमान हैं और काफिरों के देश में काफीरों की दया की रोटी पर जिंदा हैं ! इन शरणार्थियों की संख्या में सिर्फ दो प्रतिशत वह हैं जिन्हें बौद्ध मुल्क मिय्ममार से भगाया गया है शेष खुद मुसलमानों के हाथों मुस्लिम राष्ट्रों से ही फिरकापरस्ती के नाम पर काफिर कह पीट पीट कर भागे जाने पर मजबुर हुए हैं !

शरणार्थी बेहद ग़मगीन है क्योंकि उन्हें काफिरों के मुल्कों में जीने का हर अधिकार तो मिल रहा है पर शरिया क़ानून नहीं दिये जा रहे ! इतने सम्पन्न , हर सुविधा से भरे देशों में सिर्फ एक कमी है की यह लोग अल्लाह को मानने वाले नहीं हैं अब शरणार्थी वहां की सरकारों को समझा रहे हैं की हमें इस्लामिक हुकूक दे दें क्योंकि इस्लाम सलामती का दीन है

4- यदि भारत में मुस्लिम बहुसंख्यक हो जाएंगे तो ?
कुछ साल पहले NDTV के समाचार वाचक रविश ने कहा था – यदि भारत में मुस्लिम बहुसंख्यक हो जाएंगे तो कौनसी बिजली टूट पड़ेगी. रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में बसाने के लिए मीडिया, कम्युनिस्ट, नास्तिक, मोमिन खूब जोर लगा रहे हैं। जैसे हमारा देश कोई धर्मशाला हो। ये लोग न व्यवाहरिक रूप से सोचते हैं, न इतिहास से सबक लेते है। क्यूंकि इतिहास से सबक सिखने वाला समझदार कहलाता है।

भारत में मुस्लिम भारी भरकम जनसँख्या में से नाममात्र भी टैक्स नहीं देते। इसमें से भी कश्मीर से टैक्स सम्बंधित आकड़ें चौकाने वाले है। कश्मीर देश को केवल 0.1 प्रतिशत टैक्स देता है। उसे केंद्रीय सरकार के कोटे से सबसे अधिक 10% अनुदान मिलता है। कर्नाटक राज्य 9.56% टैक्स देश को देता है। उसे बदले में केवल केंद्र सरकार से केवल 4.5% अनुदान मिलता है। उत्तर प्रदेश की जनसंख्या कश्मीर से 16 गुणा अधिक है। फिर भी उसे कश्मीर से कम अनुदान मिलता है। कश्मीर की कुल जनसँख्या से एक प्रतिशत भी टैक्स नहीं देते।

कश्मीर के मुसलमान केवल हिन्दुओं को भगाने, सेना पर पत्थरबाजी करने, रोहिंग्या मुसलमानों को बसाने, लव जिहाद करने और आर्मी को आतंकवादियों को पकड़ने से रोकने का काम करते हैं। देश में सबसे अधिक टैक्स देने वाले राज्य जैसे आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली, कर्नाटक में कोई भी बस सकता है। मगर कश्मीर में धारा 370 के लगने के कारण कोई भी गैर कश्मीरी भारतीय जमीन तक नहीं खरीद सकता। 2015-16 में कश्मीर राज्य को सबसे अधिक 11,838.96 करोड़ रुपये का अनुदान केंद्र द्वारा दिया गया। जबकि कश्मीर के देश को कर आदि के रूप में सहयोग न के बराबर है।

5- दुनिया में मुसलमानों की कुल आबादी एक अरब 50 करोड़ से अधिक है। जिनकी अमेरिका में संख्या 60 लाख, एशिया और मध्य पूर्व के देशों और राज्यों में लगभग एक अरब, अफ्रीकी देशों में 40 करोड़ और यूरोप में 4 करोड़ 40 लाख है। इस समय दुनिया की 20 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है। दुनिया में इस समय एक हिंदूके मुकाबले दो मुसलमान हैं। बौद्ध धर्म से भी यही अनुपात है 1 यहूदी व्यक्ति की तुलना में 107 मुसलमान हैं

किसी भी इस्लामी देश के विश्वविद्यालय का नाम दुनिया की पांच सौ सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की सूची में शामिल नहीं है।जबकि केवल इस्राएल के 6 विश्वविद्यालय दुनिया के शीर्ष 500 सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में शामिल हैं।
अगर पढ़े लिखे लोगों की दर अनुपात को देखा जाए तो पश्चिमी देशों में 65%पढ़े लिखे लोग हैं। जबकि मुस्लिम देशों में यही अनुपात केवल 35 प्रतिशत है। इसराइल में पढ़े लिखे लोगों की दर अनुपात 95 प्रतिशत से अधिक है। पश्चिमी देशों में 15 देश ऐसे हैं जहां पढ़े लिखे लोगों का दर अनुपात 100 प्रतिशत है जबकि मुसलमानों का कोई भी ऐसा देश नहीं है।

#IndiaFirst : मोदी सरकार 2.0 के 6 माह

#IndiaFirst : मोदी सरकार 2.0 के 6 माह

#Abhijeet_Srivastava की पोस्ट का हिंदी अनुवाद

1-सैनिकों के बच्चो के लिए प्रधानमंत्री छात्रवृत्ति.

️ 2-जल शक्ति मंत्रालय का गठन.

️ 3-शिक्षा नीति 2019 ड्राफ्ट हैंड-ओवर.

️ 4-अनुच्छेद 35A और 370 का निरस्तीकरण.

️ 5-जम्मू और कश्मीर (पुनर्गठन) विधेयक, 2019.

️ 6-जम्मू कश्मीर में पहली बार इन्वेस्टर समिट का आयोजन.

️ 7-तीन तलाक बिल पास.

️ 8-जम्मू-कश्मीर बैंक में हुई गड़बड़ियों पर कार्रवाई.

️ 9-एनआईए (संशोधन) बिल पास हुआ.

️ 10-यूएपीए (संशोधन) बिल पास हुआ.

️ 11-पॉस्को (संशोधन) बिल पास हुआ.

️ 12-5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लिए रोडमैप.

️ 13-सभी किसानों को पीएम किसान योजना का लाभ.

️14- “राम मन्दिर” पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया.

️ 15-अनधिकृत कालोनी बिल लोकसभा में पास हुआ.

️ 16-दिल्ली में अनधिकृत कालोनी को अधिकृत करने के निर्णय से 40 लाख से अधिक लोगों को फायदा.

️17- ‘राफेल’ मामले में मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट मिली.

️ 18-दुकानदारों के लिए पेंशन योजना लागू.

️19- ई-वाहन खरीदने पर सब्सिडी.

️ 20-नरेश गोयल, प्रणव राय को देश छोड़ने से रोका गया.

️ 31-58 निरर्थक/बेकार/पुराने कानून हटा दिए गए.

️ 32-भारत ने संयुक्त राष्ट्र में ‘इज़राइल’ के पक्ष में मतदान किया.

️ 33-BSNL के लिए पुनरुद्धार योजना को मंजूरी.

️ 34-कॉर्पोरेट टैक्स कम किया.

️ 35-राफेल फाइटर जेट भारतीय सेना को प्राप्त हुआ.

️ 36-पारंपरिक उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए SFURTI.

️ 37-राष्ट्रीय खेल शिक्षा बोर्ड की स्थापना.

️ 38-कई भगोड़ों के खिलाफ ईडी, सीबीआई और आईटी द्वारा कार्रवाई.

️ 39-ईडी ने ‘संदेसरा’ आदि की संपत्तियों को कुर्क किया.

️40- श्रम सुरक्षा विधेयक पारित.

️ 41-उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, 2019 पारित.

️ 42-अनियमित जमा योजनाएं प्रतिबंधित.

️ 43-RuPay Card का शुभारंभ अबू धाबी में हुआ.

️ 44-असम के लिए एनआरसी सूची प्रकाशित हुई.

️ 45-अभिनंदन वर्धमान को “वीर चक्र” से सम्मानित किया.

️ 46-सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSB) का एकीकरण.

️47- “फिट इंडिया” आंदोलन चलाया.

️48- बैंकों और NBFC की तरलता में वृद्धि की गई.

️49- सी-17 ग्लोबमास्टर III परिवहन विमान भारतीय सेना को प्राप्त हुआ.

️50-पी चिदंबरम की गिरफ्तारी.

️ 51-जम्मू कश्मीर का अलग झंडा जम्मू कश्मीर सचिवालय से हटाया गया और तिरंगा फहराया गया.

️ 52-गरवी गुजरात भवन का उद्घाटन.

️ 53-भारतीय वायुसेना को अपाचे AH-64E लड़ाकू हेलीकॉप्टर प्राप्त हुए.

️ 54-भारत और दक्षिण कोरिया ने लॉजिस्टिक पैक्ट पर हस्ताक्षर किए.

️55- भारत सरकार ने 75 अतिरिक्त मेडिकल कॉलेज स्वीकृत किए.

️ 56-अमेरिका में ऐतिहासिक “हाउडी मोदी” इवेंट हुआ.

️ 57-“चंद्रयान 2” 95% सफलता के साथ लॉन्च हुआ.

️ 58-‘मुंबई मेट्रो’ परियोजना लॉन्च किया.

️ 59-उज्ज्वला योजना (PMUY) ने 8 करोड़ गरीब परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन का लक्ष्य हासिल किया.

️ 60-चिट फंड्स (संशोधन) विधेयक पारित.

️ 61-भारत ने RCEP को खारिज कर दिया.

️ 62-भारत ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की रैंकिंग में 63वें स्थान पर पहुंच गया.

️ 63-इसरो द्वारा कर्टोसैट-3 सफलतापूर्वक लांच किया गया.

️ 64-मोदी कैबिनेट द्वारा औद्योगिक संबंध संहिता को मंजूरी.

#IndiaFirst : मोदी सरकार 2.0 के 6 माह

#Abhijeet_Srivastava की पोस्ट का हिंदी अनुवाद

1-सैनिकों के बच्चो के लिए प्रधानमंत्री छात्रवृत्ति.

️ 2-जल शक्ति मंत्रालय का गठन.

️ 3-शिक्षा नीति 2019 ड्राफ्ट हैंड-ओवर.

️ 4-अनुच्छेद 35A और 370 का निरस्तीकरण.

️ 5-जम्मू और कश्मीर (पुनर्गठन) विधेयक, 2019.

️ 6-जम्मू कश्मीर में पहली बार इन्वेस्टर समिट का आयोजन.

️ 7-तीन तलाक बिल पास.

️ 8-जम्मू-कश्मीर बैंक में हुई गड़बड़ियों पर कार्रवाई.

️ 9-एनआईए (संशोधन) बिल पास हुआ.

️ 10-यूएपीए (संशोधन) बिल पास हुआ.

️ 11-पॉस्को (संशोधन) बिल पास हुआ.

️ 12-5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लिए रोडमैप.

️ 13-सभी किसानों को पीएम किसान योजना का लाभ.

️14- “राम मन्दिर” पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया.

️ 15-अनधिकृत कालोनी बिल लोकसभा में पास हुआ.

️ 16-दिल्ली में अनधिकृत कालोनी को अधिकृत करने के निर्णय से 40 लाख से अधिक लोगों को फायदा.

️17- ‘राफेल’ मामले में मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट मिली.

️ 18-दुकानदारों के लिए पेंशन योजना लागू.

️19- ई-वाहन खरीदने पर सब्सिडी.

️ 20-नरेश गोयल, प्रणव राय को देश छोड़ने से रोका गया.

️ 31-58 निरर्थक/बेकार/पुराने कानून हटा दिए गए.

️ 32-भारत ने संयुक्त राष्ट्र में ‘इज़राइल’ के पक्ष में मतदान किया.

️ 33-BSNL के लिए पुनरुद्धार योजना को मंजूरी.

️ 34-कॉर्पोरेट टैक्स कम किया.

️ 35-राफेल फाइटर जेट भारतीय सेना को प्राप्त हुआ.

️ 36-पारंपरिक उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए SFURTI.

️ 37-राष्ट्रीय खेल शिक्षा बोर्ड की स्थापना.

️ 38-कई भगोड़ों के खिलाफ ईडी, सीबीआई और आईटी द्वारा कार्रवाई.

️ 39-ईडी ने ‘संदेसरा’ आदि की संपत्तियों को कुर्क किया.

️40- श्रम सुरक्षा विधेयक पारित.

️ 41-उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, 2019 पारित.

️ 42-अनियमित जमा योजनाएं प्रतिबंधित.

️ 43-RuPay Card का शुभारंभ अबू धाबी में हुआ.

️ 44-असम के लिए एनआरसी सूची प्रकाशित हुई.

️ 45-अभिनंदन वर्धमान को “वीर चक्र” से सम्मानित किया.

️ 46-सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSB) का एकीकरण.

️47- “फिट इंडिया” आंदोलन चलाया.

️48- बैंकों और NBFC की तरलता में वृद्धि की गई.

️49- सी-17 ग्लोबमास्टर III परिवहन विमान भारतीय सेना को प्राप्त हुआ.

️50-पी चिदंबरम की गिरफ्तारी.

️ 51-जम्मू कश्मीर का अलग झंडा जम्मू कश्मीर सचिवालय से हटाया गया और तिरंगा फहराया गया.

️ 52-गरवी गुजरात भवन का उद्घाटन.

️ 53-भारतीय वायुसेना को अपाचे AH-64E लड़ाकू हेलीकॉप्टर प्राप्त हुए.

️ 54-भारत और दक्षिण कोरिया ने लॉजिस्टिक पैक्ट पर हस्ताक्षर किए.

️55- भारत सरकार ने 75 अतिरिक्त मेडिकल कॉलेज स्वीकृत किए.

️ 56-अमेरिका में ऐतिहासिक “हाउडी मोदी” इवेंट हुआ.

️ 57-“चंद्रयान 2” 95% सफलता के साथ लॉन्च हुआ.

️ 58-‘मुंबई मेट्रो’ परियोजना लॉन्च किया.

️ 59-उज्ज्वला योजना (PMUY) ने 8 करोड़ गरीब परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन का लक्ष्य हासिल किया.

️ 60-चिट फंड्स (संशोधन) विधेयक पारित.

️ 61-भारत ने RCEP को खारिज कर दिया.

️ 62-भारत ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की रैंकिंग में 63वें स्थान पर पहुंच गया.

️ 63-इसरो द्वारा कर्टोसैट-3 सफलतापूर्वक लांच किया गया.

️ 64-मोदी कैबिनेट द्वारा औद्योगिक संबंध संहिता को मंजूरी.

ब्राह्मण

#ब्राह्मण

इस पोस्ट के सिर्फ इसलिए पक्ष/विपक्ष में न रहें क्योंकि आप ब्राह्मण हैं/नहीं हैं। कृपया श्रम करके पूरी पढ़ें और चिंतन करके निर्णय लें।

—————————————————————————

!!#चिंतनीय!!

यह पोस्ट किसी जाति के लिए नहीं वरन ब्राह्मणों के विरुद्ध समाज में फैलाई जा रही नकारात्मकता के बारे में है कृपया धैर्य से पूरा पढ़ें तभी प्रतिक्रिया दें-

क्या आधुनिक भारत में ब्राह्मणों की दुर्दशा तर्कसंगत

है?

जिन लोगों ने भारत को लूटा, तोडा, नष्ट किया, वे आज इस देश में ‘अतीत भुला दो’ के नाम पर सम्मानित हैं और एक अच्छा जीवन जी रहे हैं। जिन्होंने भारत की मर्यादा को खंडित किया, उसके विश्विद्यालयों को विध्वंस किया, उसके विश्वज्ञान के भंडार पुस्तकालयों को जला कर राख किया, उन्हें आज के भारत में सब सुविधाओं से युक्त सुखी जीवन मिल रहा है। किंतु वे ब्राह्मण जिन्होंने सदैव अपना जीवन देश, धर्म और समाज की उन्नति के लिए अर्पित किया, वे आधुनिक भारत में “काल्पनिक” पुराने पापों के लिए दोषी हैं।

आधुनिक इतिहासकार हमें सिखाते हैं कि भारत के ब्राह्मण सदा से दलितों का शोषण करते आये हैं जो घृणित वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तक भी हैं। ब्राह्मण-विरोध का यह काम पिछले दो शतकों में कार्यान्वित किया गया।

वे कहते हैं कि ब्राह्मणों ने कभी किसी अन्य जाति के लोगों को पढने लिखने का अवसर नहीं दिया। बड़े बड़े विश्वविद्यालयों के बड़े बड़े शोधकर्ता यह सिद्ध करने में लगे रहते हैं कि ब्राह्मण सदा से समाज का शोषण करते आये हैं और आज भी कर रहे हैं, कि उन्होंने हिन्दू ग्रन्थों की रचना केवल इसीलिए की कि वे समाज में अपना स्थान सबसे ऊपर घोषित कर सकें…किंतु यह सारे तर्क खोखले और बेमानी हैं, इनके पीछे एक भी ऐतिहासिक प्रमाण नहीं। एक झूठ को सौ बार बोला जाए तो वह अंततः सत्य प्रतीत होने लगता, इसी भांति इस झूठ को भी आधुनिक भारत में सत्य का स्थान मिल चुका है।

आइये आज हम बिना किसी पूर्व प्रभाव के और बिना किसी पक्षपात के न्याय बुद्धि से इसके बारे सोचे, सत्य घटनायों पर टिके हुए सत्य को देखें। क्योंकि अपने विचार हमें सत्य के आधार पर ही खड़े करने चाहियें, न कि किसी दूसरे के कहने मात्र से। खुले दिमाग से सोचने से आप पायेंगे कि ९५ % ब्राह्मण सरल हैं, सज्जन हैं, निर्दोष हैं। आश्चर्य है कि कैसे समय के साथ साथ काल्पनिक कहानियाँ भी सत्य का रूप धारण कर लेती हैं। यह जानने के लिए बहुत अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं कि ब्राह्मण-विरोधी यह विचारधारा विधर्मी घुसपैठियों, साम्राज्यवादियों, ईसाई मिशनरियों और बेईमान नेताओं के द्वारा बनाई गयी और आरोपित की गयी,ताकि वे भारत के समाज के टुकड़े टुकड़े करके उसे आराम से लूट सकें।

सच तो यह है कि इतिहास के किसी भी काल में ब्राह्मण न तो धनवान थे और न ही शक्तिशाली। ब्राह्मण भारत के समुराई नहीं है। वन का प्रत्येक जन्तु मृग का शिकार करना चाहता है, उसे खा जाना चाहता है, और भारत का ब्राह्मण वह मृग है। आज के ब्राह्मण की वह स्थिति है जो कि नाजियों के राज्य में यहूदियों की थी। क्या यह स्थिति स्वीकार्य है? ब्राह्मणों की इस दुर्दशा से किसी को भी सरोकार नहीं, जो राजनीतिक दल हिन्दू समर्थक माने गए हैं, उन्हें भी नहीं;सब ने हम ब्राह्मणों के साथ सिर्फ छलावा ही किया है।

ब्राह्मण सदा से निर्धन वर्ग में रहे हैं! क्या आप ऐसा एक भी उदाहरण दे सकते हैं जब ब्राह्मणों ने पूरे भारत पर शासन किया हो?? शुंग,कण्व ,सातवाहन आदि द्वारा किया गया शासन सभी विजातियों और विधर्मियों को क्यूं कचोटता है? *चाणक्य* ने *चन्द्रगुप्त मौर्य* की सहायता की थी एक अखण्ड भारत की स्थापना करने में। भारत का सम्राट बनने के बाद, चन्द्रगुप्त ,चाणक्य के चरणों में गिर गया और उसने उसे अपना राजगुरु बनकर महलों की सुविधाएँ भोगते हुए, अपने पास बने रहने को कहा। चाणक्य का उत्तर था: ‘मैं तो ब्राह्मण हूँ, मेरा कर्म है शिष्यों को शिक्षा देना और भिक्षा से जीवनयापन करना। क्या आप किसी भी इतिहास अथवा पुराण में धनवान ब्राह्मण का एक भी उदाहरण बता सकते हैं?

श्री कृष्ण की कथा में भी निर्धन ब्राह्मण सुदामा ही प्रसिद्ध है।

संयोगवश, *श्रीकृष्ण* जो कि भारत के सबसे प्रिय आराध्य देव हैं, यादव-वंश के थे, जो कि आजकल *OBC* के अंतर्गत आरक्षित जाति मानी गयी है।

यदि ब्राह्मण वैसे ही घमंडी थे जैसे कि उन्हें बताया जाता है, तो यह कैसे सम्भव है कि उन्होंने अपने से नीची जातियों के व्यक्तियों को भगवान् की उपाधि दी और उनकी अर्चना पूजा की स्वीकृति भी?(उस सन्दर्भ में यदि ईश्वर ब्राह्मण की कृति हैं जैसा की कुछ मूर्ख कहते हैं) देवों के देव *महादेव शिव* को पुराणों के अनुसार *किराट जाति* का कहा गया है, जो कि आधुनिक व्यवस्था में *ST* की श्रेणी में पाए जाते हैं

दूसरों का शोषण करने के लिए शक्तिशाली स्थान की, अधिकार-सम्पन्न पदवी की आवश्यकता होती है। जबकि ब्राह्मणों का काम रहा है या तो मन्दिरों में पुजारी का और या धार्मिक कार्य में पुरोहित का और या एक वेतनहीन गुरु(अध्यापक) का। उनके धनार्जन का एकमात्र साधन रहा है भिक्षाटन। क्या ये सब बहुत ऊंची पदवियां हैं? इन स्थानों पर रहते हुए वे कैसे दूसरे वर्गों का शोषण करने में समर्थ हो सकते हैं? एक और शब्द जो हर कथा कहानी की पुस्तक में पाया जाता है वह है – ‘निर्धन ब्राह्मण’ जो कि उनका एक गुण माना गया है। समाज में सबसे माननीय स्थान संन्यासी ब्राह्मणों का था, और उनके जीवनयापन का साधन भिक्षा ही थी। (कुछ विक्षेप अवश्य हो सकते हैं, किंतु हम यहाँ साधारण ब्राह्मण की बात कर रहे हैं।)

ब्राह्मणों से यही अपेक्षा की जाती रही कि वे अपनी जरूरतें कम से कम रखें और अपना जीवन ज्ञान की आराधना में अर्पित करें। इस बारे में एक अमरीकी लेखक *आलविन टाफलर* ने भी कहा है कि ‘हिंदुत्व में निर्धनता को एक शील माना गया है।’

सत्य तो यह है कि शोषण वही कर सकता है जो समृद्ध हो और जिसके पास अधिकार हों अब्राह्मण को पढने से किसी ने नहीं रोका। श्रीकृष्ण यदुवंशी थे, उनकी शिक्षा गुरु संदीपनी के आश्रम में हुई, श्रीराम क्षत्रिय थे उनकी शिक्षा पहले ऋषि वशिष्ठ के यहाँ और फिर ऋषि विश्वामित्र के पास हुई। बल्कि ब्राह्मण का तो काम ही था सबको शिक्षा प्रदान करना। हां यह अवश्य है कि दिन-रात अध्ययन व अभ्यास के कारण, वे सबसे अधिक ज्ञानी माने गए, और ज्ञानी होने के कारण प्रभावशाली और आदरणीय भी। इसके कारण कुछ अन्य वर्ग उनसे जलने लगे, किंतु इसमें भी उनका क्या दोष यदि विद्या केवल ब्राह्मणों की पूंजी रही होती तो वाल्मीकि जी रामायण कैसे लिखते और तिरुवलुवर तिरुकुरल कैसे लिखते?

और अब्राह्मण संतो द्वारा रचित इतना सारा भक्ति-साहित्य कहाँ से आता? जिन ऋषि व्यास ने महाभारत की रचना की वे भी एक मछुआरन माँ के पुत्र थे। इन सब उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि ब्राह्मणों ने कभी भी विद्या देने से मना नहीं किया।

जिनकी शिक्षायें हिन्दू धर्म में सर्वोच्च मानी गयी हैं, उनके नाम और जाति यदि देखी जाए, तो *वशिष्ठ, वाल्मीकि, कृष्ण, राम, बुद्ध, महावीर, कबीरदास, विवेकानंद* आदि, इनमें कोई भी ब्राह्मण नहीं। तो फिर ब्राह्मणों के ज्ञान और विद्या पर एकाधिकार का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता! यह केवल एक झूठी भ्रान्ति है जिसे गलत तत्वों ने अपने फायदे के लिए फैलाया, और इतना फैलाया कि सब इसे सत्य मानने लगे।

जिन दो पुस्तकों में वर्ण(जाति नहीं) व्यवस्था का वर्णन आता है उनमें पहली तो है मनुस्मृति जिसके रचियता थे *मनु* जो कि एक क्षत्रिय थे, और दूसरी है *श्रीमदभगवदगीता* जिसके रचियता थे *व्यास* जो कि निम्न वर्ग की मछुआरन के पुत्र थे। यदि इन दोनों ने ब्राह्मण को उच्च स्थान दिया तो केवल उसके ज्ञान एवं शील के कारण, किसी स्वार्थ के कारण नहीं।

ब्राह्मण तो अहिंसा के लिए प्रसिद्ध हैं।

पुरातन काल में जब कभी भी उन पर कोई विपदा आई, उन्होंने शस्त्र नहीं उठाया, क्षत्रियों से सहायता माँगी।

बेचारे असहाय ब्राह्मणों को अरब आक्रमणकारियों ने काट डाला, उन्हें गोवा में पुर्तगालियों ने cross पर चढ़ा कर मारा, उन्हें अंग्रेज missionary लोगों ने बदनाम किया, और आज अपने ही भाई-बंधु उनके शील और चरित्र पर कीचड उछल रहे हैं। इस सब पर भी क्या कहीं कोई प्रतिक्रिया दिखाई दी, क्या वे लड़े, क्या उन्होंने आन्दोलन किया?

औरंगजेब ने बनारस, गंगाघाट और हरिद्वार में १५०,००० ब्राह्मणों और उनके परिवारों की ह्त्या करवाई, उसने हिन्दू ब्राह्मणों और उनके बच्चों के शीश-मुंडो की इतनी ऊंची मीनार खडी की जो कि दस मील से दिखाई देती थी, उसने उनके जनेयुओं के ढेर लगा कर उनकी आग से अपने हाथ सेके। किसलिए, क्योंकि उन्होंने अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम को अपनाने से मना किया। यह सब उसके इतिहास में दर्ज़ है।

क्या ब्राह्मणों ने शस्त्र उठाया? फिर भी ओरंगजेब के वंशज हमें भाई मालूम होते हैं और ब्राह्मण देश के दुश्मन?

यह कैसा तर्क है, कैसा सत्य है?

कोंकण-गोवा में पुर्तगाल के वहशी आक्रमणकारियों ने निर्दयता से लाखों कोंकणी ब्राह्मणों की हत्या कर दी क्योंकि उन्होंने ईसाई धर्म को मानने से इनकार किया। क्या आप एक भी ऐसा उदाहरण दे सकते हो कि किसी कोंकणी ब्राह्मण ने किसी पुर्तगाली की हत्या की? फिर भी पुर्तगाल और अन्य यूरोप के देश हमें सभ्य और अनुकरणीय लगते हैं और ब्राह्मण तुच्छ! यह कैसा सत्य है?

जब पुर्तगाली भारत आये, तब *St. Xavier* ने पुर्तगाल के राजा को पत्र लिखा “यदि ये ब्राह्मण न होते तो सारे स्थानीय जंगलियों को हम आसानी से अपने धर्म में परिवर्तित कर सकते थे।” यानि कि ब्राह्मण ही वे वर्ग थे जो कि धर्म परिवर्तन के मार्ग में बलि चढ़े। जिन्होंने ने अपना धर्म छोड़ने की अपेक्षा मर जाना बेहतर समझा। *St. Xavier* को ब्राह्मणों से असीम घृणा थी, क्योंकि वे उसके रास्ते का काँटा थे,

हजारों की संख्या में गौड़ सारस्वत कोंकणी ब्राह्मण उसके अत्याचारों से तंग हो कर गोवा छोड़ गए, अपना सब कुछ गंवा कर। क्या किसी एक ने भी मुड़ कर वार किया? फिर भी *St. Xavier* के नाम पर आज भारत के हर नगर में स्कूल और कॉलेज है और भारतीय अपने बच्चों को वहां पढ़ाने में गर्व अनुभव करते हैं

इनके अतिरिक्त कई हज़ार सारस्वत ब्राह्मण काश्मीर और गांधार के प्रदेशों में विदेशी आक्रमणकारियों के हाथों मारे गए। आज ये प्रदेश अफगानिस्तान और पाकिस्तान कहलाते हैं, और वहां एक भी सारस्वत ब्राह्मण नहीं बचा है। क्या कोई एक घटना बता सकते हैं कि इन प्रदेशों में किसी ब्राह्मण ने किसी विदेशी की हत्या की? हत्या की छोडिये, क्या कोई भी हिंसा का काम किया?

और आधुनिक समय में भी इस्लामिक आतंकवादियों ने काश्मीर घाटी के मूल निवासी ब्राह्मणों को विवश करके काश्मीर से बाहर निकाल दिया। ५००,००० काश्मीरी पंडित अपना घर छोड़ कर बेघर हो गए, देश के अन्य भागों में शरणार्थी हो गये, और उनमे से ५०,००० तो आज भी जम्मू और दिल्ली के बहुत ही अल्प सुविधायों वाले अवसनीय तम्बुओं में रह रहे हैं। आतंकियों ने अनगनित ब्राह्मण पुरुषों को मार डाला और उनकी स्त्रियों का शील भंग किया। क्या एक भी पंडित ने शस्त्र उठाया, क्या एक भी आतंकवादी की ह्त्या की? फिर भी आज ब्राह्मण शोषण और अत्याचार का पर्याय माना जाता है और मुसलमान आतंकवादी वह भटका हुआ इंसान जिसे क्षमा करना हम अपना धर्म समझते हैं। यह कैसा तर्क है?

माननीय भीमराव अंबेडकर जो कि भारत के संविधान के तथाकथित रचियता (प्रारूप समिति के अध्यक्ष) थे, उन्होंने एक मुसलमान इतिहासकार का सन्दर्भ देकर लिखा है कि धर्म के नशे में पहला काम जो पहले अरब घुसपैठिया मोहम्मद बिन कासिम ने किया, वो था ब्राह्मणों का खतना। “किंतु उनके मना करने पर उसने सत्रह वर्ष से अधिक आयु के सभी को मौत के घाट उतार दिया।” मुग़ल काल के प्रत्येक घुसपैठ, प्रत्येक आक्रमण और प्रत्येक धर्म-परिवर्तन में लाखों की संख्या में धर्म-प्रेमी ब्राह्मण मार दिए गए। क्या आप एक भी ऐसी घटना बता सकते हो जिसमें किसी ब्राह्मण ने किसी दूसरे सम्प्रदाय के लोगों की हत्या की हो?

१९वीं सदी में मेलकोट में दिवाली के दिन टीपू सुलतान की सेना ने चढाई कर दी और वहां के ८०० नागरिकों को मार डाला जो कि अधिकतर मंडयम आयंगर थे। वे सब संस्कृत के उच्च कोटि के विद्वान थे। (आज तक मेलकोट में दिवाली नहीं मनाई जाती।) इस हत्याकाण्ड के कारण यह नगर एक श्मशान बन गया। ये अहिंसावादी ब्राह्मण पूर्ण रूप से शाकाहारी थे, और सात्विक भोजन खाते थे जिसके कारण उनकी वृतियां भी सात्विक थीं और वे किसी के प्रति हिंसा के विषय में सोच भी नहीं सकते थे। उन्होंने तो अपना बचाव तक नहीं किया। फिर भी आज इस देश में टीपू सुलतान की मान्यता है। उसकी वीरता के किस्से कहे-सुने जाते हैं। और उन ब्राह्मणों को कोई स्मरण नहीं करता जो धर्म के कारण मौत के मुंह में चुपचाप चले गए।

अब जानते हैं आज के ब्राह्मणों की स्थिति क्या आप जानते हैं कि बनारस के अधिकाँश रिक्शा वाले ब्राह्मण हैं? क्या आप जानते हैं कि दिल्ली के रेलवे स्टेशन

पर आपको ब्राह्मण कुली का काम करते हुए मिलेंगे?

दिल्ली में पटेलनगर के क्षेत्र में 50 % रिक्शा वाले ब्राह्मण समुदाय के हैं। आंध्र प्रदेश में ७५ % रसोइये और घर की नौकरानियां ब्राह्मण हैं। इसी प्रकार देश के दुसरे भागों में भी ब्राह्मणों की ऐसी ही दुर्गति है, इसमें कोई शंका नहीं। गरीबी-रेखा से नीचे बसर करने वाले ब्राह्मणों का आंकड़ा ६०% है।

हजारों की संख्या में ब्राह्मण युवक अमरीका आदि पाश्चात्य देशों में जाकर बसने लगे हैं क्योंकि उन्हें वहां software engineer या scientist का काम मिल जाता है। सदियों से जिस समुदाय के सदस्य अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण समाज के शिक्षक और शोधकर्ता रहे हैं, उनके लिए आज ये सब कर पाना कोई बड़ी बात नहीं। फिर भारत सरकार को उनके सामर्थ्य की आवश्यकता क्यों नहीं ? क्यों भारत में तीव्र मति की अपेक्षा मंद मति को प्राथमिकता दी जा रही है? और ऐसे में देश का विकास होगा तो कैसे?

कर्नाटक प्रदेश के सरकारी आंकड़ों के अनुसार वहां के

वासियों का आर्थिक चित्रण कुछ ऐसा है: ईसाई भारतीय – १५६२ रू/ वोक्कालिग जन – ९१४ रू/ मुसलमान – ७९४ रू/ पिछड़ी जातियों के जन – ६८० रू/ पिछड़ी जनजातियों के जन – ५७७ रू/ और ब्राह्मण – ५३७ रू। तमिलनाडु में रंगनाथस्वामी मन्दिर के पुजारी का मासिक वेतन ३०० रू और रोज का एक कटोरी चावल है। जबकि उसी मन्दिर के सरकारी कर्मचारियों का वेतन कम से कम २५०० रू है। ये सब ठोस तथ्य हैं लेकिन इन सब तथ्यों के होते हुए, आम आदमी की यही धारणा है कि पुजारी ‘धनवान’ और ‘शोषणकर्ता’ है, क्योंकि देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने अनेक वर्षों तक इसी असत्य को अनेक प्रकार से चिल्ला चिल्ला कर सुनाया है।

क्या हमने उन विदेशी घुसपैठियों को क्षमा नहीं

किया जिन्होंने लाखों-करोड़ों हिंदुओं की हत्या की और देश को हर प्रकार से लूटा? जिनके आने से पूर्व भारत संसार का सबसे धनवान देश था और जिनके आने के बाद आज भारत पिछड़ा हुआ third world country कहलाता है। इनके दोष भूलना सम्भव है तो अहिंसावादी, ज्ञानमूर्ति, धर्मधारी ब्राह्मणों को किस बात का दोष लगते हो कब तक उन्हें दोष देते जाओगे?

क्या हम भूल गए कि वे ब्राह्मण समुदाय ही था जिसके कारण हमारे देश का बच्चा बच्चा गुरुकुल में बिना किसी भेदभाव के समान रूप से शिक्षा पाकर एक योग्य नागरिक बनता था? क्या हम भूल गए कि ब्राह्मण ही थे जो ऋषि मुनि कहलाते थे, जिन्होंने विज्ञान को अपनी मुट्ठी में कर रखा था?

भारत के स्वर्णिम युग में ब्राह्मण को यथोचित सम्मान दिया जाता था और उसी से सामाज में व्यवस्था भी ठीक रहती थी। सदा से विश्व भर में जिन जिन क्षेत्रों में भारत का नाम सर्वोपरी रहा है और आज भी है वे सब ब्राह्मणों की ही देन हैं, जैसे कि अध्यात्म, योग, प्राणायाम, आयुर्वेद आदि। यदि ब्राह्मण जरा भी स्वार्थी होते तो यह सब अपने था अपने कुल के लिए ही रखते दुनिया में मुफ्त बांटने की बजाए इन की कीमत वसूलते। वेद-पुराणों के ज्ञान-विज्ञान को अपने मस्तक में धारने वाले व्यक्ति ही ब्राह्मण कहे गए और आज उनके ये सब योगदान भूल कर हम उन्हें दोष देने में लगे है।

जिस ब्राह्मण ने हमें मन्त्र दिया *‘वसुधैव कुटुंबकं’* वह

ब्राह्मण विभाजनवादी कैसे हो सकता है? जिस ब्राह्मण ने कहा *‘लोको सकलो सुखिनो भवन्तु’* वह किसी को दुःख कैसे पहुंचा सकता है? जो केवल अपनी नहीं , केवल परिवार, जाति, प्रांत या देश की नहीं बल्कि सकल जगत की मंगलकामना करने का उपदेश देता है, वह ब्राह्मण स्वार्थी कैसे हो सकता है?

इन सब प्रश्नों को साफ़ मन से, बिना पक्षपात के विचारने की आवश्यकता है, तभी हम सही उत्तर जान पायेंगे।

आज के युग में ब्राह्मण होना एक दुधारी तलवार पर चलने के समान है। यदि ब्राह्मण अयोग्य है और कुछ अच्छा कर नहीं पाता तो लोग कहते हैं कि देखो हम तो पहले ही जानते थे कि इसे इसके पुरखों के कुकर्मों का फल मिल रहा है। यदि कोई सफलता पाता है तो कहते हैं कि इनके तो सभी हमेशा से ऊंची पदवी पर बैठे हैं, इन्हें किसी प्रकार की सहायता की क्या आवश्यकता? अगर किसी ब्राह्मण से कोई अपराध हो जाए फिर तो कहने ही क्या, सब आगे पीछे के सामाजिक पतन का दोष उनके सिर पर मढने का मौका सबको मिल जाता है। कोई श्रीकांत दीक्षित भूख से मर जाता है तो कहते हैं कि बीमारी से मरा। और ब्राह्मण बेचारा इतने दशकों से अपने अपराधों की व्याख्या सुन सुन कर ग्लानि से इतना झुक चूका है कि वह कोई प्रतिक्रिया भी नहीं करता, बस चुपचाप सुनता है और अपने प्रारब्ध को स्वीकार करता है।

बिना दोष के भी दोषी बना घूमता है आज का ब्राह्मण। नेताओं के स्वार्थ, समाज के आरोपों, और देशद्रोही ताकतों के षड्यंत्र का शिकार हो कर रह गया है ब्राह्मण। बहुत से ब्राह्मण अपने पूर्वजों के व्यवसाय को छोड़ चुके हैं आज। बहुत से तो संस्कारों को भी भूल चुके हैं । अतीत से कट चुके हैं किंतु वर्तमान से उनको जोड़ने वाला कोई नहीं। ऐसे में भविष्य से क्या आशा?

#विचारों_की_प्रयोगशाला

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जयंती

एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की जयंती पर आज श्री विनोद पाण्डेय ज़िला भाजपा संगठन चुनाव अधिकारी (पूर्व एम॰एल॰सी॰,पूर्व किसान मोर्चा राष्ट्रीय अध्यक्ष) व भाजपा ज़िलाध्यक्ष पुष्पराज सिंह ने भाजपा के वरिष्ठ लोगों एवं कार्यकर्ताओं के साथ पंडित दीननदयाल उपाध्याय जी,महात्मा गांधी,डा॰बी॰आर॰अम्बेडकर की मूर्ति पर माल्यार्पण किया ।

प॰दीनदयाल उपाध्याय जी के “एकात्ममानववाद” के सिद्धांत पर विचार गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए कहाकि…”एकात्म मानववाद के रूप में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने भारत की तत्कालीन राजनीति और समाज को वह दिशा देने का दर्शन दिया था , जो सौ फीसदी भारतीय थी। एकात्म मानववाद के इस वैचारिक दर्शन का प्रतिपादन पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने मुंबई में 22 से 25 अप्रैल, 1965 में चार अध्यायों में दिए गए भाषण में किया। इस भाषण में उन्होंने एक मानव के संपूर्ण सृष्टि से संबंध पर व्यापक दृष्टिकोण रखने का काम किया था। वे मानव को विभाजित करके देखने के पक्षधर नहीं थे। वे मानवमात्र का हर उस दृष्टि से मूल्यांकन करने की बात करते हैं, जो उसके संपूर्ण जीवनकाल में छोटी अथवा बड़ी जरूरत के रूप में संबंध रखता है। दुनिया के इतिहास में सिर्फ ‘मानव-मात्र’ के लिए अगर किसी एक विचार दर्शन ने समग्रता में चिंतन प्रस्तुत किया है तो वो एकात्म मानववाद का दर्शन है”।

मुताह

हमेशा की तरह अरब से #चार_बूढ़े_शेख #भारत_के_हैदराबाद उतरते है ।

हमेशा की तरह #होटल में उनसे मिलने कुछ #एजेंट आते है।

हमेशा की तरह वो एजेंट #दस , #बारह या #चौदह साल की #गरीब_मुस्लिम_लड़कियों के #फोटो #शेखों को दिखाते है ।

हमेशा की तरह बूढ़े शेख लड़कियाँ पसंद करते है ।

हमेशा की तरह एक काजी आकर इन बूढ़ों का निकाह मासूम लड़कियों से करवा देता है ।

हमेशा की तरह ये निकाह .. निकाह ना होकर #मुताह होता है ….#मुताह_निकाह यानि कॉन्ट्रैक्ट मैरिज या कानूनी वेश्यावृति !

‘मुताह’ का शाब्दिक अर्थ है ‘आनंद’, ‘मज़ा’, ‘प्लेजर’ । इसी एक बात से ये पता चलता है कि मुताह शादी का कितना वाहियात रूप है । महज़ मज़े के लिए शादी । इस्लाम में वेश्यावृत्ति हराम है । जिस्म बेचने या खरीदने पर पाबंदी है । निकाह के अलावा किसी भी तरह का शरीरसंबंध ‘जिनाह’ माना जाता है। सिंपल शब्दों में अवैध संबंध, व्यभिचार। ऐसे में मुताह निकाह और कुछ नहीं, मज़हब की हदों में रहते हुए अय्याशी करने का उपाय ही है।

मुताह निकाह को आसानी से समझा जाए तो ये एक कॉन्ट्रैक्ट मैरिज है । इसमें एक तयशुदा समय के लिए, मेहर की एक मोटी रकम तय करके निकाह होता है । मेहर एडवांस में पे होता है। अनुबंध तीन दिन से लेकर कितने ही वक्फे का हो सकता है । एक बार मियाद तय होने के बाद उसे बदला नहीं जा सकता । मुताह का कॉन्ट्रैक्ट शाब्दिक या लिखित किसी भी रूप में हो सकता है। निकाह के वक़्त दोनों लोगों को ये घोषित करना होता है कि ये एक मुताह निकाह है और वो इसकी तमाम शर्तों से वाकिफ हैं ।

अब मजे की बात देखो .. बरसों से चंद पैसों के लिये अपनी मासूम बच्चियों को शादी के नाम पर रौंदने के लिए अमीर मुसलमानों को बेचने वाले आज किसी के द्वारा कश्मीरी लड़कियों से शादी करने के नाम पर दो चार हल्के फुल्के मजाक करने पर उनकी इज्जत करने का ज्ञान दे रहे है ।

अगर दुनिया में कहीं दोगले है तो वो यहीं हैं… यहीं हैं .. यहीं हैं ।

#विचारों_की_प्रयोगशाला

जिहाद – प्रेमचंद की इस अद्भुत रचना को निरंतर छुपाया गया है।

जिहाद – प्रेमचंद की इस अद्भुत रचना को निरंतर छुपाया गया है।

प्रेमचंद की इस अद्भुत रचना को निरंतर छुपाया गया है लेकिन सुधी पाठक याद रखें कि प्रेमचंद की लेखनी में ही वह कौशल है कि खलनायक नायक में बांटने के स्थान पर वह मानवीय गरिमा से कथानक को निर्भेद निर्द्वंद्व रख पाते हैं।

कहानी बहुत पुरानी है। हिन्दुओं का एक काफिला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रदेश में भागा चला जा रहा था। मुद्दतों से उस प्रांत में हिन्दू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आए थे। धार्मिक द्वेष का नाम न था। पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाता था। बात-बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे। शासन की कोई व्यवस्था न थी। हर एक जिरगे और कबीले की व्यवस्था अलग थी। आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था। जान का बदला जान था, खून का बदला खून; इस नियम में कोई अपवाद न था। यही उनका धर्म था, यही ईमान; मगर उस भीषण रक्तपात में भी हिन्दू परिवार शांति से जीवन व्यतीत करते थे, पर एक महीने से देश की हालत बदल गयी है। एक मुल्ला ने न जाने कहां से आकर अनपढ़ धर्मशून्य पठानों में धर्म का भाव जाग्रत कर दिया है। उसकी वाणी में कोई ऐसी मोहिनी है कि बूढ़े, जवान, स्त्री-पुरुष खिंचे चले आते हैं। वह शेरों की तरह गरज कर कहता है-खुदा ने तुम्हें इसलिए पैदा किया है कि दुनिया को इस्लाम की रोशनी से रोशन कर दो। दुनिया से कुफ्र का निशान मिटा दो। एक काफिर के दिन को इस्लाम के उजाले से रोशन कर देने का सवाब सारी उम्र के रोजे, नमाज और जकात से कहीं ज्यादा है। जन्नत की हूरें तुम्हारी बलाएं लेंगी और फरिश्ते तुम्हारे कदमों की खाक माथे पर मलेंगे, खुदा तुम्हारी पेशानी पर बोसे देगा। और सारी जनता यह आवाज सुनकर मजहब के नारों से मतावाली हो जाती है। उसी धार्मिक उत्तेजना ने कुफ्र और इस्लाम का भेद उत्पन्न कर दिया है। प्रत्येक पठान जन्नत का सुख भोगने के लिए अधीर हो उठा है। उन्हीं हिन्दुओं पर जो सदियों से शांति के साथ रहते थे, हमले होने लगे हैं। कहीं उनके मन्दिर ढाये जाते हैं, कहीं उनके देवताओं को गालियां दी जाती हैं। कहीं उन्हें जबरदस्ती इस्लाम की दीक्षा दी जाती है। हिन्दू संख्या में कम हैं, असगंठित हैं, बिखरे हुए हैं, इस नयी परिस्थिति के लिए बिल्कुल तैयार नहीं। उनके हाथ-पांव फूले हुए हैं, कितने ही तो अपनी जमा-जथा छोड़कर भाग खड़े हुए हैं, कुछ इस आंधी के शांत हो जाने का अवसर देख रहे हैं। यह काफिला भी उन्हीं भागनेवालों में था। दोपहर का समय था। आसमान से आग बरस रही थी। पहाड़ों से ज्वाला-सी निकल रही थी। वृक्ष का कहीं नाम न था। ये लोग राज-पथ से हटे हुए, पेचीदा औघट रास्तों से चले आ रहे थे। पग-पग पर पकड़ लिए जाने का खटका लगा हुआ था। यहां तक कि भूख, प्यास और ताप से विकल होकर अंत को लोग एक उभरी हुई शिला की छांह में विश्राम करने लगे। सहसा कुछ दूर पर एक कुआं नजर आया। वहीं डेरे डाल दिए। भय लगा हुआ था कि जिहादियों का कोई दल पीछे से न आ रहा हो। दो युवकों ने बंदूक भरकर कंधे पर रखीं और चारों तरफ गश्त करने लगे। बूढ़े कम्बल बिछाकर कमर सीधी करने लगे। स्त्रियां बालकों को गोद से उतार कर माथे का पसीना पोंछने और बिखरे हुए केशों को संभालने लगीं। सभी के चेहरे मुरझाये हुए थे। सभी चिंता और भय से त्रस्त हो रहे थे, यहां तक कि बच्चे जोर से न रोते थे।

दोनों युवकों में एक लम्बा, गठीला रूपवान है। उसकी आंखों से अभिमान की रेखाएं-सी निकल रही हैं। मानो वह अपने सामने किसी की हकीकत नहीं समझता, मानो उसकी एक-एक गत पर आकाश के देवता जयघोष कर रहे हैं। दूसरा कद का दुबला-पतला, रूपहीन-सा आदमी है, जिसके चेहरे से दीनता झलक रही है, मानो उसके लिए संसार में कोई आशा नहीं, मानो वह दीपक की भांति रो-रोकर जीवन व्यतीत करने ही के लिए बनाया गया है। उसका नाम धर्मदास है; इसका खजानचंद।

धर्मदास ने बंदूक को जमीन पर टिका कर एक चट्टान पर बैठते हुए कहा- तुमने अपने लिए क्या सोचा? कोई लाख-सवा की सम्पत्ति रही होगी तुम्हारी?

खजानचंद ने उदासीन भाव से उत्तर दिया-लाख-सवा लाख की तो नहीं, हां, पचास-साठ हजार तो नकद ही थे।

“तो अब क्या करोगे?’

“जो कुछ सिर पर आएगा, झेलूंगा! रावलपिंडी में दो-चार सम्बंधी हैं, शायद कुछ मदद करें। तुमने क्या सोचा है?’

“मुझे क्या गम! अपने दोनों हाथ अपने साथ हैं। वहां इन्हीं का सहारा था, आगे भी इन्हीं का सहारा है।’

“आज और कुशल से बीत जाए तो फिर कोई भय नहीं।’

“मैं तो मना रहा हूं कि एकाध शिकार मिल जाए। एक दर्जन भी आ जाएं तो भून कर रख दूं।’

इतने में चट्टानों के नीचे से एक युवती हाथ में लोटा-डोर लिए निकली और सामने कुएं की ओर चली। प्रभात की सुनहरी, मधुर, अरुणिमा मूर्तिमान हो गयी थी।

दोनों युवक उसकी ओर बढ़े लेकिन खजानचंद तो दो-चार कदम चल कर रुक गया, धर्मदास ने युवती के हाथ से लोटा ले लिया और खजानचंद की ओर सगर्व नेत्रों से ताकता हुआ कुएं की ओर चला। खजानचंद ने फिर बंदूक संभाली और अपनी झेंप मिटाने के लिए आकाश की ओर ताकने लगा। इसी तरह कितनी ही बार धर्मदास के हाथों पराजित हो चुका था। शायद उसे इसका अभ्यास हो गया था। अब इसमें लेशमात्र भी संदेह न था कि श्यामा का प्रेमपात्र धर्मदास है। खजानचंद की सारी सम्पत्ति धर्मदास के रूपवैभव के आगे तुच्छ थी। परोक्ष ही नहीं, प्रत्यक्ष रूप से भी श्यामा कई बार खजानचंद को हताश कर चुकी थी; पर वह अभागा निराश होकर भी न जाने क्यों उस पर प्राण देता था। तीनों एक ही बस्ती के रहने वाले थे। श्यामा के माता-पिता पहले ही मर चुके थे। उसकी बुआ ने उसका पालन-पोषण किया था। अब भी वह बुआ ही के साथ रहती थी। उसकी अभिलाषा थी कि खजानचंद उसका दामाद हो, श्यामा सुख से रहे और उसे भी जीवन के अंतिम दिनों के लिए कुछ सहारा हो जाए, लेकिन श्यामा धर्मदास पर रीझी हुई थी। इसे क्या खबर थी कि जिस व्यक्ति को वह पैरों से ठुकरा रही है, वही उसका एकमात्र अवलम्ब है। खजानचंद ही वृद्धा का मुनीम, खजांची, कारिंदा सब कुछ था और यह जानते हुए भी कि श्यामा उसे जीवन में नहीं मिल सकती। उसके धन का यह उपयोग न होता, तो वह शायद अब तक उसे लुटाकर फकीर हो जाता।

धर्मदास पानी लेकर लौट ही रहा था कि उसे पश्चिम की ओर से कई आदमी घोड़ों पर सवार आते दिखायी दिए। जरा और समीप आने पर मालूम हुआ कि कुल पांच आदमी हैं। उनकी बंदूक की नलियां धूप में साफ चमक रही थीं। धर्मदास पानी लिए हुए दौड़ा कि कहीं रास्ते ही में सवार उसे न पकड़ लें लेकिन कंधे पर बंदूक और एक हाथ में लोटा-डोर लिए वह बहुत तेज न दौड़ सकता था। फासला दो सौ गज न था। रास्ते में पत्थरों के ढेर टूटे-फूटे पड़े हुए थे। भय होता था कि कहीं ठोकर न लग जाए, कहीं पैर न फिसल जाए। इधर सवार प्रति क्षण समीप होते जाते थे। अरबी घोड़ों से उसका मुकाबला ही क्या, उस पर मंजिलों का धावा हुआ। मुश्किल से पचास कदम गया होगा कि सवार उसके सर पर आ पहुंचे और तुरन्त उसे घेर लिया। धर्मदास बड़ा साहसी था; पर मृत्यु को सामने खड़ी देखकर उसकी आंखों में अंधेरा छा गया, उसके हाथ से बंदूक छूट कर गिर पड़ी। पांचों उसी के गांव के महसूदी पठान थे। एक पठान ने कहा-उड़ा दो सर मरदूद का। दगाबाज काफिर।

दूसरा-नहीं-नहीं, ठहरो, अगर यह इस वक्त भी इस्लाम कबूल कर ले, तो हम इसे मुआफ कर सकते हैं। क्यों धर्मदास, तुम्हें इस दगा की क्या सजा दी जाए? हमने तुम्हें रातभर का वक्त फैसला करने के लिए दिया था। मगर तुम इसी वक्त जहन्नुम पहुंचा दिए जाओ; लेकिन हम तुम्हें फिर मौका देते हैं। यह आखिरी मौका है। अगर तुमने अब भी इस्लाम न कबूल किया, तो तुम्हें दिन की रोशनी देखनी नसीब न होगी।

धर्मदास ने हिचकिचाते हुए कहा- जिस बात को अक्ल नहीं मानती, उसे कैसे….

पहले सवार ने आवेश में आकर कहा-मजहब का अक्ल से कोई वास्ता नहीं।

तीसरा-कुफ्र है! कुफ्र है!

पहला-उड़ा दो सिर मरदूद का, धुआं इस पार।

दूसरा- ठहरो-ठहरो, मार डालना मुश्किल नहीं, जिला लेना मुश्किल है। तुम्हारे और साथी कहां हैं धर्मदास?

धर्मदास- सब मेरे साथ ही हैं।

दूसरा-कलामे शरीफ की कसम; अगर तुम सब खुदा और उनकी रसूल पर ईमान लाओ, तो कोई तुम्हें तेज निगाहों से देख भी न सकेगा।

धर्मदास-आप लोग सोचने के लिए और कुछ मौका न देंगे।

इस पर चारों सवार चिल्ला उठे-नहीं, नहीं, हम तुम्हें न जाने देंगे, यह आखिरी मौका है।

इतना कहते ही पहले सवार ने बंदूक छतिया ली और नली धर्मदास की छाती की ओर करके बोला-बस बोलो, क्या मंजूर है?

धर्मदास सर से पैर तक कांप कर बोला-अगर मैं इस्लाम कबूल कर लूं तो मेरे साथियों को तो कोई तकलीफ न दी जाएगी?

दूसरा-हां, अगर तुम जमानत करो कि वे भी इस्लाम कबूल कर लेंगे।

पहला-हम इस शर्त को नहीं मानते। तुम्हारे साथियों से हम खुद निपट लेंगे। तुम अपनी कहो। क्या चाहते हो? हां या नहीं?

धर्मदास ने जहर का घूंट पीकर कहा- मैं खुदा पर ईमान लाता हूं। पांचों ने एक स्वर से कहा- अलहमद व लिल्लाह! और बारी-बारी से धर्मदास को गले लगाया।

श्यामा हृदय को दोनों हाथों से थामे यह दृश्य देख रही थी। वह मन में पछता रही थी कि मैंने क्यों इन्हें पानी लाने भेजा? अगर मालूम होता कि विधि यों धोखा देगा, तो मैं प्यासों पर जाती, पर इन्हें न जाने देती। श्यामा से कुछ दूर खजानचंद भी खड़ा था। श्यामा ने उसकी ओर क्षुब्ध नेत्रों से देख कर कहा- अब इनकी जान बचती नहीं मालूम होती।

खजानचंद-बंदूक भी हाथ से छूट पड़ी है।

श्यामा-न जाने क्या बातें हो रही हैं। अरे गजब! दुष्ट ने उनकी ओर बंदूक तानी है!

खजान-जरा और समीप आ आ जाएं, तो मैं बंदूक चलाऊं। इतनी दूर की मार इसमें नहीं है।

श्यामा-अरे! देखो, वे सब धर्मदास को गले लगा रहे हैं। यह माजरा क्या है?

खजान-कुछ समझ में नहीं आता।

श्यामा-कहीं इसने कलमा तो नहीं पढ़ लिया?

खजान-नहीं, ऐसा क्या होगा, धर्मदास से मुझे ऐसी आशा नहीं है।

श्यामा- मैं समझ गयी। ठीक यही बात है। बंदूक चलाओ।

खजान-धर्मदास बीच में हैं। कहीं उन्हें लग जाए।

श्यामा-कोई हर्ज नहीं। मैं चाहती हूं, पहला निशाना धर्मदास ही पर पड़े। कायर! निर्लज्ज! प्राणों के लिए धर्म त्याग किया। ऐसी बेहयाई की जिंदगी से मर जाना कहीं अच्छा है। क्या सोचते हो। क्या तुम्हारे भी हाथ-पांव फूल गए। लाओ, बंदूक मुझे दे दो। मैं इस कायर को अपने हाथों से मारूंगी।

खजान- मुझे तो वि·श्वास नहीं होता कि धर्मदास….

श्यामा- तुम्हें कभी वि·श्वास न आएगा। लाओ, बंदूक मुझे दो। खड़े क्या ताकते हो? क्या जब वे सर पर आ जाएंगे, तब बंदूक चलाओगे? क्या तुम्हें भी यह मंजूर है कि मुसलमान होकर जान बचाओ? अच्छी बात है, जाओ। श्यामा अपनी रक्षा आप कर सकती है; मगर उसे अब मुंह न दिखाना।

खजानचंद ने बंदूक चलाई। एक सवार की पगड़ी को उड़ाती हुई निकल गयी। जिहादियों ने “अल्ला हो अकबर!’ की हांक लगायी। दूसरी गोली चली और घोड़े की छाती पर बैठी। घोड़ा वहीं गिर पड़ा। जिहादियों ने फिर “अल्लाहो अकबर!’ की सदा लगायी और आगे बढ़े। तीसरी गोली आयी। एक पठान लोट गया; पर इससे पहले कि चौथी गोली छूटे, पठान खजानचंद के सर पर पहुंच गए और बंदूक उसके हाथ से छीन ली।

एक सवार ने खजानचंद की ओर बंदूक तान कर कहा-उड़ा दूं सर मरदूद का, इससे खून का बदला लेना है।

दूसरे सवार ने जो इनका सरदार मालूम होता था, कहा- नहीं-नहीं, यह दिलेर आदमी है। खजानचंद, तुम्हारे ऊपर दगा, खून और कुफ्र, ये तीन इल्जाम हैं, और तुम्हें कत्ल कर देना ऐन सवाब है, लेकिन हम तुम्हें एक मौका और देते हैं। अगर तुम अब भी खुदा और रसूल पर ईमान लाओ, तो हम तुम्हें सीने से लगाने को तैयार हैं। इसके सिवा तुम्हारे गुनाहों का और कोई कफारा (प्रायश्चित) नहीं है। यह हमारा आखिरी फैसला है। बोलो, क्या मंजूर है? चारों पठानों ने कमर से तलवारें निकाल लीं, और उन्हें खजानचंद के सर पर तान दिया मानो “नहीं’ का शब्द मुंह से निकलते ही चारों तलवारें उसकी गर्दन पर चल जाएगी।

खजानचंद का मुखमंडल विलक्षण तेज से आलोकित हो उठा। उसकी दोनों आंखें स्वर्गीय ज्योति से चमकने लगीं। दृढ़ता से बोला- तुम एक हिन्दू से यह प्रश्न कर रहे हो? क्या तुम समझते हो कि जान के खौफ से वह अपना ईमान बेच डालेगा? हिन्दू को अपने ई·श्वर तक पहुंचने के लिए किसी नबी, वली या पैगम्बर की जरूरत नहीं! चारों पठानों ने कहा-काफिर! काफिर!

खजान-अगर तुम मुझे काफिर समझते हो तो समझो। मैं अपने को तुमसे ज्यादा खुदापरस्त समझता हूं। मैं उस धर्म को मानता हूं, जिसकी बुनियाद अक्ल पर है। आदमी में अक्ल ही खुदा का नूर (प्रकाश) है और हमारा ईमान हमारी अक्ल…

चारों पठानों के मुंह से निकला “काफिर!’ और चारों तलवारें एक साथ खजानचंद की गर्दन पर गिर पड़ीं। लाश जमीन पर फड़कने लगी। धर्मदास सर झुकाये खड़ा रहा। वह दिल में खुश था कि अब खजानचंद की सारी सम्पत्ति उसके हाथ लगेगी और वह श्यामा के साथ सुख से रहेगा; पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था। श्यामा अब तक मर्माहत सी खड़ी यह दृश्य देख रही थी। ज्यों ही खजानचंद की लाश जमीन पर गिरी, वह झपट कर लाश के पास आयी और उसे गोद में लेकर आंचल से रक्त प्रवाह को रोकने की चेष्टा करने लगी। उसके सारे कपड़े खून से तर हो गए। उसने बड़ी सुन्दर बेल-बूटोंवाली साड़ियां पहनी होंगी, पर इस रक्त-रंजित साड़ी की शोभा अतुलनीय थी। बेल-बूटोंवाली साड़ियां रूप की शोभा बढ़ाती थीं, यह रक्त-रंजित साड़ी आत्मा की छवि दिखा रही थी।

ऐसा जान पड़ा मानो खजानचंद की बुझती आंखें एक अलौकिक ज्योति से प्रकाशमान हो गयी हैं। उन नेत्रों में कितना संतोष, कितनी तृप्ति, कितनी उत्कंठा भरी हुई थी। जीवन में जिसने प्रेम की भिक्षा भी न पायी, वह मरने पर उत्सर्ग जैसे स्वर्गीय रत्न का स्वामी बना हुआ था।

धर्मदास ने श्यामा का हाथ पकड़ कर कहा- श्यामा, होश में आओ, तुम्हारे सारे कपड़े खून से तर हो गए हैं। अब रोने से क्या हासिल होगा? ये लोग हमारे मित्र हैं, हमें कोई कष्ट न देंगे। हम फिर अपने घर चलेंगे और जीवन के सुख भोगेंगे।

श्यामा ने तिरस्कारपूर्ण नेत्रों से देखकर कहा- तुम्हें अपना घर बहुत प्यारा है, तो जाओ। मेरी चिंता मत करो, मैं अब न जाऊंगी। हां, अगर अब भी मुझसे कुछ प्रेम हो तो इन लोगों से इन्हीं तलवारों से मेरी भी अंत करा दो।

धर्मदास करुणा-कातर स्वर से बोला-श्यामा, यह तुम क्या कहती हो, तुम भूल गयीं कि हमसे-तुमसे क्या बातें हुई थीं? मुझे खुद खजानचंद के मारे जाने का शोक है; पर भावी को कौन टाल सकता है?

श्यामा-अगर यह भावी थी, तो यह भी भावी है कि मैं अपना अधर्म जीवन उस पवित्र आत्मा के शोक में काटूं, जिसका मैंने सदैव निरादर किया। यह कहते-कहते श्यामा का शोकोद्गार, जो अब तक क्रोध और घृणा के नीचे दबा हुआ था, उबल पड़ा और वह खजानचंद के निस्पंद हाथों को अपने गले में डालकर रोने लगी। चारों पठान यह अलौकिक अनुराग और आत्म-समर्पण देखकर करुणाद्र्र हो गए। सरदार ने धर्मदास से कहा- तुम इस पाकीजा खातून से कहो, हमारे साथ चले। हमारी जाति से इसे कोई तकलीफ न होगी। हम इसकी दिल से इज्जत करेंगे।

धर्मदास के हृदय में ईष्या की आग धधक रही थी। वह रमणी, जिसे वह अपनी समझे बैठा था, इस वक्त उसका मुंह भी नहीं देखना चाहती थी। बोला-श्यामा, तुम चाहो इस लाश पर आंसुओं की नदी बहा दो, पर यह जिंदा न होगी। यहां से चलने की तैयारी करो। मैं साथ के और लोगों को भी जा कर समझाता हूं। खान लोग हमारी रक्षा का जिम्मा ले रहे हैं। हमारी जायदाद, जमीन, दौलत सब हमको मिल जाएगी। खजानचंद की दौलत के भी हमीं मालिक होंगे। अब देर न करो। रोने-धोने से अब कुछ हासिल नहीं। श्यामा ने धर्मदास को आग्नेय नेत्रों से देखकर कहा- और इस वापसी की कीमत क्या देनी चाहिए? वही जो तुमने दी है?

धर्मदास यह व्यंग्य न समझ सका। बोला-मैंने तो कोई कीमत नहीं दी। मेरे पास था ही क्या?

श्यामा- ऐसा न कहो। तुम्हारे पास वह खजाना था, जो तुम्हें आज कई लाख वर्ष हुए ऋषियों ने प्रदान किया था। जिसकी रक्षा रघु और मनु, राम और कृष्ण, बुद्ध और शंकर, शिवाजी और गोविन्द सिंह ने की थी। उस अमूल्य भंडार को आज तुमने तुच्छ प्राणों के लिए खो दिया। इन पांवों पर लोटना तुम्हें मुबारक हो! तुम शौक से जाओ। जिन तलवारों ने वीर खजानचंद के जीवन का अंत किया, उन्होंने मेरे प्रेम का भी फैसला कर दिया। जीवन में इस वीरात्मा का मैंने जो निरादर और अपमान किया, इसके साथ जो उदासीनता दिखाई उसका अब मरने के बाद प्रायश्चित करूंगी। यह धर्म पर मरने वाला वीर था, धर्म को बेचनेवाला कायर नहीं! अगर तुममें अब भी कुछ शर्म और हया है, तो इसका क्रिया-कर्म करने में मेरी मदद करो और यदि तुम्हारे स्वामियों को यह भी पसंद न हो, तो रहने दो, मैं सब कुछ कर लूंगी।

पठानों के हृदय दर्द से तड़प उठे। धर्मान्धता का प्रकोप शांत हो गया। देखते-देखते वहां लकड़ियों का ढेर लग गया। धर्मदास ग्लानि से सिर झुकाये बैठा था और चारों पठान लकड़ियां काट रहे थे। चिता तैयार हुई और जिन निर्दय हाथों ने खजानचंद की जान ली थी उन्होंने उसके शव को चिता पर रखा। ज्वाला प्रचंड हुई। अग्निदेव अपने अग्निमुख से उस धर्मवीर का यश गा रहे थे।

पठानों ने खजानचंद की सारी जंगम सम्पत्ति लाकर श्यामा को दे दी। श्यामा ने वहीं पर एक छोटा सा मकान बनवाया और वीर खजानचंद की उपासना में जीवन के दिन काटने लगी। उसकी वृद्धा बुआ तो उसके साथ रह गयी, और सब लोग पठानों के साथ लौट गए, क्योंकि अब मुसलमान होने की शर्त न थी। खजानचंद के बलिदान ने धर्म के भूत को परास्त कर दिया। मगर धर्मदास को पठानों ने इस्लाम की दीक्षा लेने पर मजबूर किया। एक दिन नियत किया गया। मस्जिद में मुल्लाओं का मेला लगा और लोग धर्मदास को उसके घर से बुलाने आए; पर उसका वहां पता न था। चारों तरफ तलाश हुई। कहीं निशान न मिला।

साल-भर गुजर गया। संध्या का समय था। श्यामा अपने झोंपड़े के सामने बैठी भविष्य की मधुर कल्पनाओं में मग्न थी। अतीत उसके लिए दु:ख से भरा हुआ था। वर्तमान केवल एक निराशामय स्वप्न था। सारी अभिलाषाएं भविष्य पर अवलम्बित थीं। और भविष्य भी वह, जिसका इस जीवन से कोई सम्बंध न था! आकाश पर ललिमा छायी हुई थी। सामने की पर्वतमाला स्वर्णमयी शांति के आवरण से ढकी हुई थी। वृक्षों की कांपती हुई पत्तियों से सरसराहट की आवाज निकल रही थी, मानो कोई वियोगी आत्मा पत्तियों पर बैठी हुई सिसकियां भर रही है। उसी वक्त एक भिखारी फटे हुए कपड़े पहने झोंपड़ी के सामने खड़ा हो गया। कुत्ता जोर से भूंक उठा। श्यामा ने चौंक कर देखा और चिल्ला उठी-धर्मदास!

धर्मदास ने वहीं जमीन पर बैठते हुए कहा- हां श्यामा, मैं अभागा धर्मदास ही हूं। साल-भर से मारा-मारा फिर रहा हूं। मुझे खोज निकालने के लिए इनाम रख दिया गया है। सारा प्रांत मेरे पीछे पड़ा हुआ है। इस जीवन से अब ऊब उठा हूं; पर मौत भी नहीं आती।

धर्मदास एक क्षण के लिए चुप हो गया। फिर बोला-क्यों श्यामा, क्या अभी तुम्हारा हृदय मेरी तरफ से साफ नहीं हुआ। तुमने मेरा अपराध क्षमा नहीं किया!

श्यामा ने उदासीन भाव से कहा- मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझी। “मैं अब भी हिन्दू हूं। मैंने इस्लाम नहीं कबूल किया है।’

“जानती हूं!’ “यह जानकर भी तुम्हें मुझ पर दया नहीं आती!’

श्यामा ने कठोर नेत्रों से देखा और उत्तेजित होकर बोली-तुम्हें अपने मुंह से ऐसी बातें निकालते शर्म नहीं आती! मैं उस धर्मवीर की ब्याहता हूं, जिसने हिन्दू जाति का मुख उज्ज्वल किया है। तुम समझते हो कि वह मर गया! यह तुम्हारा भ्रम है। वह अमर है। मैं इस समय भी उसे स्वर्ग में बैठा देख रही हूं। तुमने हिन्दू-जाति को कलंकित किया है। मेरे सामने से दूर हो जाओ।धर्मदास ने कुछ जवाब न दिया ! चुपके से उठा, एक लम्बी साँस ली और एक तरफ चल दिया।

प्रातःकाल श्यामा पानी भरने जा रही थी, तब उसने रास्ते में एक लाश पड़ी हुई देखी। दो-चार गिद्ध उस पर मँडरा रहे थे। उसका हृदय धड़कने लगा। समीप जा कर देखा और पहचान गयी। यह धर्मदास की लाश थी

Featured

मनोकामना पूर्ण करने वाले रामचरित्रमानस के मंत्र

आपकी हर मनोकामना पूर्ण करेंगे रामचरित मानस के ये इक्यावन मंत्र,, श्री रामचरित मानस के दोहे चौपाई को कष्ट निवारण के लिए कैसे करे सिद्ध,,,,,

आपकी हर मनोकामना पूर्ण करेंगे रामचरित मानस के ये इक्यावन मंत्र,, श्री रामचरित मानस के दोहे चौपाई को कष्ट निवारण के लिए कैसे करे सिद्ध,,,,,

नियम- मानस के दोहे-चौपाईयों को सिद्ध करने का विधान यह है कि किसी भी शुभ दिन की रात्रि को दस बजे के बाद अष्टांग हवन के द्वारा मन्त्र सिद्ध करना चाहिये। फिर जिस कार्य के लिये मन्त्र-जप की आवश्यकता हो, उसके लिये नित्य जप करना चाहिये। वाराणसी में भगवान् शंकरजी ने मानस की चौपाइयों को मन्त्र-शक्ति प्रदान की है-इसलिये वाराणसी की ओर मुख करके शंकरजी को साक्षी बनाकर श्रद्धा से जप करना चाहिये।

अष्टांग हवन सामग्री १॰ चन्दन का बुरादा, २॰ तिल, ३॰ शुद्ध घी, ४॰ चीनी, ५॰ अगर, ६॰ तगर, ७॰ कपूर, ८॰ शुद्ध केसर, ९॰ नागरमोथा, १०॰ पञ्चमेवा, ११॰ जौ और १२॰ चावल।

जानने की बातें- जिस उद्देश्य के लिये जो चौपाई, दोहा या सोरठा जप करना बताया गया है, उसको सिद्ध करने के लिये एक दिन हवन की सामग्री से उसके द्वारा (चौपाई, दोहा या सोरठा) १०८ बार हवन करना चाहिये। यह हवन केवल एक दिन करना है। मामूली शुद्ध मिट्टी की वेदी बनाकर उस पर अग्नि रखकर उसमें आहुति दे देनी चाहिये। प्रत्येक आहुति में चौपाई आदि के अन्त में ‘स्वाहा’ बोल देना चाहिये।

प्रत्येक आहुति लगभग पौन तोले की (सब चीजें मिलाकर) होनी चाहिये। इस हिसाब से १०८ आहुति के लिये एक सेर (८० तोला) सामग्री बना लेनी चाहिये। कोई चीज कम-ज्यादा हो तो कोई आपत्ति नहीं। पञ्चमेवा में पिश्ता, बादाम, किशमिश (द्राक्षा), अखरोट और काजू ले सकते हैं। इनमें से कोई चीज न मिले तो उसके बदले नौजा या मिश्री मिला सकते हैं। केसर शुद्ध ४ आने भर ही डालने से काम चल जायेगा।

हवन करते समय माला रखने की आवश्यकता १०८ की संख्या गिनने के लिये है। बैठने के लिये आसन ऊन का या कुश का होना चाहिये। सूती कपड़े का हो तो वह धोया हुआ पवित्र होना चाहिये।

मन्त्र सिद्ध करने के लिये यदि लंकाकाण्ड की चौपाई या दोहा हो तो उसे शनिवार को हवन करके करना चाहिये। दूसरे काण्डों के चौपाई-दोहे किसी भी दिन हवन करके सिद्ध किये जा सकते हैं।

सिद्ध की हुई रक्षा-रेखा की चौपाई एक बार बोलकर जहाँ बैठे हों, वहाँ अपने आसन के चारों ओर चौकोर रेखा जल या कोयले से खींच लेनी चाहिये। फिर उस चौपाई को भी ऊपर लिखे अनुसार १०८ आहुतियाँ देकर सिद्ध करना चाहिये। रक्षा-रेखा न भी खींची जाये तो भी आपत्ति नहीं है। दूसरे काम के लिये दूसरा मन्त्र सिद्ध करना हो तो उसके लिये अलग हवन करके करना होगा।

एक दिन हवन करने से वह मन्त्र सिद्ध हो गया। इसके बाद जब तक कार्य सफल न हो, तब तक उस मन्त्र (चौपाई, दोहा) आदि का प्रतिदिन कम-से-कम १०८ बार प्रातःकाल या रात्रि को, जब सुविधा हो, जप करते रहना चाहिये।

कोई दो-तीन कार्यों के लिये दो-तीन चौपाइयों का अनुष्ठान एक साथ करना चाहें तो कर सकते हैं। पर उन चौपाइयों को पहले अलग-अलग हवन करके सिद्ध कर लेना चाहिये।

१॰ विपत्ति-नाश के लिये

“राजिव नयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक।।”

२॰ संकट-नाश के लिये

“जौं प्रभु दीन दयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा।।

जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।।

दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।”

३॰ कठिन क्लेश नाश के लिये

“हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू॥”

४॰ विघ्न शांति के लिये

“सकल विघ्न व्यापहिं नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही॥”

५॰ खेद नाश के लिये

“जब तें राम ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए॥”

६॰ चिन्ता की समाप्ति के लिये

“जय रघुवंश बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृशानू॥”

७॰ विविध रोगों तथा उपद्रवों की शान्ति के लिये

“दैहिक दैविक भौतिक तापा।राम राज काहूहिं नहि ब्यापा॥”

८॰ मस्तिष्क की पीड़ा दूर करने के लिये

“हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे।।”

९॰ विष नाश के लिये

“नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।”

१०॰ अकाल मृत्यु निवारण के लिये

“नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।

लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहि बाट।।”

११॰ सभी तरह की आपत्ति के विनाश के लिये / भूत भगाने के लिये

“प्रनवउँ पवन कुमार,खल बन पावक ग्यान घन।

जासु ह्रदयँ आगार, बसहिं राम सर चाप धर॥”

१२॰ नजर झाड़ने के लिये

“स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी।।”

१३॰ खोयी हुई वस्तु पुनः प्राप्त करने के लिए

“गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।।”

१४॰ जीविका प्राप्ति केलिये

“बिस्व भरण पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत जस होई।।”

१५॰ दरिद्रता मिटाने के लिये

“अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद धन दारिद दवारि के।।”

१६॰ लक्ष्मी प्राप्ति के लिये

“जिमि सरिता सागर महुँ जाही। जद्यपि ताहि कामना नाहीं।।

तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ।।”

१७॰ पुत्र प्राप्ति के लिये

“प्रेम मगन कौसल्या निसिदिन जात न जान।

सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान।।’

१८॰ सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये

“जे सकाम नर सुनहि जे गावहि।सुख संपत्ति नाना विधि पावहि।।”

१९॰ ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने के लिये

“साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।।”

२०॰ सर्व-सुख-प्राप्ति के लिये

सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई।।

२१॰ मनोरथ-सिद्धि के लिये

“भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।

तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि।।”

२२॰ कुशल-क्षेम के लिये

“भुवन चारिदस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू।।”

२३॰ मुकदमा जीतने के लिये

“पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।”

२४॰ शत्रु के सामने जाने के लिये

“कर सारंग साजि कटि भाथा। अरिदल दलन चले रघुनाथा॥”

२५॰ शत्रु को मित्र बनाने के लिये

“गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।”

२६॰ शत्रुतानाश के लिये

“बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई॥”

२७॰ वार्तालाप में सफ़लता के लिये

“तेहि अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयउ भृगुकुल कमल पतंगा॥”

२८॰ विवाह के लिये

“तब जनक पाइ वशिष्ठ आयसु ब्याह साजि सँवारि कै।

मांडवी श्रुतकीरति उरमिला, कुँअरि लई हँकारि कै॥”

२९॰ यात्रा सफ़ल होने के लिये

“प्रबिसि नगर कीजै सब काजा। ह्रदयँ राखि कोसलपुर राजा॥”

३०॰ परीक्षा / शिक्षा की सफ़लता के लिये

“जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥

मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥”

३१॰ आकर्षण के लिये

“जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥”

३२॰ स्नान से पुण्य-लाभ के लिये

“सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।

लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।।”

३३॰ निन्दा की निवृत्ति के लिये

“राम कृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी।।

३४॰ विद्या प्राप्ति के लिये

गुरु गृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल विद्या सब आई॥

३५॰ उत्सव होने के लिये

“सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।

तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु।।”

३६॰ यज्ञोपवीत धारण करके उसे सुरक्षित रखने के लिये

“जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।

पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।”

३७॰ प्रेम बढाने के लिये

सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥

३८॰ कातर की रक्षा के लिये

“मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहिं अवसर सहाय सोइ होऊ।।”

३९॰ भगवत्स्मरण करते हुए आराम से मरने के लिये

रामचरन दृढ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग ।

सुमन माल जिमि कंठ तें गिरत न जानइ नाग ॥

४०॰ विचार शुद्ध करने के लिये

“ताके जुग पद कमल मनाउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ।।”

४१॰ संशय-निवृत्ति के लिये

“राम कथा सुंदर करतारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी।।”

४२॰ ईश्वर से अपराध क्षमा कराने के लिये

” अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमा मंदिर दोउ भ्राता।।”

४३॰ विरक्ति के लिये

“भरत चरित करि नेमु तुलसी जे सादर सुनहिं।

सीय राम पद प्रेमु अवसि होइ भव रस बिरति।।”

४४॰ ज्ञान-प्राप्ति के लिये

“छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।।”

४५॰ भक्ति की प्राप्ति के लिये

“भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपासिंधु सुखधाम।

सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम।।”

४६॰ श्रीहनुमान् जी को प्रसन्न करने के लिये

“सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपनें बस करि राखे रामू।।”

४७॰ मोक्ष-प्राप्ति के लिये

“सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। काल सर्प जनु चले सपच्छा।।”

४८॰ श्री सीताराम के दर्शन के लिये

“नील सरोरुह नील मनि नील नीलधर श्याम ।

लाजहि तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम ॥”

४९॰ श्रीजानकीजी के दर्शन के लिये

“जनकसुता जगजननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की।।”

५०॰ श्रीरामचन्द्रजी को वश में करने के लिये

“केहरि कटि पट पीतधर सुषमा सील निधान।

देखि भानुकुल भूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान।।”

५१॰ सहज स्वरुप दर्शन के लिये

“भगत बछल प्रभु कृपा निधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना।।

श्रीरामचरितमानस के कई चमत्कार हैं।

जिस घर में 1 माह में मात्र पूर्णिमा को प्रति माह रामायण का पाठ होता है उस घर में अकाल मृत्यु नहीं होती है।

जिस घर में रामचरितमानस रखी होती है वहां कभी भूत, पिशाच, प्रेतों का वास नहीं होता है।

जिस घर में रामायण के पास शाम के समय देशी गाय के घी का दीपक जलाया जाता है उस घर में अन्न की कमी कभी नहीं होती है।

जिस घर में रामचरितमानस के पास सुबह शाम गौ माता के घी का दीपक प्रतिदिन जलाया जाता है उस घर में आरोग्य बढ़ता है। बीमारियां कम होती हैं।

जिस घर में यदि रामचरितमानस की शाम के समय देशी गाय के घी का दीपक जलाकर रामचरितमानस की आरती प्रतिदिन होती है उस घर पर श्रीराम जी की कृपा सदैव रहती है और घर में शांति का वातावरण रहता है।

प्रभु की रहती कृपा रहती है।

जिस घर में प्रति सप्ताह रामयण का पाठ होता है उस घर पर श्रीराम जी व माता सीता जी की कृपा सदैव रहती है। उस घर में बच्चों की वृद्धि होती है।

जिस घर में प्रतिदिन रामायण का पाठ होता है। उस घर पर भगवान शिव, श्रीराम जी, सीता जी, श्री हनुमानजी, शनिदेव, नव ग्रह, 33 कोटि देवी देवताओं की सदैव कृपा रहती है।

उस घर से दरिद्रता भाग जाती है, उस परिवार का यश बढ़ने लगता है, उस घर पर साक्षात माँ लक्ष्मी जी की कृपा बनी रहती है। बच्चों को कभी भय नहीे लगता है। भूत , प्रेत , पिशाच वहां प्रवेश नहीं कर सकते हैं । वह घर  सुख, शान्ति, समृद्धि, धन, अन्न, संतान, मित्र, पड़ोसी, रिश्तेदारों आदि से परिपूर्ण होता है।

रामायण की एक एक चौपाई लाखों मंत्रो के बराबर है और हर चौपाई कुछ न कुछ देने वाली है। हर भारतीय के घर में रामायण होनी चाहिए। पारिवारिक मैनेजमेंट रामायण हमें सिखाती है।

रामायण हमें संसार में जीना सिखाती है । गीता हमें संसार से जाना सिखाती है अर्थात मरना सिखाती है।

जयश्रीराम

२१ जुलाई बेटे पार्थ का जन्मदिन

आज मेरे बेटे #पार्थ_सिंह”बड़ा बाबू” का जन्मदिन हैं……..

:

:

:

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

पिता का पुत्र के जन्मदिन पर उपहार स्वरूप सपर्पित एक लघुकथा …..

———————————————————

“एक नदी के किनारे दो पेड़ थे,, उस रास्ते एक छोटी सी चिड़िया गुजरी और,, पहले पेड़ से पूछा,,

बारिश होने वाला है,, क्या मैं, और मेरे बच्चे तुम्हारे टहनी में घोसला बनाकर रह सकते हैं,, लेकिन उस पेड़ ने मना कर दिया,, चिड़िया फिर दूसरे पेड़ के पास गई और वही सवाल पूछा,,

दूसरा पेड़ मान गया,,

चिड़िया अपने बच्चों के साथ खुशी-खुशी दूसरे पेड़ में घोसला बना कर रहने लगी,,

एक दिन इतनी अधिक बारिश हुई कि बारिश की वजह से पहला पेड़ जड़ से उखड़ कर पानी मे बह गया,, जब चिड़िया ने उस पेड़ को बहते हुए देखा तो कहा,,

जब तुमसे मैं और मेरे बच्चे, शरण के लिये आये तब तुमने मना कर दिया था,, अब देखो तुम्हारे उसी रूखे बर्ताव की सजा तुम्हे मिल रही है,,

जिसका उत्तर पेड़ ने मुस्कुराते हुए दिया,, मैं जानता था मेरी जड़ें कमजोर है,, और इस बारिश में मै टिक नहीं पाऊंगा,, मैं तुम्हारी और बच्चे की जान खतरे में नहीं डालना चाहता था,, मना करने के लिए मुझे क्षमा कर दो,, और ये कहते-कहते पेड़ बह गया,,

किसी के इंकार को, हमेशा उनकी कठोरता न समझे,,

क्या पता उसके उसी इंकार से आप का भला हो,,

कौन किस परिस्थिति में है शायद हम नहीं समझ पाए,,

#I_love_you_बेटा

भारतीय काल गणना

#समय_मापन:

कल्प को “#गिनीज_बुक_ऑफ #वर्ल्ड_रिकॉर्ड्स” ने विश्व की सबसे लंबी “काल मापन इकाई” माना है। इस लेख में #सूक्ष्मतम इकाई से #पितृ_काल व #देवताओं_के_काल तक चलेंगे।

★ 1 त्रसरेणु = 6 ब्राह्मणीय अणु

★ 3 त्रसरेणु = 1 त्रुटि  (1/1687.5 सेकंड)

★ 100 त्रुटि  =  1 वेध

★ 3 वेध  =  1 लावा

★ 3 लावा  =  1 निमेष  (पलक झपने में लगने वाला समय)

★ 3 निमेष  = 1 क्षण

★ 5 क्षण  =  1 काष्ठा  (8 सेकंड)

★ 15 काष्ठा  =  1 लघु   (2 मिनट)

★ 15 लघु  =  1 दंड/नाड़ी   (30 मिनट)

★ 2 दंड =  1 मुहूर्त   (1 घण्टा)

★ 6 मुहूर्त =1 याम(1चौथाई दिन)

★ 4 याम = 1 अहोरात्र/तिथि (24 घण्टे/1 #मानवदिवस)

#वेदानुसार  #सूर्योदय से दिवस का आरंभ मानते हैं।

★ 15 तिथि/अहोरात्र  =  1 पक्ष/पखवाड़ा

★ 2 पक्ष =1 मास (30 दिन/महीना)

★ 2 मास  =  1 ऋतु

★ 3 ऋतु = 1 अयन (6 महीने)

★ 2 अयन = 1 वर्ष (मानव वर्ष)

【 #मानव_आयु = #100मानव_वर्ष 】

●●●●●●●●●●●●●●●●

#पितृ_काल:

★ 1 पितृ दिवस=15 मानव दिवस(मा. दि)

★ 30 पितृ दिवस=1पितृ मास  (450 मा.दि)

★ 12 पितृ मास=1पितृ वर्ष  (5,400 मा.दि)

★ पितृ आयु = 100 पितृ वर्ष = 1200 पितृ मास , = 36,000 पितृ दिवस 18,000 मानव मास , #पितृ_आयु = #1500मानव_वर्ष

●●●●●●●●●●●●●●●●●●

#दिव्य_काल:

★ 1 दिव्य दिवस = 1मानव वर्ष

★ 30 दिव्य दिवस  =  1 दिव्य मास (30 मानव वर्ष)

★ 12 दिव्य मास  =  1 दिव्य वर्ष  (360 मानव वर्ष)

★ दिव्य आयु काल  =  100 वर्ष (36,000 मानव वर्ष)

●●●●●●●●●●●●●●●●●●

#युग:

युग का परिमाण दिव्य वर्षों से नापा जाता है।

【◆1 दिव्य वर्ष =360मानव वर्ष】

युग 4 होते हैं जिनकी आयु में आयु का 10% संध्या व 10% संध्यांश काल अतिरिक्त जोड़ा जाता है , जो कि निम्नवत है:

★ #सत_युग = 4000 वर्ष + 400 संध्या + 400 संध्यांश

◆अतः सत युग काल = 4,800 दिव्य वर्ष अथवा 17,28,000 मानव वर्ष।

★#त्रेता_युग = 3000 वर्ष + 300 संध्या + 300 संध्यांश

◆अतः त्रेता युग काल = 3600 दिव्य वर्ष अथवा 12,96,000 मानव वर्ष।

★#द्वापर_युग = 2000 वर्ष + 200 संध्या + 200 संध्यांश

◆ अतः द्वापर युग काल = 2400 दिव्य वर्ष अथवा 8,64,000 मानव वर्ष।

★ #कलि_युग = 1000 वर्ष + 100 संध्या + 100 संध्यांश

◆ अतः कलि युग काल = 1200 दिव्य वर्ष अथव 4,32,000 मानव वर्ष।

●●●●●●●●●●●●●●●●●●

#लौकिक_युग:

1 लाकिक युग चारों युगों की कुल आयु के बराबर होता है।

1 लौकिक युग = चार युग (सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग)

चारों युगों की आयु :– सतयुग = 17,28,000 वर्ष ,  त्रेतायुग = 12,96,000 वर्ष , द्वापरयुग = 8,64,000 वर्ष और कलियुग = 432000 वर्ष।

इस प्रकार 1 लौकिक युग की कुल आयु = 17,28000 +12,96000 +8,64,000 +4,32,000 = 43,20,000

अत : 1 चतुर्युगी/लौकिक युग 43,20,000 (43 लाख 20 हजार मानव वर्ष का होता है।

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

#मनवन्तर:

मन्वन्तर एक संस्कॄत शब्द है, जिसका संधि-विच्छेद करने पर = मनु+अन्तर मिलता है। इसका अर्थ है #मनु_की_आयु।

प्रत्येक मन्वन्तर एक विशेष #मनु द्वारा #रचित एवं #शासित होता है, जिन्हें #ब्रह्मा द्वारा सॄजित किया जाता है। मनु #विश्व की और सभी #प्राणियों की उत्पत्ति करते हैं, जो कि उनकी (मनु की) आयु की अवधि तक बनती और चलती रहतीं हैं, उन #मनु_की_मॄत्यु के उपरांत ब्रह्मा फ़िर एक #नये_मनु की सृष्टि करते हैं, जो कि फ़िर से सभी सृष्टि करते हैं।

इनके साथ ही एक #नये_इंद्र और #सप्तर्षि भी नियुक्त

होते हैं।

1 मन्वन्तर #71लौकिकयुग/चतुर्युगी के बराबर होता है।

तब,

1 मन्वन्तर = 71 × 43,20,000 (एक लौकिक युग ) = 30,67,20,000 वर्ष ( 30 करोड़ 67 लाख 20 हजार मानव वर्ष ) का हुआ।

प्रत्येक मन्वन्तर के बाद, एक संधि-काल होता है, जो कि कॄतयुग के बराबर का होता है (17,28,000 = 4 लौकिक/महायुग)

[इस संधि-काल में प्रलय होने से पूर्ण पॄथ्वी जलमग्न हो जाती है व 33 देव भी काल संधि कर लेते हैं।]

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

#कल्प

#सृष्टिक्रम और विकास की गणना के लिए कल्प #हिन्दुओं का एक #परम_प्रसिद्ध_मापदंड है। जैसे मानव की साधारण आयु सौ वर्ष है, वैसे ही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की भी आयु सौ वर्ष मानी गई है, परंतु दोनों गणनाओं में बड़ा अन्तर है। ब्रह्मा का एक दिन ‘कल्प’ कहलाता है, उसके बाद प्रलय होता है। प्रलय ब्रह्मा की एक रात है जिसके पश्चात् फिर नई सृष्टि होती है।

चारों युगों के एक चक्कर को चतुर्युगी अथवा लौकिक युग कहते हैं। १‚००० चतुर्युगी अथवा लौकिक युगों का एक कल्प होता है। ब्रह्मा के एक मास में तीस कल्प होते हैं जिनके अलग-अलग नाम हैं, जैसे #श्वेतवाराह_कल्प, #नीललोहित_कल्प आदि।

प्रत्येक कल्प के १४ भाग होते हैं और इन भागों को ‘मन्वंतर’ कहते हैं। प्रत्येक #मन्वंतर का एक #मनु होता है, इस प्रकार #स्वायंभुव, #स्वारोचिष् आदि १४ मनु हैं। प्रत्येक मन्वंतर के अलग-अलग #सप्तर्षि, #इद्रं तथा #इंद्राणी आदि भी हुआ करते हैं।

वर्तमान मे 7 वां मन्वन्तर अर्थात् वैवस्वत मनु चल रहा है. इस से पूर्व 6 मन्वन्तर –  स्वायम्भव , स्वारोचिष , औत्तमि , तामस, रैवत , चाक्षुष बीत चुके है और आगे सावर्णि , दक्ष , ब्रह्मा , धर्म , रुद्र , रौच्य ,भौत कुल 7 मन्वन्तर आएंगे।

अतएव एक कल्प १००० #चतुर्युगों के बराबर यानी #चार_अरब_बत्तीस_करोड़ (4,32,00,00,000) #मानव_वर्ष का हुआ।

#आधुनिक_विज्ञानियों द्वारा लगभग इतनी ही सूर्य की आयु बताई गई हैं।

#सूर्य अर्थात #भास्कर मानवों के #ब्रह्मा माने गए हैं।

इस प्रकार ब्रह्मा के आज तक ५० वर्ष व्यतीत हो चुके हैं, #५१वें_वर्ष का प्रथम कल्प अर्थात् #श्वेतवाराह कल्प प्रारंभ हुआ है।

#वर्तमान मनु का नाम #वैवस्वत_मनु है और इनके २७ चतुर्युगी बीत चुके हैं, २८ वें चतुर्युगी के भी तीन युग समाप्त हो गए हैं, चौथे अर्थात् कलि युग का प्रथम चरण चल रहा है।

वर्तमान में आज ब्रह्मा के #इक्यावनवें वर्ष में #सातवें मनु, वैवस्वत मनु के शासन में श्वेतवाराह कल्प के #द्वितीय_परार्ध में, #अठ्ठाईसवें कलियुग के #प्रथम वर्ष के प्रथम दिवस में #विक्रम_संवत 2076 के ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि है अथवा 1 जून 2019 है।

इस प्रकार अब तक 15 नील, 55 खरब, 21 अरब, 97

करोड़, 19 लाख, 61 हज़ार, 626 वर्ष इस ब्रह्मा को सॄजित हुए हो गये हैं।